मंगलवार, अप्रैल 14, 2009

छायावाद और महादेवी

छायावाद' हिन्दी कविता के भीतर ÷ पैराडाइम शिफ्ट' का प्रमाण है। परन्तु यह परिवर्तन हिन्दी काव्य परम्परा का जैसा कि रामविलास शर्मा और डॉ. नामवर सिंह ने कहा है, भक्तिकाव्य के बाद काव्य और सामाजिक चेतना दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण विकास है। यह विकास यात्र घनानन्द, आलम, बोधा, श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी आदि से होती हुई छायावाद तक पहुंची है। स्वाधीनता बोध, सत्याग्रह, हृदय से बुद्धि का अनुशासन, स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह, असीम और ससीम का मिलन, सुख दुख की पारस्परिकता, सान्त्वनापरकता, काल की चक्रीयता, प्रतीकात्मकता, अस्पष्टता, लाक्षणिकता, संकेतपरकता, व्यक्त के बजाय अव्यक्त पर बल, वर्जित स्पर्श और काव्यात्मक ÷ मैं' में हम की क्रमिक स्वीकृति आदि विशेषताओं से समृद्ध छायावाद के कारण साहित्य और समाज में व्याप्त अनेक प्रकार की रूढ़ियों और बन्धनों से मुक्ति की चेतना विकसित हुई। वैयक्तिक पीड़ा, दुःख तथा वेदना की निजी और सार्वदेशिक अस्ति और भवति की स्वीकृति और निजी प्रेम की अभिव्यक्ति का साहस और संकल्प विकसित हुआ। सार्वदेशिक पीड़ा - दुःख और वेदना निजता के विस्तार, या सूक्ष्म के द्वारा स्थूल को परिभाषित करने के परिणाम हैं। छायावादी कवि का प्रकृति वर्णन इस अर्थ में कवि की निजता का ही विस्तार है। यह विस्तार महादेवी में धीरे धीरे काव्य समय बन गया जिसके कारण कुछ आलोचकों ने इसे ÷ कृत्रिम'1 या ÷ बौद्धिक दुःखानुभूति'2 की संज्ञा दी। परतु महादेवी में बौद्ध धर्म के प्रभाव और पिछड़े इलाके में अधनंगे, अधभूखे, प्रताड़ित गरीबों और निम्न वर्गों के बीच काम करने से निर्मित करुणा ने संसार के अन्धकार, अज्ञान, दैन्य और पीड़ा को कम करने प्रेम करुणा के लिए दीपक की तरह अपने को विसर्जित करने की मूल्यचेतना विकसित की। शायद यही वजह है कि करीन शोमेर ने महादेवी के लिए self consuming lamp 3 का सार्थक शीर्षक दिया है। मुक्तिबोध में ÷ खून' शब्द का सर्वाधिक प्रयोग है तो ÷ दीपक' का सर्वाधिक प्रयोग महादेवी वर्मा ने किया है। ÷ दीप' ( नीहार) ÷ मधुर मधुर मेरे दीपक जल' ( नीरजा) और ÷ मोम सा तन गल चुका है' कविताओं को उद्धृत करते हुए शोमेर ने निष्कर्ष निकाला है कि ये कविताएं महादेवी के ÷ आत्मभक्षी दीप' अभिप्राय को ही व्याख्यायित नहीं करतीं बल्कि उनकी कविता की सामान्य मुद्रा और बुनावट का प्रतिनिधि रूप भी मानी जा सकती हैं।4

