वे शायरों की कलम बेज़ुबान कर देंगे
जो मुँह से बोलेगा उसका ‘निदान’ कर देंगे
वे आस्था के सवालों को यूं उठायेंगे
खुदा के नाम तुम्हारा मकान कर देंगे
तुम्हारी ‘चुप’ को समर्थन का नाम दे देंगे
बयान अपना, तुम्हारा बयान कर देंगे
तुम उन पे रोक लगाओगे किस तरीके से
वे अपने ‘बाज’ की ‘बुलबुल’ में जान कर देंगे
कई मुखौटों में मिलते है उनके शुभचिंतक
तुम्हारे दोस्त, उन्हें सावधान कर देंगे
वे शेखचिल्ली की शैली में, एक ही पल में
निरस्त अच्छा-भला ‘संविधान’ कर देंगे
तुम्हें पिलायेंगे कुछ इस तरह धरम-घुट्टी
वे चार दिन में तुम्हें ‘बुद्धिमान’ कर देंगे
शनिवार, फ़रवरी 20, 2010
वे शायरों की कलम बेज़ुबान कर देंगे
फूल के बाद फलना ज़रूरी लगा
फूल के बाद फलना ज़रूरी लगा,
भूमिकाएँ बदलना ज़रूरी लगा।
दर्द ढलता रहा आँसुओं में मगर
दर्द शब्दों में ढलना ज़रूरी लगा।
'कूपमंडूक' छवि को नमस्कार कर,
घर से बाहर निकलना ज़रूरी लगा।
अपने द्वंद्वों से दो-चार होते हुए,
हिम की भट्टी में जलना ज़रूरी लगा।
मोमबत्ती से उजियारे की चाह में,
मोम बन कर पिघलना ज़रूरी लगा।
उनके पैरों से चलकर न मंज़िल मिली,
अपने पाँवों पे चलना ज़रूरी लगा।
आदमीयत की रक्षा के परिप्रेक्ष्य में
विश्व-युद्धों का टलना ज़रूरी लगा।
मुस्कुराना भी एक चुम्बक है
मुस्कुराना भी एक चुम्बक है,
मुस्कुराओ, अगर तुम्हें शक है!
उसको छू कर कभी नहीं देखा,
उससे सम्बन्ध बोलने तक है।
डाक्टर की सलाह से लेना,
ये दवा भी ज़हर-सी घातक है।
दिन में सौ बार खनखनाती है
एक बच्चे की बंद गुल्लक है।
उससे उड़ने की बात मत करना,
वो जो पिंजरे में अज बंधक है।
हक्का-बक्का है बेवफ़ा पत्नी,
पति का घर लौटना अचानक है!
'स्वाद' को पूछना है 'बंदर' से,
जिसके हाथ और मुँह में अदरक है।
गगन तक मार करना आ गया है
गगन तक मार करना आ गया है,
समय पर वार करना आ गया है ।
उन्हें......कविता में बौनी वेदना को,
कुतुब-मीनार करना आ गया है !
