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शनिवार, मार्च 13, 2010

हुस्ने-सीरत पर नज़र कर

हुस्ने-सीरत पर नज़र कर, हुस्ने-सूरत को न देख।
आदमी है नाम का गर ख़ू नहीं इन्सान की॥

ध्यान आता है कि टूटा था, ग़लमफ़हमी में अहद।
यादगार इक है तो धुंधली सी मगर किस शान की॥

हिम्मते-कोताह से दिल तंगेज़िन्दाँ बन गया

हिम्मते-कोताह से दिल तंगेज़िन्दाँ बन गया।
वर्ना था घर से सिवा इस घर का हर गोशा वसीअ़॥

छोड़ दे दो गज़ ज़मीं, है दफ़्न जिसमें इक गरीब।
है तेरी मश्क़े-ख़िरामेनाज़ को दुनिया वसीअ़॥

है यह सब किस्मत की कोताही वगर्ना ‘आरज़ू’।
बढ़के दामाने-तलब से हाथ है उसका वसीअ़॥

हर दाने पै इक क़तरा, हर क़तरे पै इक दाना

हर दाने पै इक क़तरा, हर क़तरे पै इक दाना।
इस हाथ में सुमरन है, उस हाथ में पैमाना॥

कुछ तंगियेज़िन्दाँ से दिलतंग नहीं वहशी।
फिरता है निगाहों में, वीरना-ही-वीराना॥

हमारा ज़िक्र जो ज़ालिम को अंजुमन में नही

हमारा ज़िक्र जो ज़ालिम को अंजुमन में नही।
जभी तो दर्द का पहलू किसी सुख़न में नहीं॥

शहीदे-नाज़ की महशर में दे गवाही कौन?
कोई लहू का भी धब्बा मेरे कफ़न में नहीं॥

उनका नाम आया तो क्या

साथ हर हिचकी के लब पर उनका नाम आया तो क्या?
जो समझ ही में न आये वो पयाम आया तो क्या?

मय से हूँ महरूप अब भी, जो शरीके-दौर हूँ।
पाए साक़ी से जो ठोकर खाके जाम आया तो क्या?

सरूरे-शब का नहीं, सुबह का ख़ुमार हूँ मैं

सरूरे-शब का नहीं, सुबह का ख़ुमार हूँ मैं।
निकल चुकी है जो गुलशन से वो बहार हूँ मैं॥

करम पै तेरे नज़र की तो ढै गया वह गरूर।
बढ़ा था नाज़ कि हद का गुनहगार हूँ मैं॥

सबब बग़ैर था हर जब्र क़ाबिले इल्ज़ाम

सबब बग़ैर था हर जब्र क़ाबिले इल्ज़ाम।
बहाना ढूंढ लिया, देके अख्तियार मुझे॥

किया है आग लगाने को बन्द दरवाज़ा।
कि होंट सी के बनाया है राज़दार मुझे॥

रहते न तुम अलग-थलग हम न गुज़रते आप से

रहते न तुम अलग-थलग हम न गुज़रते आप से।
चुपके से कहनेवाली बात कहनी पड़ी पुकार के॥

पूछी थी छेड़कर जो बात, कहने न दी वो बात भी।
तुमने खटकती फ़ाँस को छोड़ दिया उभार के॥

यह मेरी तौबा नतीजा है बुखले-साक़ी का

यह मेरी तौबा नतीजा है बुखले-साक़ी का।
ज़रा-सी पी के कोई मुँह ख़राब क्या करता?

यही थी ज़ीस्त की लज़्ज़त यही थी इश्क़ की शान।
शिकायते-तपिशो-इज़्तराब क्या करता॥

मुझे मिटा तो दिया क़ब्ल अहदेपीरी के।
सलूक और दो रोज़ा शबाब क्या करता॥

यह बहरेइश्क का तूफ़ान और ज़रा-सा दिल।
जहाज़ उलट गये लाखों हुबाब क्या करता॥

पड़े न होते जो ग़फ़लत के ‘आरज़ू’! परदे।
खु़दा ही जाने यह जोशेशबाब क्या करता॥

मुझे रहने को वो मिला है घर

मुझे रहने को वो मिला है घर कि जो आफ़तों की है रहगुज़र।
तुम्हें ख़ाकसारों की क्या खबर, कभी नीचे उतरे हो बाम से?