महादेवी उन महिलाओं में हैं जिन्होंने विवाह संस्थान को अस्वीकार किया। उनका विवाह एक डॉक्टर से हुआ पर विदा होकर उसके घर जाने से उन्होंने दृढ़तापूर्वक मना कर दिया। पिता ने विवाह के बन्धन से मुक्ति के लिए धर्म परिवर्तन की सलाह दी , बल्कि बेटी के लिए स्वयं भी धर्म परिवर्तन को तैयार हो गये लेकिन महादेवी ने इसको भी नकार दिया। उन्होंने अनेक धार्मिक सम्प्रदायों को टटोला था, वहां उन्हें स्त्री का अपमान और किसी न किसी प्रकार की सड़ान्ध ही दिखी। बौद्ध धर्म में दीक्षित होने गयीं, लौट आयीं, और अन्ततः गांधी के प्रभाव से सेवा का व्रत लिया। झूंसी में दरिद्र, प्रताड़ित, बेसहारा, निष्कासित और असहाय बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल खोला। पढ़ाने और जागरण का कार्य करने लगीं। भटकटैया के पौधे से लेकर ठण्ड से सिकुड़े पिल्लों और जीव जन्तुओं का संरक्षण, पालन पोषण करती रहीं। नीलकण्ठ की मृत्यु पर उसको रेशमी शाल में लपेट कर गंगा में परिजन की तरह प्रवाहित किया। दलित और निष्कासितों का आश्रय बनी रहीं। वहां उन्हें जीवन की वास्तविकाता के दर्शन हुए। ÷ अतीत के चलचित्र' और ÷ स्मृति की रेखाएं' इस प्रतीति के ÷ करुण' प्रगीत ही तो हैं। स्वाधीनता आन्दोलन में जेल जाने वाले परिवारों की लड़कियों को पढ़ाने और संरक्षण की जिम्मेदारी प्रयाग महिला विद्यापीठ के प्राचार्य के रूप में संभाली और इस राजनैतिक और सांस्कृतिक सामाजिक कार्य से जुड़ी रहीं। जीवन के अकेलेपन को साहित्य, पठन पाठन और सामाजिक कार्य से भरने का आजीवन प्रयत्न किया। घुटने टेक कर - झुक कर - उन्होंने कभी बात नहीं की। आपात्‌काल में भरी सभा में देश को कारागार बनाने का उल्लेख करते हुए उसका विरोध किया। मन्दिर के दीप की तरह अजिर के सूनेपन को प्रभाती तक भरने के आजीवन संकल्प और उससे प्राप्त आत्मसन्तोष की प्रतीति उनकी कविताओं में अन्तःप्रवाहित रक्त की तरह व्याप्त है।

महादेवी वर्मा की ÷ श्रृंखला की कड़ियां', और ÷ अबला' तथा ÷ विधवा' जैसी कविताएं, पढ़ते समय एक विचित्र प्रकार की प्रतीति होती है। भारतीय स्त्री का चित्र उनकी रचनाओं में धर्म, संस्कृति और समाज की नींव में चुने जाते हुए कंकड़ पत्थर की तरह दिखता है, यह चित्र करुणा और आक्रोश दोनों पैदा करता है। इतना ही नहीं, वह उसको कविता में रूपायित और सम्प्रेषित करने का एक मुहावरा भी विकसित करता है। वह स्त्री की नियति को पीड़ा, दुःख, विरह, चिर प्रतीक्षा आदि के मुहावरे में अभिव्यक्त करता है। उनके चित्रें में भी स्त्री का आत्मविसर्जनात्मक विकल्प है। रेखाचित्रें और संस्मरणों में अत्यन्त प्रताड़ना और क्रूरता के बावजूद - विद्रोह कम विसर्जन या आत्महत्या ही अन्ततः कर्णाधार है - यह सन्देश पाया जाता है। ऐसी अनेक कविताएं हैं जो महादेवी के जीवन की रिक्तता, एकाकीपन और अन्तरसुप्त व्यथा को व्यंजित करती हैं, लेकिन ऐसी भी अनेक कविताएं हैं जो संसार के गहन अंधेरे के खिलाफ लड़ने का संकल्प भी व्यक्त करती हैं। जैसे

शून्य मेरा जन्म था

अवसान है मुझको सवेरा

प्राण आकुल के लिए

संगी मिला केवल अंधेरा

सांध्यगीत

उनसे कैसे छोटा है

मेरा यह भिक्षुक जीवन?