धुएँ की स्याह चादर चीरते ही,
घुटन को पार करना आ गया है ।
अनैतिक व्यक्ति के अन्याय का अब,
हमें प्रतिकार करना आ गया है ।
खुले बाजार में विष बेचने को,
कपट व्यवहार करना आ गया है ।
हम अब जितने भी सपने देखते हैं,
उन्हें साकार करना आ गया है ।
शिला छूते ही, नारी बन गई जो,
उसे अभिसार करना आ गया है
मुस्कानों की सेल लगी है चेहरों पर
चित्रलिखित मुस्कान सजी है चेहरों पर,
मुस्कानों की सेल लगी है चेहरों पर ।
शहरों में, चेहरों पर भाव नहीं मिलते,
भाव-हीनता ही पसरी है चेहरों पर ।
लोग दूसरों की तुक-तान नहीं सुनते,
अपना राग, अपनी डफली है चेहरों पर ।
दोस्त ठहाकों की भाषा ही भूल गए,
एक खोखली हँसी लदी है चेहरों पर ।
लोगों ने जो भाव छिपाए थे मन में,
उन सब भावों की चुगली है चेहरों पर ।
मीठे पानी वाली नदियाँ सूख गई,
खारे पानी की नद्दी है चेहरों पर ।
एक गैर-मौखिक भाषा है बहुत मुखर,
शब्दों की भाषा गूँगी है चेहरों पर ।
सपने अनेक थे तो मिले स्वप्न-फल अनेक
सपने अनेक थे तो मिले स्वप्न-फल अनेक,
राजा अनेक, वैसे ही उनके महल अनेक।
यूँ तो समय-समुद्र में पल यानी एक बूंद,
दिन, माह, साल रचते रहे मिलके पल अनेक।
जो लोग थे जटिल, वो गए हैं जटिल के पास
मिल ही गए सरल को हमेशा सरल अनेक।
झगडे हैं नायिका को रिझाने की होड के,
नायक के आसपास ही रहते हैं खल अनेक।
बिखरे तो मिल न पाएगी सत्ता की सुन्दरी,
संयुक्त रहके करते रहे राज दल अनेक।
लगता था-इससे आगे कोई रास्ता नहीं,
कोशिश के बाद निकले अनायास हल अनेक।
लाखों में कोई एक ही चमका है सूर्य-सा
कहने को कहने वाले मिलेंगे ग़ज़ल अनेक।
आँखों की कोर का बडा हिस्सा तरल मिला
आँखों की कोर का बडा हिस्सा तरल मिला,
रोने के बाद भी, मेरी आँखों में जल मिला।
उपयोग के लिए उन्हें झुग्गी भी चाहिए,
झुग्गी के आसपास ही उनका महल मिला।
आश्वस्त हो गए थे वो सपने को देख कर,
सपने से ठीक उल्टा मगर स्वप्न-फल मिला।
इक्कीसवीं सदी में ये लगता नहीं अजीब,
नायक की भूमिका में लगातार खल मिला।
पूछा गया था प्रश्न पहेली की शक्ल म,
लेकिन, कठिन सवाल का उत्तर सरल मिला।
उसको भी कैद कर न सकी कैमरे की आँख,
जीवन में चैन का जो हमें एक पल मिला।
ऐसे भी दृश्य देखने पडते हैं आजकल,
कीचड की कालिमा में नहाता कमल मिला।
दबंगों की अनैतिकता अलग है
दबंगों की अनैतिकता अलग है,
उन्हें अन्याय की सुविधा, अलग है।
डराते ही नहीं अपराध उनको,
महल का गुप्त दरवाजा अलग है।
जिसे तुम व्यक्त कर पाए न अब तक,
वो दोनों ओर की दुविधा अलग है।
पतंगें कब लगीं आजाद पंछी,
पतंगों की तरह उडना अलग है।
जिसे महसूस करता हूँ मैं अक्सर,
तुम्हारी देह की दुनिया अलग है।
है स्वाभाविक किसी दुश्मन की चिन्ता,
निजी परछाईं से डरना अलग है।
वो चाहे छन्द हो या छन्द-हीना,
हमारे दौर की कविता अलग है।
उन्हें देखा गया खिलते कमल तक
उन्हें देखा गया खिलते कमल तक,
कोई झाँका नहीं झीलों के तल तक।
तो परसों, फिर न उसकी राह तकना,
जो भूला आज का, लौटा न कल तक।
न जाने, कब समन्दर आ गए हैं,
