सिलसिला ये दोस्ती का हादसा जैसा लगे
फिर तेरा हर लफ़्ज़ मुझको क्यों दुआ जैसा लगे।
बस्तियाँ जिसने जलाई मज़हबों के नाम पर
मज़हबों से शख़्स वो इकदम जुदा जैसा लगे।
इक परिंदा भूल से क्या आ गया था एक दिन
अब परिंदों को मेरा घर घोंसला जैसा लगे
घंटियों की भाँति जब बजने लगें ख़ामोशियाँ
घंटियों का शोर क्यों न ज़लज़ला जैसा लगे।
बंद कमरे की उमस में छिपकली को देखकर
ज़िंदगी का ये सफ़र इक हौसला जैसा लगे।
गुरुवार, मार्च 11, 2010
सिलसिला ये दोस्ती का
आत्मा परमात्मा की व्यंजना है
आत्मा परमात्मा की व्यंजना है
क्या पता ये सत्य है या कल्पना है
देश को क्या देखते हो पोस्टर में
आदमी देखो मुकम्मल आइना है
क्या गिरेगा पेड़ वो इन आन्धियो से
जिसकी जड़ में गाँव भार की प्रार्थना है
उसके सपनों को शरण मत दीजिएगा
इनको आखिर बाढ़ में ही डूबना है
इन अन्धेरो को अभी रखना नज़र में
क्योंकि इनमें सूर्य की सम्भावना है
क्या खुशी देखिए
क्या खुशी देखिए, क्या ग़मी देखिए
ख़त्म होता हुआ आदमी देखिए
ज़िन्दगी मिल न पाई हमें भीड़ में
खो गई है किधर ज़िन्दगी देखिए
ओढ़कर वो अन्धेरा जिए उम्र भार
पास जिनके रही रोशनी देखिए
ख़्त्म आपके रिश्ते सभी हो गए
हर बशर है यहाँ अजनबी देखिए
प्यास होती है कैसी पता तो चले
मेरी आँखो में सूखी नदी देखिए
तुम दयारों से निकलो
तुम दयारों से निकलो, बाहर तो आओ घर से
कुछ हाल-चाल जानो, परिचय तो हो शहर से
वैसे तो आदमी है, समझो तो है अज़ूबा
वो जो खड़ा हुआ है टूटी कमर से
आतंक को पढ़ाया अपनी तरह से सबने
हर देश में खुले हैं इस तौर के मदरसे
ये खेत तो हमारा पहले ही झील में था
इन बादलो से पूछो, तुम क्यों यहाँ पे बरसे
किससे कहें हवा के हाथों में क्यों है खंज़र
बस ज़ख़्म ही मिले हैं जब भी गए ज़िधर से
अब ज़ुबाँ मत खोल
अब ज़ुबाँ मत खोल तेरी बानगी ले जाएगा
एक लम्हा फिर से तेरी हर खुशी ले जाएगा
वक़्त के इस हादसे को रोक ले वरना यही
हसरतों का आसमाँ, दिल की हँसी ले जाएगा
तू अन्धेरे को अगर बेजान ही कहता रहा
देख लेना एक दिन ये रोशनी ले जाएगा
जिस पे तुझ को है भरोसा हो न हो यूँ एक दिन
जेब में रख के वो तेरी हर कमी ले जाएगा
हो नहीं पाएगा मुमकिन लौटना ख़ुद में कभी
इक यहीं अहसास मेरी ज़िन्दगी ले जाएगा
काटने से पर
काटने से पर परिन्दों के समस्या हल न हो
देख तो इनके परों में फिर नया जंगल न हो
मैं पहाड़ो तक गया था दोस्तो ये देखने
घूमता प्यासा वहाँ मेरी तरह बादल न हो
तू जिसे आँसू समझकर हँस रहा है व्यर्थ में
देख तो उसके ज़िगर में जज़्ब गंगाजल न को
उसकी मुठ्ठी बन्द है अहसास पत्थर का न कर
क्या खबर उसमें कहीं इक छटपटाता पल न हो
हादसा जब हो चुका तो लाज़मी थीं चुप्पियाँ
क्योंकि शासन चाहता था शहर में हलचल न हो
इन परिन्दों का नहीं है
इन परिन्दों का नहीं है ज़ोर कुछ तूफानो पर
लौट कर आना है इनको फिर इसी जलयान पर
ज़िन्दगी चिथड़ो में लिपटी भूख को बहला रही
और हम फिर भी फिदा हैं अधमरे इमान पर
हरिया, ज़ुम्मन और ज़ोसफ़ सबके सब बेकार हैं