उनमें अनन्त करुणा है

इसमें असीम सूनापन

नीहार

सब बुझे दीपक जला लूं

घिर रहा तम आज दीपक,

रागिनी अपनी जला लूं

क्षितिज कारा तोड़ कर अब

गा उठी अनन्त आंधी

अब घटाओं में न रुकती

लास तन्मय तड़ित बांधी

धूलि की इस वीणा पर मैं

दीपशिखा

महादेवी की घनिष्ठतम मित्र , सहपाठिनी कवि सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी के अन्तरंग क्षणों की बात का उल्लेख करते हुए प्रसिद्ध कथाकार और प्रेमचन्द की जीवनी ÷ कलम का सिपाही' के लेखक अमृत राय ने लिखा हैः

÷÷ दोनों स्त्रियां अपनी बातों में लीन, अपने परितृप्त बाल बच्चों में मगन बतियाये जा रही थीं कि एकाएक लगा कि जैसे कोई फूट फूट कर रो पड़ा। वह रोना जैसे फूटा था वैसे ही भीतर समा भी गया पर कमरे में एकाएक सन्नाटा छा गया। जो व्यक्ति रो पड़ा उसका यह रूप इतना अप्रत्याशित था कि सब जैसे सकते में आ गये। शुभ्रवसना, प्रसन्नवदना महादेवी जी जिनको लोगों ने सदा हंसते ही देखा था, वो कभी इस तरह फूट कर रो भी पड़ेंगी, इसकी किसी को कल्पना भी नहीं थी पर अनजाने ही, अपने सुख दुःख में भूली, अपने परिवार में मगन उन गृहणियों ने उनकी कौन सी दुखती रग छू दी थी कि उनका वह हंसमुख मुखौटा बरबस हट गया। उस क्षण मैंने जिस निचाट सूने एकाकीपन की एक झलक पायी, वह सचमुच डरा देने वाली थी पर उसी के साथ साथ ऐसी स्त्री के लिए मेरे मन का आदर जैसे और सौ गुना बढ़ गया जिसने इस पुरुषशासित रूढ़िग्रस्त समाज में अकेले रह कर जीवन को बिना किसी दैन्य या कमजोरी के इस बहादुरी के साथ जिया।'' 5

महादेवी ने बड़ी कुशलता और बौद्धिक सजगता के साथ छायावाद के और अपने विरोधियों को उत्तर दिया। उनकी पुस्तकों की भूमिकाएं एक प्रकार से छायावाद का काव्यशास्त्र निर्मित करती हैं। इस तरह का कार्य पन्त , प्रसाद और निराला ने भी किया था। प्रसाद और महादेवी ने वैदुष्य युक्त तार्किकता और उदाहरणों के द्वारा ÷ छायावाद' और रहस्यवाद के वस्तु शिल्प की पूर्ववर्ती काव्य से भिन्नता तथा विशिष्टता ही नहीं बतायी, यह भी बताया कि वह किन अर्थों में मानवीय संवेदन के बदलाव और अभिव्यक्ति के नयेपन का काव्य है। उन्होंने किसी पर भाव साम्य, भावोपहरण आदि का आरोप नहीं लगाया केवल छायावाद के स्वभाव, चरित्र, स्वरूप और विशिष्टता का वर्णन किया।

महादेवी उन कवियों में हैं जिन्होंने व्यापक समाज में काम करते हुए भारत के भीतर विद्यमान हाहाकार , रुदन को देखा, परखा और करुण होकर अन्धकार को दूर करने वाली दृष्टि देने की कोशिश की। इसलिए महादेवी वर्मा के यहां वेदना वैयक्तिक, न होकर समष्टि भावित और व्यापक है। छायावाद की वेदना को मात्र वैयक्तिक मानना कविता और कवि दोनों के साथ अन्याय है। डॉ. नामवर सिंह ने इसे रेखांकित किया हैः

÷÷ निजी आंसुओं के ÷ नीहार' में बन्दिनी रहने वाली महादेवी ने ÷ रश्मि' के आलोेक में जीवन की व्याप्ति का दर्शन किया और प्रखर ताप को झेलते हुए सांध्य क्षणों तक जाते जाते समाजव्यापी दुःख की अनुभूति करने लगीं। उनकी नीर भरी बदली का दुःख केवल प्रणय व्यथा ही नहीं है, उसमें अनेक प्रकार के सामाजिक असन्तोष घुलेमिले है।'' 6