हमारी अश्रु-धाराओं के जल तक।
सियासत में उन्हीं की पूछ है अब,
नहीं सीमित रहे जो एक दल तक।
यही तो टीस है मन में लता के,
हुई पुष्पित, मगर, पहुँची न फल तक।
हजारों कलयुगी शंकर हैं ऐसे-
पचाना जानते हैं जो गरल तक।
जो बारम्बार विश्लेषण करेगा,
पहुँच ही जाएगा वो ठोस हल तक।
हमारे स्वप्न भी हम को जगाते हैं
हमारे भय पे पाबंदी लगाते हैं
अंधेरे में भी जुगनू मुस्कुराते हैं
बहुत कम लोग कर पाते हैं ये साहस
चतुर चेहरों को आईना दिखाते हैं
जो उड़ना चाहते हैं उड़ नहीं पाते
वो जी भर कर पतंगों को उड़ाते हैं
नहीं माना निकष हमने उन्हें अब तक
मगर वो रोज़ हमको आज़माते हैं
उन्हें भी नाच कर दिखलाना पड़ता है
जो दुनिया भर के लोगों को नचाते हैं
बहुत से पट कभी खुलते नहीं देखे
यूँ उनको लोग अक्सर खटखटाते हैं
हमें वो नींद में सोने नहीं देते
हमारे स्वप्न भी हम को जगाते हैं
सब की आँखों में नीर छोड़ गए
सब की आँखों में नीर छोड़ गए
जाने वाले शरीर छोड़ गए
राह भी याद रख नहीं पाई
क्या कहाँ राहगीर छोड़ गए
लग रहे हैं सही निशाने पर
वो जो व्यंगों के तीर छोड़ गए
हीर का शील भंग होते ही
रांझे अस्मत पे चीर छोड़ गए
एक रुपया दिया था दाता ने
सौ दुआएं फ़क़ीर छोड़ गए
उस पे क़बज़ा है काले नागों का
दान जो दान-वीर छोड़ गए
हम विरासत न रख सके क़ायम
जो विरासत कबीर छोड़ गए
घर छिन गए तो सड़कों पे बेघर बदल गए
घर छिन गए तो सड़कों पे बेघर बदल गए
आँसू, नयन— कुटी से निकल कर बदल गए
अब तो स्वयं—वधू के चयन का रिवाज़ है
कलयुग शुरू हुआ तो स्वयंवर बदल गए
मिलता नहीं जो प्रेम से, वो छीनते हैं लोग
सिद्धान्त वादी प्रश्नों के उत्तर बदल गए
धरती पे लग रहे थे कि कितने कठोर हैं
झीलों को छेड़ते हुए कंकर बदल गए
होने लगे हैं दिन में ही रातों के धत करम
कुछ इसलिए भि आज निशाचर बदल गए
इक्कीसवीं सदी के सपेरे हैं आधुनिक
नागिन को वश में करने के मंतर बदल गए
बाज़ारवाद आया तो बिकने की होड़ में
अनमोल वस्तुओं के भी तेवर बदल गए.
अँधेरे की सुरंगों से निकल कर
अँधेरे की सुरंगों से निकल कर
गए सब रोशनी की ओर चलकर
खड़े थे व्यस्त अपनी बतकही में
तो खींचा ध्यान बच्चे ने मचलकर
जिन्हें जनता ने खारिज कर दिया था
सदन में आ गए कपड़े बदलकर
अधर से हो गई मुस्कान ग़ायब
दिखाना चाहते हैं फूल—फलकर
लगा पानी के छींटे से ही अंकुश
निरंकुश दूध हो बैठा, उबलकर
कली के प्यार में मर—मिटने वाले
कली को फेंक देते हैं मसलकर
घुसे जो लोग काजल—कोठरी में
उन्हें चलना पड़ा बेहद सँभलकर
बहुत कम लोग घर को फूँक कर घर से निकलते हैं
वो हिम्मत करके पहले अपने अन्दर से निकलते हैं
बहुत कम लोग , घर को फूँक कर घर से निकलते हैं
अधिकतर प्रश्न पहले, बाद में मिलते रहे उत्तर
कई प्रति-प्रश्न ऐसे हैं जो उत्तर से निकलते हैं
परों के बल पे पंछी नापते हैं आसमानों को
हमेशा पंछियों के हौसले ‘पर’ से निकलते हैं
पहाड़ों पर व्यस्था कौन-सी है खाद-पानी की
पहाड़ों से जो उग आते हैं,ऊसर से निकलते हैं
अलग होती उन लोगों की बोली और बानी भी