जो तेरे अमल का चराग़ है, वही बेमहल है तो दाग़ है।
न जला के बैठ उसे सुबह से, न बुझा के सो उसे शाम से॥

मुझ ग़मज़दा के पास से सब रो के उठे हैं

मुझ ग़मज़दा के पास से सब रो के उठे हैं।
हाँ आप इक ऐसे हैं कि ख़ूश होके उठे हैं॥

मुँह उठके तो सब धोते हैं ऐ दीदये-खूंबाज़।
बिस्तर से हम उठे हैं तो मुँह धोके उठे हैं॥

महमाँनवाज़, वादिये-गु़रबत की ख़ाक थी

महमाँनवाज़, वादिये-गु़रबत की ख़ाक थी।
लाशा किसी ग़रीब का उरियाँ नहीं रहा॥

आँसू बना जबीं का अरक़ ज़ब्ते-अश्क़ से।
बदला भी ग़म ने भेस तो पिन्हाँ नहीं रहा॥

ज़बाँ का फ़र्क़ हक़ीक़त बदल नहीं सकता।
यह कोई बात नहीं, बुत कहा खुदा नहीं रहा॥

भले दिन आये तो आज़ार बन गया आराम

भले दिन आये तो आज़ार बन गया आराम।
क़फ़स के तिनके भी काम आ गए नशेमन के॥

मिटा के फिर तो बनाने पर अब नहीं काबू।
वो सर झुकाए खड़े है, क़रीब मदफ़न के॥

फिर ‘आरजू’ को दर से उठा, पहले यह बता

फिर ‘आरजू’ को दर से उठा, पहले यह बता।
आखिर ग़रीब जाये कहाँ और कहाँ रहे॥
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था शौके़दीद ताब-ए-आदाबे-बज़्मेनाज़।
यानी बचा-बचा के नज़र देखते रहे॥

अहले-क़फ़स का ख़ौफ़ज़दा शौक़ क्या कहूँ?
सूएचमन समेट के पर देखते रहे॥

पलक झपकी कि मंज़र खत्म था बर्क़े-तजल्ली का

पलक झपकी कि मंज़र खत्म था बर्क़े-तजल्ली का।
ज़ता सी न्यामतेदीद, उसका भी यूँ रायगाँ जाना॥

समझ ले शमा से ऐ हमनशीं! आदाबे-ग़मख्वारी।
ज़बाँ कटवानेवाले का है, मन्सब राज़दाँ होना॥

नैरंगियाँ चमन की तिलिस्मे-फ़रेब हैं

नैरंगियाँ चमन की तिलिस्मे-फ़रेब हैं।
उस जा भटक रहा हूँ जहाँ आशियाँ न था॥

पाबंदियों ने खोल दी आँखें तो समझे हम।
आकर क़फ़स में बस गए थे आशियाँ न था॥

जो दर्द मिटते-मिटते भी मुझको मिटा गया।
क्या उसका पूछना कि कहाँ था कहाँ न था॥

अब तक वो चारासाज़िए-चश्मेकरम है याद।
फाहा वहाँ लगाते थे, चरका जहाँ न था॥

नालाँ ख़ुद अपने दिल से हूँ दरबाँ को क्या कहूँ

नालाँ ख़ुद अपने दिल से हूँ दरबाँ को क्या कहूँ।
जैसे बिठाया गया है, कोई पाँव तोड़ के॥

क्या जाने टपके आँख से किस वक़्त खू़नेदिल।
आँसू गिरा रहा हूँ जगह छोड़-छोड़ के॥

नादाँ की दोस्ती में जी का ज़रर न जाना

नादाँ की दोस्ती में जी का ज़रर न जाना।
इक काम कर तो बैठे, और हाय कर न जाना॥

नादानियाँ हज़ारों, दानाई इक यही है।
दुनिया को कुछ न जाना और उम्र भर न जाना॥

नादानियों से अपनी आफ़त में फ़ँस गया हूँ।
बेदादगर को मैंने बेदादगर न जाना॥

न यह कहो "तेरी तक़दीर का हूँ मै मालिक"

न यह कहो "तेरी तक़दीर का हूँ मैं मालिक।
बनो जो चाहो ख़ुदा के लिए, ख़ुदा न बनो॥

अगर है जुर्मे-मुहब्बत तो ख़ैर यूँ ही सही।
मगर तुम्हीं कहीं इस जुर्म की सज़ा न बनो॥

मिले भी कुछ तो है बेहतर तलब से इस्तग़ना[1]।
बनो तो शाह बनो, ‘आरज़ू’! गदा[2] न बनो॥
शब्दार्थ:

↑ सन्तोष
↑ भिक्षुक

दो घडी़ को दे-दे कोई अपनी आँखों की जो नींद

दो घडी़ को दे-दे कोई अपनी आँखों की जो नींद।
पाँव फैला दूँ गली में तेरी सोने के लिए॥

मिट भी सकती थी कहीं, बेरोये छाती की जलन।
आग को पिघला लिया फाहा भिगोने के लिए॥