फख़्र हम कैसे करें फिर आज के विग्यान पर
ज़िन्दगी यूँ तो गणित है पर गणित-सा कुछ भी नहीं
चल रही है इसकी गाड़ी अब महज़ अनुमान पर
जिसको इज़्ज़त कह रहे हो दर हक़ीक़त कुछ नहीं
हर नज़र है आपके बस कीमती सामान पर
हमसे कुछ मत पूछिए
आज तो बाज़ार में इस बात के चर्चे बड़े हैं
कीमतें आकाश पर हैं, हम ज़मीं पर ही पड़े हैं
आप कैसे पढ़ सकेंगे उनके चेहरे की ज़बीं
जब ज़बीं पर पोस्टर ही पोस्टर चिपके पड़े हैं
एक ही शहतीर पर बीमार मज़िल है खड़ी
और सब खम्बे तो बस तीमारदारी में खड़े हैं
जिस जगह पर था हमें अपनी हिफाज़त का यक़ी
उस जगह पर आज लाखों डर अचानक आ खड़े हैं
इस कदर पाबन्दियों में मत अकेले जाइए
हमसे कुछ मत पूछिए क़ानून के पहरे कड़े हैं
कब किधर जाती है रात
रफ़्ता-रफ़्ता द्वार से यों ही गुज़र जाती है रात
मैंने देखा झील पर जाकर बिखर जाती है रात।
मैं मिलूँगा कल सुबह इस रात से जाकर ज़रूर
जानता हूँ बन-सँवर कर कब किधर जाती है रात।
हर कदम पर तीरगी है, हर तरफ़ एक शोर है
हर सुबह एकाध रहबर कत्ल कर जाती है रात।
जैसे बिल्ली चुपके-चुपके सीढ़ियाँ उतरे कहीं
आसमाँ से ज़िंदगी में यों उतर जाती है रात।
एक चिड़िया कुछ दिनों से पूछती है 'अश्वघोष'
सिर्फ़ इक आहट को सुनके क्यों सिहर जाती है रात।
झूठ की है कोठियाँ ही कोठियाँ
झूठ की है कोठियाँ ही कोठियाँ
एक कमरा तक नहीं सच का यहाँ
और कितने दिन रुलाएँगी बता
आदमी की ज़ात को ये रोटियाँ
कौन कितना आसमाँ देखेगा अब
फ़ैसला इसका करेंगी खिड़कियाँ
बन्दरों ने बाँट ली दौलत सभी
देखती रह गई सब बिल्लियाँ
कुम मिलाकर ये मिला इस दौर में
भय, थकन, कुंठा, निराशा, सिसकियाँ
हर ओर अन्धेरा है
हर ओर अन्धेरा है, अंजाम तबाही है
ये आग तो लगनी थी, जिसने भी लगाई है
अब हम भी अन्धेरे में उस आग को ढुंढेगे
जो आग चराग़ों ने पलकों पे उठाई है
वो यार हैं मुद्दत से कल राज़ खुलेगा ये
रहज़न का मुकादमा है, रहबर की गवाही है
हँसने के लिए पहले रोने का सबक सीखो
ये बात हमें कल ही अश्क़ो ने बताई है
उस शोख हसीना के पैकल में अदब देखा
चेहरा है गज़ल उसका, मुस्कान रुबाई है
हादसा-दर-हादसा
हादसा-दर-हादसा-दर-हादसा होता हुआ
क्या कभी देखा किसी ने आसमाँ रोता हुआ
ये ज़मीं प्यासी है फिर भी जानकर अनजान-सा
हुक़्मराँ-सा एक बादल रह गया सोता हुआ
मेरी आँखों में धुआँ है और कानों में है शोर
सोच की बैसाखियों पर जिस्म को ढोता हुआ
एक दरिया कल मिला था राजधानी में हमें
आदमी के ख़ून से अपना बदन धोता हुआ
चल रहा हूँ जानकर भी अजनबी हैं सब यहाँ
प्यार की हसरत में एक पहचान को बोता हुआ
रोज़मर्रा वही इक ख़बर देखिए
रोज़मर्रा वही इक ख़बर देखिए
अब तो पत्थर हुआ काँच-घर देखिए
सड़के चलने लगीं आदमी रुक गया
हो गया अपाहिज़ सफ़र देखिए
सारा आकाश अब इनके सीने में है
काटकर इनके परिन्दों के पर देखिए
मैं हकीकत न कह दूँ कहीं आपसे
मुझको खाता है हरदम ये डर देखिए
धूप आती है न इनमें, न ठंड़ी हवा
खिड़कियाँ हो गई बेअसर देखिए।
एक छप्पर भी नहीं है सर छिपाने के लिए