हमेशा सबसे आगे वो जो ’अवसर’ से निकलते हैं
किया हमने भी पहले यत्न से उनके बराबर क़द
हम अब हँसते हुए उनके बराबर से निकलते हैं
जो मोती हैं, वो धरती में कहीं पाए नहीं जाते
हमेशा कीमती मोती समन्दर से निकलते हैं
महान लोगों ने उसको महान कर डाला
महान लोगों ने उसको महान कर डाला
ज़मीन था जो उसे आसमान कर डाला
निशा के साथ जो घटना घटी थी थाने में
उषा को उसने बहुत सावधान कर डाला
उसे ज़ुबान मिली थी वो बोलता भी था
सुअवसरों ने उसे बेज़ुबान कर डाला
वह अपने आप को सब से अलग समझता था
अकाल ने उसे सबके समान कर डाला
वो गर्म शाल जो उपहार में मिली थी उसे
उसे भी उसने भिखारिन को दान कर डाला
तीर ने जब कमान से देखा
दृश्य उड़ते विमान से देखा
बाढ़ को इत्मीनान से देखा
उसने सत्ता के अश्व पर चढ़
कर
जो भी देखा वो शान से देखा
मेरी आँखें चली गईं जबसे
मैंने दुनिया को कान से देखा
फ़ाइलों ने विकास का चेहरा
आँकड़ों की ज़ुबान से देखा
मैंने दिन भर की उसकी मेहनत को
रात भर की थकान से देखा
सेठ साहब ने झोंपड़ी का कद
अपने ऊँचे मकान से देखा
तीर होना तभी हुआ सार्थक
तीर ने जब कमान से देखा
कितने सपनों को आँजकर आया
कितने सपनों को आँजकर आया
गाँव जब भी महानगर आया
मेरे सिर पर जो हाथ उसने रखा
तो अनायास कण्ठ भर आया
वो निकष पर निकल गया पीपल
शुद्ध सोने-सा जो नज़र आया
उड़ते पंछी को रोकना चाहा
तो मेरे हाथ एक पर आया
सच्चे जोहरीच्का हाथ लगते ही
रूप पुखराज का निखर आया
मैने मुड़कर उधर नहीं देखा
जिस झरोखे से उसका स्वर आया
जो कभी दूर ले गया था मुझे
रास्ता वो ही मेरे घर आया
हंस का इम्तिहान बाकी है
हंस का इम्तिहान बाकी है
एक ऊँची उड़ान बाकी है
मेरे पैरों तले धरा न सही
शीश पर आसमान बाकी है
सूखे पनघट के घाट पर अब तक
रस्सियों का निशान बाकी है
गाँव में खण्डहर की सूरत में
उस हवेली की शान बाकी है
उसका रुँधने लगा गला लेकिन
आँसुओं की ज़ुबान बाकी है
आँकड़ों के सिवा, गरीबों पर
झुग्गियों का बयान बाकी है
यात्रा खत्म हो गई लेकिन
यात्रा की थकान बाकी है
आदमी से बड़े जंगली जानवर
जंगलों से चले जंगली जानवर
शहर में आ बसे जंगली जानवर
आदमी के मुखौटे लगाए हुए
हर कदम पर मिले जंगली जानवर
आप भी तीसरी आँख से देखकर
खुद ही पहचानिए जंगली जानवर
एक औरत अकेली मिली जिस जगह
मर्द होने लगे जंगली जानवर
आप पर भी झपटने ही वाला है वो
देखिए...देखिए..जंगली जानवर!
बन्द कमरे के एकान्त में प्रेमिका
आपको क्या कहे-जंगली जानवर!
आजकल जंगलों में भी मिलते नहीं
आदमी से बड़े जंगली जानवर
बंदिशों की सज़ा से डरता है
बंदिशों की सज़ा से डरता है
आदमी दासता से डरता है
जो दीये की शिखा से जल बैठा
वो दीये की शिखा से डरता है
वक्त केवल पिरामिडों जैसी
सदियों लम्बी कला से डरता है
आगे खतरा हो जिससे शोषण का
रूप उसकी कृपा से डरता है
जिसकी सूरत कभी नहीं देखी
आदमी उस खुदा से डरता है
हो जहाँ वास्तव में जन-सत्ता
उसका शासक प्रजा से डरता है
रोग डरता नहीं दवाओं से
रोग केवल दुआ से डरता है