होता रहा जब राख मेरा घर मेरे आगे
रोता ही रहा मेरा मुक़द्दर मेरे आगे
ख़ुशबू तो कई रंग की लाया है सवेरा
बिखरा है मगर शाम का मंज़र मेरे आगे
दिल हूँ मैं पता है मुझे क्या है मेरी अज़्मत
कुछ भी नहीं सहरा, ये समन्दर मेरे आगे
हो जाएगी ज़ख़्मी ये अना ही तो है आख़िर
मत फेंकिए इमदाद के गौहर मेरे आगे
ये कैसी हवा है जो कहो उल्टा करे है
फैला दिए आवाज़ के पत्थर मेरे आगे
सोमवार, मार्च 15, 2010
होता रहा जब राख मेरा घर मेरे आगे
हमारे जैसा बुरा उसका हाल था ही नहीं
हमारे जैसा बुरा उसका हाल था ही नहीं
मलाल कैसा, उसे तो मलाल था ही नहीं
गिरफ़्त तुम हुए जिसमें वो जाल था ही नहीं
वो हुस्न का था नज़र का कमाल था ही नहीं
ये और बात मुहब्बत हमें है जाँ से मगर
हम उसके सामने झुकते सवाल था ही नहीं
क़रीब जाके समन्दर के प्यासे लौट आए
हमारी प्यास का उसको ख़याल था ही नहीं
किसी भी अक्स के टुकड़े नहीं हुए उसमें
वो आईना था कुछ ऎसा कि बाल था ही नहीं
मिलेंगे ख़ार ही फूलों की चाह में
चमन में आने से पहले ख़्याल था ही नहीं
हमारे चाहने वाले बहुत हैं
हमारे चाहने वाले बहुत हैं
मगर दिल देखिए छाले बहुत हैं
नज़र ठोकर पे ठोकर खा रही है
उजाले हैं मगर काले बहुत हैं
भरोसा इसलिए तुम पर नहीं है
तुम्हारे ख़्वाब हरियाले बहुत हैं
अजी ये ख़ामशी टूटे तो कैसे
ज़ुबानों पर यहाँ ताले बहुत हैं
तमाशा मत बनाओ ज़िन्दगी को
तमाशा देखने वाले बहुत हैं
ये सब अमृत-कलश तुमको मुबारक
हमें तो ज़हर के प्याले बहुत हैं
उलझ कर रह गया हूँ मैं तो
तुम्हारे लफ़्ज़ घुँघराले बहुत हैं
हमने जाना मगर क़रार के बाद
हमने जाना मगर क़रार के बाद
ग़म ही मिलते हैं एतबार के बाद
क्यूँ न सारे चराग़ गुल कर दें
कौन आता है इन्तिज़ार के बाद
ख़ुशबुओं की तलाश बंद करो
फूल खिलते नहीं बहार के बाद
इक नज़र दे गई क़रार मगर
दर्द बढ़ता गया क़रार के बाद
अक्स पूरा नज़र नहीं आता
आईने में किसी दरार के बाद
करना पड़ता है वक़्त का एज़ाज़
हमने जाना मगर ख़ुमार के बाद
हमने कितने ख़्वाब सजाए याद नहीं
हमने कितने ख़्वाब सजाए याद नहीं
कितने आँसू ,आँख में आए याद नहीं
डूबे, उभरे ,फिर डूबे इक दरिया में
कितने ग़ोते हमने खाए याद नहीं
हमने बाँध रखी थी आँखों से पट्टी
उसने क्या-क्या रंग दिखाए याद नहीं
छत पर रात हमारा चाँद नहीं आया
हम कितने तारे गिन पाए याद नहीं
शिकवा ,गिला करना बेमानी लगता है
हमने कितने दर्द छुपाए याद नहीं
पत्थर भी फूलों जैसे लगते थे हमें
कब,किसने, कितने बरसाए याद नहीं
उसकी चाहत को छूने की हसरत में
हमने कितने पर फैलाए याद नहीं
हमको देखो ज़रा क़रीने से
हमको देखो ज़रा क़रीने से
