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शनिवार, मई 16, 2009

सच ढूंढ्ता रहा शहादत देखिये

सच ढूँढ़ता रहा शहादत देखिये।
झूठ की हो भी गई ज़मानत देखिये।

अब मौत के आसार हैं ज़्यादा क्योंकि
कड़ी कर दी गई है हिफ़ाज़त देखिए।

भ्रष्टाचार का जंगल तैयार क्यों न हो,
वृक्षारोपण कर रही है सिसायत देखिये।

घरों को बौना रखने के आदेश जो दे गये है‍,
आसमान चूमती उनकी आप ईमारत देखिये।

विज्ञापनों के खूंटे में टंगा अखबार,
क्या लिखेगा सच की इबारत देखिये।

सच के लिबास में दिखाई देना।

सच के लिबास में दिखाई देना।
और पेशा है झूठी सफाई देना।

यूं चीखने से बात नहीं बनती,
मायने रखता है सुनाई देना।

लाद गया वो किताबों के भारी बस्ते,
मैने कहा था बच्चों को पढ़ाई देना।

जो दर्द दिए तूने उसका हिसाब कर,
फिर मुझे नए साल की बधाई देना।

कितना अच्छा है पत्त्थर पूजने से,
बीमार ग़रीबों को दवाई देना।

परिंदो का पिजरे में लौट आना है अलग,
अलग बात है उन्हें पिंजरे से रिहाई देना।

शिवालों मस्जिदों को छोड़ता क्यों नहीं

शिवालों मस्जिदों को छोड़ता क्यों नहीं।
ख़ुदा है तो रगों में दौड़ता क्यों नहीं।

लहूलुहान हुए हैं लोग तेरी ख़ातिर,
ख़ामोशी के आलम को तोड़ता क्यों नहीं।

कहदे की नहीं है तू गहनों से सजा पत्थर,
आदमी की ज़हन को झंझोड़ता क्यों नहीं,

पेटुओं के बीच कोई भूखा क्यों रहे,
अन्याय की कलाई मरोड़ता क्यों नहीं।

झुग्गियाँ ही क्यों महल क्यों नहीं,
बाढ़ के रुख को मोड़ता क्यों नहीं।

ये बजट आपका हमको तो गवारा नहीं

ये बजट आपका हमको तो गवारा नहीं।
चिड़ियों को घोंसले जिसमें पशुओं को चारा नहीं।

यूँ ही माथा गर्म नहीं, है ये दिमागी बुखार,
पिघलते ग्लेशियरों का समझते क्यों इशारा नहीं।

मंगल और वीर को वो शाकाहारी वेष्णो,
जिस्म नोच कर खाते हैं पर वक़्त सारा नहीं।

औहदे और दाम तो हमको भी थे मिल रहे,
संस्कारों का लिबास मगर हमीं ने ही उतरा नहीं।

महलों से निकलकर झुग्गियों में फ़ैल गई,
गमलों की ज़िन्दगी में खुशबु का गुज़ारा नहीं।