कविता का जो मुहावरा महादेवी वर्मा ने विकसित किया उसके भीतर जितना आंसू और विरह , पीड़ा और वेदना है वह स्वानुभूतिमय है। परन्तु वाह्याभ्यंतरित और आभ्यंतरितवाह्य का प्रक्रियागत उन्मोचन होने के तर्क से केवल निजी नहीं है। उन्होंने सभी भूमिकाओं में बर्हिजगत और अन्तर्जगत, असीम और ससीम के रिश्ते को विस्तार से अनेक बार स्पष्ट किया है। महादेवी को इसकी आवश्यकता इसलिए पड़ी कि उनकी कविताओं पर इसको लेकर कई बार आक्षेप किये गये। ÷ स्मृति की रेखाएं', ÷ अतीत के चलचित्र', ÷ मेरा परिवार' और ÷ श्रृंखला की कड़ियां' के साथ उनकी कविताओं को पढ़ने पर लगता है कि कविता में अभिव्यक्त पीड़ा, वेदना, विरह, दुख निजी नहीं व्यापक मानवीय संवेदना के ही रूपान्तरण हैं। वे जितना निज की अभिव्यक्ति बनते हैं उतने ही दुःखदग्ध जगत के भी। महादेवी ने छायावाद में ÷ मैं' शैली स्वानुभूतिमयी वेदना के सत्यापन के लिए ही नहीं अपनायी। वह महादेवी की कविता का एक मुहावरा है जो संवादात्मक न होकर आत्माभिव्यंजक है। परन्तु इसी आधार पर उसे ÷ बुद्धिआविष्कृत' करुणा कहना भ्रामक होगा। महादेवी ने इसका उत्तर भी दिया है। उन्होंने शुक्ल जी की स्थापना को कि ÷ ज्ञानप्रसार के भीतर ही भावप्रसार होता है' या ÷ यात्र पर निकलती रही है बुद्धि पर हृदय को साथ लेकर' उलट दिया है। महादेवी वर्मा की स्थापनाओं में यात्र में हृदय ही निकला है बुद्धि को साथ लेकर। बहिर्जगत का प्रत्ययन बुद्धि का कार्य था, जो हृदय की असीमता में अपने को विसर्जित करके ही काव्य का विषय बन सकता था। भावना या हृदय की प्राथमिकता पर महादेवी ने कविता के सन्दर्भ में निरन्तर बल दिया है। ससीम को असीमिता प्रदान करने का कार्य महादेवी वर्मा की दृष्टि से साहित्य का मुख्य नहीं एकमात्र कार्य है। निश्चय ही इस एकनिष्ठता के तर्क से ही बाह्यभ्यंतरित बाह्य का सिद्धान्त विकसित होता है। परन्तु मुक्तिबोध में ÷ तीसरा क्षण के सिट्ठान्त' से स्थिति बदल जाती है। महादेवी वर्मा की स्थापनाओं में यह द्वैत चलता रहता है। कुछ उद्धरणों से यह बात और अधिक स्पष्ट हो जाएगी। यहां यह कहना पर्याप्त होगा कि महादेवी की पुस्तक भूमिकाओं में स्थापनाओं की दृष्टि से कविता की तरह ही एकवाक्यता है। प्रायः वही बातें अनेक बार कही गयी हैं। संग्रहों की भूमिकाएं ही ÷ साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबन्ध' में संकलित हैं इसलिए अपने आपमें कुछ पंक्तियों के जोड़ के बाद भी पुस्तक में नयापन नहीं है। ये बातें भावना के हाथों बुद्धि को ग्रहण करने या बुद्धि के माध्यम से भावना को समझने की बजाय दोनों की पारस्परिकता और सामंजस्य पर निर्भर हैं अन्यथा एकान्तिकता के कारण काव्य नष्ट हो सकता है -