हम नज़र आएँगे नगीने से
तुम मिलो तो निजात मिल जाए
रोज़ मरने से,और जीने से
रोज़ आँखें तरेर लेता है
एक तूफ़ाँ मेरे सफ़ीने से
मेहनतों का सिला मिलेगा तुम्हें
प्यार हो जाएगा पसीने से
कोहरे का गुमान टूट गया
धूप आने लगी है ज़ीने से
अब तो आँसू भी ख़त्म हो आए
कैसे निकलेगी आग सीने से
दिल के ज़ख़्मों को क्या कहें
नाग लिपटे हुए हैं सीने से
वो तो क्या-क्या सितम नहीं करते
वो तो क्या-क्या सितम नहीं करते
हम ही आँखों को नम नहीं करते
आँधियों से हो दुश्मनी तो फिर
लौ चराग़ों की कम नहीं करते
आप की बात देख ली हमने
आप से बात हम नहीं करते
आँसुओं से है दोस्ती लेकिन
दर्द दिल पर रक़म नहीं करते
ऐ मेरे हाथ काटने वालो
सर मेरा क्यूँ क़लम नहीं करते
तोड़ देता है जब कोई दिल को
ग़म तो होता है, ग़म नहीं करते
मेरी क़िस्मत सँवर भी सकती है
आप चश्मे - करम नहीं करते
वहाँ चराग़ यहाँ रौशनी का साया है
वहाँ चराग़ यहाँ रौशनी का साया है
सफ़र के बाद उजाला क़रीब आया है
उड़ा हुआ है बहुत रंग उसके चेहरे का
ये जब है, राज़ से पर्दा नहीं हटाया है
वो इक चांद सभी के लिए है और इक चांद
ख़ुदा ने सिर्फ़ हमारे लिए बनाया है
सिसक रही थीं बड़ी देर से लवें ख़ुद ही
चराग़ तेज़ हवा ने कहाँ बुझाया है
बस एक रुह से बावस्तगी है दुनिया में
ये अपना जिस्म भी अपना नहीं पराया है
लफ़्ज़ अगर कुछ ज़हरीले हो जाते हैं
लफ़्ज़ अगर कुछ ज़हरीले हो जाते हैं
होंठ न जाने क्यूँ नीले हो जाते हैं
उनके बयाँ जब बर्छीले हो जाते हैं
बस्ती में ख़ंजर गीले हो जाते हैं
चलती हैं जब सर्द हवाएँ यादों की
ज़ख़्म हमारे दर्दीले हो जाते हैं
जेब में जब गर्मी का मौसम आता है
हाथ हमारे , ख़र्चीले हो जाते हैं
आँसू की दरकार अगर हो जाए तो
याद के बादल रेतीले हो जाते हैं
रंग - बिरंगे सपने दिल में रखना
आँखों में सपने गीले हो जाते हैं
फ़स्ले-ख़िज़ाँ जब आती है तो
फूल जुदा, पत्ते पीले हो जाते हैं
रौशनी की महक जिन चराग़ों में है
रौशनी की महक जिन चराग़ों में है
उन चराग़ों की लौ मेरी आँखों में है
है दिलों में मुहब्बत जवाँ आज भी
पहले जैसी ही ख़ुशबू गुलाबों में है
प्यार बाँटोगे तो प्यार मिल जाएगा
ये ख़ज़ाना दिलों की दराज़ों में है
आने वाला है तूफ़ान फिर से कोई
ख़लबली-सी बहुत आशियानों में है
तय हुआ है न होगा कभी दोस्तो
फ़ासला वो जो दोनों किनारों में है
ठेस लगती है तो टूट जाते हैं दिल
जान ही कितनी शीशे के प्यालों में है
उसकी क़ीमत समन्दर से कुछ कम नहीं
कोई क़तरा अगर रेगज़ारों में है
रेगिस्तानी आँखों में भी हैं तस्वीरें पानी की
रेगिस्तानी आँखों में भी हैं तस्वीरें पानी की
क्या-क्या पेश करूँ बतलाओ और नज़ीरें पानी की