जाने अब तक कितने तूफान पी गया है,
इस समंदर का पानी यूँ ही तो खारा नहीं,

दो रोटियों का वो चुटकी में हल करता है सवाल,
ये पत्थर का खुदा तो मगर हमारा नहीं।

मत पूछो क्या है हाल शहर में

मत पूछो क्या है हाल शहर में।
ज़िन्दगी हुई है बवाल शहर में।

कुछ लोग तो हैं बिल्कुल लुटे हुए,
कुछ हैं माला-माल शहर में।

झुलसी लाशों की बू हर तरफ,
कौन रखे नाक पर रूमाल शहर में।

चोर,लुटेरे, डाकू और आतंकवादी,
सब नेताओं के दलाल शहर में।

भौंकते इंसानों को देखकर,
की कुत्तों ने हड़ताल शहर में।

मुहब्बत के मकां ढहने लगे,
मज़हब का आया भूंचाल शहर में।

बिना घूंस के मिले नौकरी,
ये उठता ही नहीं सवाल शहर में।

भोर का वहम पाले उनको ज़माना हुआ

भोर का वहम पाले उनको ज़माना हुआ।
कब सुनहरी धूप का गुफाओं में जाना हुआ।

रख उम्मीद कोई दिया तो जलेगा कभी,
भूख के साथ पैदा हमेशा ही दाना हुआ।

मर्यादा में था तो सुरों में न ढल सका,
शब्दों को नंगा किया तो ये गाना हुआ।

तरकश उनका तीरों से हो गया ख़ाली मगर,
मेरे हौसले ने अभी भी है सीना ताना हुआ।

हो आपको ही मुबारक ये मख़मली अहसास,
जो चुभता ही नहीं वो भी क्या सिरहाना हुआ।

थोड़ी सी नींद जब चिंताओं से मांगी उधार,
लो सज-धज के कमवख़्त का भी आना हुआ।

जिसमें दिल की धड़कन ही न शामिल हुई,
वो भला क्या हाथों में मेंहदी लगाना हुआ।

भाव कुंद कर दे वो पैमाना न दरमियान रख

भाव कुंद कर दे वो पैमाना न दरमियान रख।
मेरे ख्यालों की बस ऊंची उड़ान रख।

दिल से दिल का कोई फासला न हो,
कुछ इस सलीके से गीता और कुरान रख।

बहुत हुई महलों की फिक्र, छोड़ दे,
बेघरों के हिस्से में भी कोई मकान रख।

बस्तियां रौंद लेगी ये नदी रोकी हुई,
ज़रूरत से ज़्यादा न तू अपना विज्ञान रख।

अश्ललीलता को जो तालीम मान बैठै हैं,
उन बच्चों के ज़हन में बड़ों को सम्मान रख।

तिलमिला उठा वो, जो मैने ये गुज़ारिश की,
मेरे होठों पर भी थोड़ी सी मुस्कान रख।

बोलता नहीं लेकिन बड़बड़ाता तो है

बोलता नहीं लेकिन बड़बड़ाता तो है
सच होंठ पर लेकिन आता तो है।

अर्श शौक से अब ओले उड़ेल दे,
मूंडे गए सरों के पास छाता तो है।

तेरी मंज़िल मिले न मिले क्या पता,
है तय ये रस्ता कहीं जाता तो है।

फिज़ाओं में यूँ ही नहीं है हलचल,
तीर चुपके से कोई चलाता तो है।

दुश्मन व्यवस्था को टुकड़े न समझें,
दिशाओं का आपस में नाता तो है।

खुद ही चप्पु न चलाओ तो क्या बने,
वक्त कश्ती में तुम्हें बिठाता तो है।

कोई भी संवरने को यहां नहीं राज़ी,
वक्त सब को आईना दिखाता तो है।

हमारी जिद कि हम तमाशा न हुए,
हँसना ज़माने को वरना आता तो है।

जब-जब मैं सच कहता हूं

जब-जब मैं सच कहता हूं।
सब को लगता कड़वा हूं।

वो मेरी टांग की ताक में है,
कि कब मैं ऊपर उठता हूं।

जो भी नोक पर आते हैं,
बस उनको ही चुभता हूं।

उम्र में जमा सा बढ़ता हूं,
जीवन से नफी सा घटता हूं।

तू जो मुझ पर मरती है,
इसीलिये तो जीता हूं।

वो नाखून दिखाने लगते हैं,
घावों की बात जो कहता हूं।

तूफान खड़ा हो जाता है,
जब तिनका-तिनका जुड़ता हूं।

जब हों जेबें खाली साहब

जब हों जेबें खाली साहब।
फिर क्या ईद दीवाली साहब।

तिनका - तिनका जिसने जोड़ा,
वो चिडिया डाली-डाली साहब।

सब करतब मजबूरी निकलेँगे,
जो बंदर से आंख मिला ली साहब।

कंक्रीटी भाषा बेशक सबकी हो,
पर अपनी तो हरियाली साहब।

मौसम ने सब रंग धो दिये,
सारी भेडें काली साहब।

आधार की बातें, सब किस्से उसके,
दो बैंगन को थाली साहब।