एक छप्पर भी नहीं है सर छिपाने के लिए
हम बने है दूसरों के घर बनाने के लिए
बन चुकी पूरी इमारत आपका कब्ज़ा हुआ
हम तरसते ही रहे बस आशियाने के लिए
जेब मे रखकर वो चेहरे को हमारे चल दिए
जानते है, जा रहे है फिर न आने के लिए
बिजलियाँ चमकें, गिरें, हमको नहीं परवाह अब
नींव तो रख जाएँगे हम आशियाने के लिए
उसने एक दीपक जलाया, ये भी तो कुछ कम नहीं
कुछ तो कोशिश की अन्धेरे को मिटाने के लिए
द्वार खोलो दौड़कर आ गया अख़बार
द्वार खोलो दौड़कर आ गया अख़बार
छटपटाती चेतना पर छा गया अख़बार
हर बशर खुशहाल है इस भुखमरी में भी
आँकड़ो की मारफ़त समझा गया अख़बार
कल मरीं कुछ औरतें स्टोव से जलकर
आज उनकी राख को जला गया अख़बार
हर तरफ ख़ामोशियों के रेंगते अजगर
एक सुर्ख़ी फेंककर दिखला गया अख़बार
कल पुलिस की लाठियों से मर गया बुधिया
लाश ग़ायब है अभी बतला गया अख़बार
एक गहरा दर्द
एक गहरा दर्द छलता जा रहा है
आदमी का दम निकलता जा रहा है
आ रही है क्रांतियाँ बुल्ड़ोज़रों से
देश का नक्शा बदलता जा रहा है
हाथ उनके ख़ून में भीगे हुए हैं
फ़र्ज़ वहशत में बदलता जा रहा है
ग्रीष्म में भी चल रही ठंडी हवाएँ
चेतना का जिस्म गलता जा रहा है
ऐ मेरे हमराज़, बढ़कर रोक ले
रोशनी को तम निगलता जा रहा है
रोज़ होती है यहाँ हलचल कोई
रोज़ होती है यहाँ हलचल कोई
टूटता है आईना हर पल कोई
राह भटके इन परिन्दों के लिए
ढूँढ़ना होगा नया जंगल कोई
नाच उठतीं क़ागज़ों की कश्तियाँ
आ गया होता इधर बादल कोई
देश तो ये अब जलेगा शर्तिया
क्या करेगी आपकी दमकल कोई
बेवजह मत घूमिए यूँ 'अश्वघोष'
फाँस लेगी आपको दलदल कोई
मैं फँस गया हूँ
मैं फँस गया हूँ अबके ऐसे बबाल में
फँसती है जैसे मछली, कछुए के जाल में।
उस आदमी से पूछो रोटी के फ़लसफ़े को
जो ढूँढता है रोटी पेड़ों की छाल में।
रूहों को क़त्ल करके क़ातिल फ़रार है
ज़िन्दा है गाँव तब से मुर्दों के हाल में।
जो गन्दगी से उपर जन-मन को ख़ुश करें
ऐसे कमल ही रोपिए संसद के ताल में।
गर मुफ़लिसी का मोर्चा तुमको है जीतना
कुछ ओर तेज़ी लाइए ख़ूँ के उबाल में।
जो भी सपना
जो भी सपना तेरे-मेरे दरमियाँ रह जाएगा
बस वही इस ज़िन्दगी की दास्ताँ रह जाएगा
कट गए है हाथ तो आवाज़ से पथराव कर
याद सबको यार मेरे ये समाँ रह जाएगा।
भूख है तो भूख का चर्चा भी होना चाहिए
वरना घुट कर सबके भीतर ये धुआँ रह जाएगा।
ये धुँधलके हैं समय के तू अभी परवाज़ कर
फट गया गर यूँ ही बादल, तू कहाँ रह जाएगा।
जो भी पूछे ये अदालत बोल देना बेझिझक
तू न रह पाया तो क्या तेरा बयाँ रह जाएगा।
बदली नहीं है अब तक तकदीर रोशनी की
बदली नहीं है अब तक तकदीर रोशनी की।
बन-बन के रह गई है तस्वीर रोशनी की।
ख़ूनी हवा से कह दो बद हरकतों को छोड़े
हालत हुई है अब तो गम्भीर रोशनी की।
उल्लेख तक को तरसे घनघोर अँधेरे भी
लिखी गई है जब-जब तहरीर रोशनी की।
गुमनाम ये अँधेरे आ जाएँ बाज़ वरना
भारी पड़ेगी उनको शमशीर रोशनी की।
तुम दीप तो जलाओ हर ओर अँधेरा है
कुछ तो नज़र में आए तासीर रोशनी की।