मिटने से भी मिट न सकेंगी चंद लकीरें पानी की
पत्थर पर मौजूद रहेंगी कुछ तहरीरें पानी की
ख़्वाबों को कतरा-कतरा हो जाना है, बह जाना है
पानी-पानी हो जाती हैं सब ताबीरें पानी कीं
तैरना आत है लेकिन मैं डूब रहा हूँ दरिया में
पानी की ये लहरें हैं या हैं जंज़ीरें पानी की
दिल टूटा तो ख़ून बहेगा आँखों से आँसू की जगह
आँखों को ज़ख़्मी कर देती हैं शमशीरें पानी की
जाम हुए रौशन यूँ जैसे रौशन होते जाएँ चराग़
रंग-बिरंगी हमनें देखी हैं तासीरें पानी की
धुंधला-धुंधला हो जाता है मंज़र जो भी हो 'गुलशन'
आँखों में जब जश्न मनाती हैं तस्वीरें पानी की
राहे उल्फ़त में मुक़ामात पुराने आए
राहे उल्फ़त में मुक़ामात पुराने आए
तुम न आए तो मुझे याद फ़साने आए
वक़्ते-रुख़्सत न दिया साथ ज़ुबाँ ने लेकिन
अश्क बन कर मेरी आँखों में तराने आए
रात के वक़्त हर इक सिम्त थे नक़ली सूरज
साए थे अस्ल जो किरदार निभाने आए
वक़्त आता ही नहीं लौट के ये बात है झूठ
मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आए
ज़िन्दगी हार गई हार का मातम न किया
ऐसे लम्हात तो कितने ही न जाने आए
घर मेरा जल गया लेकिन ये तसल्ली है मुझे
आग जो दे के गए आग बुझाने आए
मेरे क़रीब जितने अँधेरे थे हट गए
मेरे क़रीब जितने अँधेरे थे हट गए
उनसे मिला तो मुझसे उजाले लिपट गए
दरिया जो दरमियान था, गहरा न था मगर
पानी में जब पड़े तो मेरे पैर कट गए
आया ख़याले-आशियाँ उड़ते हुए मुझे
फैले हुए हवा में, जो पर थे सिमट गए
मेरा फ़साना तुमने सभी को सुना दिया
वो दर्दो-ग़म जो मेरे थे, हिस्सों में बँट गए
नींदें उचट गईं मेरी आँखों से और फिर
ये हुआ कि ख़्वाब-सलौने उचट गए
देखा जब उसको सामने,रौशन हुए चराग़
दिल के तमाम रास्ते फूलों से पट गए
मिलने-जुलने की शुरुआत कहाँ से होती
मिलने-जुलने की शुरुआत कहाँ से होती
फ़ासले थे तो मुलाक़ात कहाँ से होती
एक बस आग-सी सीने में लिए फिरते रहे
ऎसे बादल थे तो बरसात कहाँ से होती
क़ैद कर ही लिया सूरज को जब आँखों ने तो फिर
दिल की दुनिया में कोई रात कहाँ से होती
राह में बन गई दीवार हया की परतें
बन्द आँखें थीं कोई बात कहाँ से होती
हमको मालूम था, है कौन हमारा दुश्मन
ऎसी सूरत में कोई घात कहाँ से होती
मंज़र क्या पसमंज़र मेरे सामने है
मंज़र क्या पसमंज़र मेरे सामने है फूल नहीं है पत्थर मेरे सामने है
मैं तो अपनी प्यास बुझाने आया था प्यासा एक समंदर मेरे सामने है
जान से जाऊँ या में उसकी बात रखूँ ख़ून में डूबा ख़ंजर मेरे सामने है
साहिल मिल जाए तो पार उतर जाऊँ चारों सम्त समंदर मेरे सामने है
सच खोलूँ तो ख़ून बहेगा सड़कों पर इक झूठा आडंबर मेरे सामने है