जब अच्छे से जांचा - परखा,
सारे रिश्ते जाली साहब।

जब से तेरे प्यार में पागल रहा हूं मैं

जब से तेरे प्यार में पागल रहा हूं मैं।
शहर भर की तबसे हलचल रहा हूं मैं।

मेरी भाषा अब ये समंदर क्या जाने,
कि नदी में बहती हुई कल-कल रहा हूं मैं,

बर्फ हूं मेरे नाम से ठिठुरते हैं सभी,
पहाडों पर लेकिन बिछा कंबल रहा हूं मैं।

आग आरियां,तूफान, बारिश, साजिशें सब बौनी हुई,
लहलहाता हुआ मगर जंगल रहा हूं मैं।

होकर माला-माल शून्य कई लौट गए,
भूल गये कि उनका एक हासिल रहा हूं मैं।

डाकू तो रह रहे सब संसद की शरण में,
बस नाम का ही अब चंबल रहा हूं मैं।

चिकने चेहरे इतने भी सरल नहीं होते

चिकने चेहरे इतने भी सरल नहीं होते।
ये वो मसले हैं जो आसानी से हल नहीं होते।

कुछ ही पलों की चमक और खुशबू इनकी,
ये फूल किसी का कभी संबल नहीं होते।

भूखों में बाँट दीजिए जो बचा रखा है,
जीवन के हिस्से में कभी कल नहीं होते।

शायर वो क्या, क्या उनकी शायरी,
जो ख़ुद झूमती हुई ग़ज़ल नहीं होते।

कोख़ माँ की किसी को न जब तलक मिले,
बीज कैसे भी हों, फ़सल नहीं होते।

विवशताओं ने पागल कर दिया होगा,
ख़्याल बचपने से कभी चँबल नहीं होते।

जम गई होगी वक्त की धूल वरना,
आईने की प्रकृति में छल नहीं होते।

ऐसा नहीं के ज़िंदा जंगल नहीं है

ऐसा नहीं के ज़िंदा जंगल नहीं है
गांव के नसीब बस पीपल नहीं है।

ये आंदोलन नेताओं के पास हैं गिरवी,
दाल रोटी के मसलों का इनमें हल नहीं है।

चील, गिद्ध, कव्वे भी अब गीत गाते हैं,
मैं भी हूं शोक में, अकेली कोयल नहीं है।

ज़रूरी नहीं के मकसद हो उसका हरियाली,
विश्वासपात्रों में मानसून का बादल नहीं है।

उसके सीने से गुज़री तो आह निकल गई,
जो मेरी ग़ज़ल को कहता रहा,ग़ज़ल नहीं है।

जिनका पसीना उगलता है बिजलियां,
रौशनी का नसीब उन्हें आंचल नहीं है।

इस क़दर भी उजाले न हों

इस क़दर भी उजाले न हों
घर आग के निवाले न हो।

प्यासे हलक से गुज़रे न जब तलक,
नदी समन्दर के हवाले न हों।

बोल प्यार के हों ग़ज़ल की राह में,
मस्जिद न हो और शिवाले न हों।

सूरज अबके ऐसी भी धूप न बाँटे,
कि पहाड़ पर बर्फ़ के दुशाले न हों।

खुशियों की मकड़ियों का वहाँ गुज़र नहीं,
ग़मों के जिस घर में जाले न हों।

इस हमाम में सब नंगे नज़र आएंगे।
सच की ज़बान पर जो ताले न हों।

इरादे जिस दिन से उड़ान पर हैं

इरादे जिस दिन से उड़ान पर हैं।
हजारों तीर देखिये कमान पर हैं।

लोग दे रहे हैं कानों में उँगलियाँ,
ये कैसे शब्द आपकी जुबां पर है।

मेरा सीना अब करेगा खंजरों से बगावत,
कुछ भरोसा सा इसके बयान पर हैं।

मजदूरों के तालू पर कल फिर दनदनाएगा,
सूरज जो आज शाम की ढलान पर है।

झुग्गियों की बेबसी तक भी क्या पहुंचेगी,
ये बहस जो गीता और कुरान पर है।

मजदूर,मवेशी, मछुआरे फिर मरे जाएंगे,
सावन देखिये आगया मचान पर है,

मक्कारों और चापलूसों से दो चार कैसे होगा,
तेरे पैर तो अभी से थकान पर है ।

आदमी जैसे ही कुछ अजगरों के बीच

आदमी जैसे ही कुछ अजगरों के बीच।
चंदन सी ज़िंदगी है विषधरों के बीच।

ये,वो,,मैं, तू हैं सब तमाशबीन,
लहूलुहान सिसकियां हैं खंजरों के बीच।

शहर के मज़हब से नवाकिफ़ अंजान वो,
बातें प्यार की करे कुछ सरफिरों के बीच।

भरी सभा में द्रौपदी सा चीख़े मेरा देश,
कब आओगे कृष्ण इन कायरों के बीच।

ख़ुद ही अब बताएंगे के हम ख़ुदा नहीं,
आज गुफ़्तगू हुई ये पत्थरों के बीच।

आंसू इसलिये आंख से छलकाता नहीं मैं,
कुछ मछलियां भी रहतीं हैं सागरों की बीच।