सोच रहा हूँ आईने से लोहा लूँ मुझसा एक सिकंदर मेरे सामने है
बहुत ख़फ़ा हैं वो आज हमसे
बहुत ख़फ़ा हैं वो आज हमसे हमें बस इतना जता रहे हैं
हमी से नज़रें मिलाना सीखे हमी से नज़रें चुरा रहे हैं
गिरा-गिरा कर दिलों पे बिजली कमाल अपना दिखा रहे हैं
कभी वो पर्दा उठा रहे हैं,कभी वो पर्दा गिरा रहे हैं
अजब तमाशा है ये मुहब्बत,खिलाए गुल क्या,खु़दा ही जाने
लिखा था हमने जो ख़ूने-दिल से,वो आँसुओं से मिटा रहे हैं
है उनके होठों पे जामे-सेहबा,हमारी क़िस्मत में चन्द आँसू
वो अपना मौसम बना रहे हैं,हम अपने ग़म को भुला रहे हैं
न लफ़्ज़ कोई,न लब पे जुम्बिश कलाम आँखों से हो रहा है
उन्हें हम अपनी सुना रहे हैं,हमें वो अपनी सुना रहे हैं
दिल है उसी के पास,हैं साँसें उसी के पास
दिल है उसी के पास,हैं साँसें उसी के पास
देखा उसे तो रह गईं आँखें उसी के पास
बुझने से जिस चराग़ ने इन्कार कर दिया
चक्कर लगा रही हैं हवाएँ उसी के पास
मज़हब का नाम दीजिए या कोई और नाम
सब जा रही हैं दोस्तो राहें उसी के पास
वो दूर तो बहुत है मगर इसके बावजूद
गुज़री हैं फ़ुर्क़तों की भी रातें उसी के पास
उसको पता नहीं है वफ़ा क्या है,क्या जफ़ा
हम छोड़ आए दिल की किताबें उसी के पास
दिल को सुकून दीदा-ए-तर ने नहीं दिया
दिल को सुकून दीदा-ए-तर ने नहीं दिया
ज़ख़्मों को नम हवाओं ने भरने नहीं दिया
दामन पे आँसुओं को बिखरने नहीं दिया
दरिया को साहिलों से उभरने नहीं दिया
हमने ग़मों के साथ गुज़ारी है ज़िन्दगी
मंज़र कोई ख़ुशी का नज़र ने नहीं दिया
ये और बात मिल गई मंज़िल हमें मगर
मंज़िल का नक्श राहगुज़र ने नहीं दिया
तूफ़ाँ तो बरख़िलाफ़ था उसका गिला नहीं
मौजों ने भी तो मुझको उभरने नहीं दिया
तुमने कितनी क़समें खाईं याद करो
तुमने कितनी क़समें खाईं याद करो
हम थे तुम्हारी ही परछाईं याद करो
फूल बहुत ख़ुशबू देते थे चाहत के
कलियाँ फिर कैसे कुम्हलाईं याद करो
पहले था ख़ामोश मुहब्बत का दरिया
लहरें फिर कैसी लहराईं याद करो
कितनी सुहानी थी वो रंगों की दुनिया
रातें फिर कितनी गहराईं याद करो
कितने वादे कितने इरादे थे दिल में
भूल गए तुम सब कुछ साईं याद करो
जो ख़त लिखे हुए थे किताबों में रह गए
जो ख़त लिखे हुए थे किताबों में रह गए
आँखों में जितने ख़्वाब थे आँखों में रह गए
ऐसी हवा चली कि बुझाती गई चराग़
यानी उजाले क़ैद चराग़ों में रह गए
गु्मनाम हो गए कई चेहरे जो आम थे
जो चेहरे आफ़्त्ताब थे यादों में रह गए
फ़स्ले-ख़िज़ाँ ने तोड़ लीं कलियाँ उमीद की
खिलने से अबके फूल बहारों में रह गए
सुलझा रही थी ज़िन्दगी उलझे हुए सवाल
आई क़ज़ा सवाल क़तारों में रह गए