÷÷ मनुष्य के अन्तर्जगत का विकास उसके मस्तिष्क और हृदय का परिष्कृत होते चलना है। परन्तु इस परिष्कार का क्रम इतना जटिल होता है कि वह निच्च्िचत रूप से केवल बुद्धि या केवल भावना का सूत्र पकड़ने में असमर्थ ही रहता है। अभिव्यक्ति के बाह्य रूप में बुद्धि या भावपक्ष की प्रधानता ही इस धारणा का आधार बन सकती है कि हमारे मस्तिष्क का विशेष परिष्कार चिन्तन में हो सका है और हृदय का जीवन में। एक में हम वाह्य जगत में संस्कारों को अपने भीतर लाकर उनका निरीक्षण परीक्षण करते हैं और दूसरे में अपने अन्तर्जगत की अनुभूतियों को बाहर लाकर उनका मूल्य आंकते हैं।'' 7



÷÷ साहित्य में मनुष्य की बुद्धि और भावना इस प्रकार मिल जाती है जैसे धूपछांही वस्त्र में दो रंगों के तार जो अपनी अपनी भिन्नता के कारण ही अपने से भिन्न एक तीसरे रंग की सृष्टि करते हैं। हमारी मानसिक वृत्तियों की ऐसी सामंजस्यपूर्ण एकता साहित्य के अतिरिक्त और कहीं सम्भव नहीं।'' 8



÷÷ काव्य में बुद्धि हृदय से अनुशासित रह कर ही सक्रियता पाती है।'' 9

÷ विश्ववीणा में अस्फुट झंकार मिलाने की आकांक्षा', ÷ असीम का लघु सीमा से मेल', ÷ मिटने में अमरता की सम्भावना', ÷ बीते युग के स्थान पर सपनों का अमर राज्य बनाने की कामना', अमरता और नश्वरता की पारस्परिकता, महादेवी में ÷ नीहार' से लेकर ÷ दीपशिखा' तक मिलती है। ÷ करुणा' और स्नेह उनका स्थायी भाव है, और विद्रोह संचारी। अनन्त करुणा और असीम सूनेपन के मिलने की अवस्था महादेवी को निश्चय ही निराशा से मुक्त करती है। व्यक्तिगत सूनापन, पीड़ा, दुःख, वेदना का अभ्यन्तरीकरण अभिव्यक्ति के स्तर पर समष्टिगत होकर जीवन को एक सार्थकता पर लेता है। इस सार्थकता को दीपक के प्रतीक द्वारा अनेकार्थक रूपों में व्यक्त किया गया है। चातक का प्रयोग आतुरता, एकनिष्ठता, प्रतीक्षा, व्याकुलता, तल्लीनता के रूप में कविताओं में अवश्य है पर बहुत कम। दीपक आत्मा या निर्वाण के संकेत के लिए ही नहीं है, निःस्वार्थ भाव से अन्धकार को दूर करने और ÷ प्रियतम का पथ आलोकित करने' के लिए भी है। वह आत्मविसर्जित होने के अर्थ में प्रयुक्त होकर साधन और साध्य दोनों ही अर्थों में एक मूल्य की प्रतिष्ठा भी करता है। ÷ यह वह उदात्त भाव है, जो महादेवी के परवर्ती गीतों में इतनी गहरी पीड़ा उत्पन्न करता है। इसलिए महादेवी का अन्तिम गीत भी यथार्थ का गहरा पुट लिए हुए है।प्रसाद और पन्त की तरह उनमें आदर्श अथवा सुखद लोक में पलायन करने की भावना नहीं है।'10 उनके काव्य का दूसरा प्रिय प्रतीक ÷ बादल' निराला, प्रसाद और पन्त से भिन्न अर्थ और भिन्न मुहावरे में प्रयुक्त होकर समता, न्याय, बन्धुत्व, करुणा, मंगल, आंसू, वेदना, शिव और सौन्दर्य का संकेत बन जाता है।

÷ अतीत के चलचित्र' और ÷ स्मृति की रेखाएं' में ÷ दुग्धदग्ध जगत' का दारुण रूप महादेवी ने जिस तरह प्रस्तुत किया है वह वेदना, पीड़ा और दुःख की प्रतीति को बुद्ध की तरह प्रेम और करुणा में बदल देता है, जो पीड़ा और दुःख के कारणों से मुक्ति के रास्ते ढूंढने तथा सांत्वना देने में आचरित हो जाता है। इसलिए महादेवी वर्मा का काव्य एक स्तर पर विषयिता के विषय बन जाने के कारण ममेतर हो जाता है। उनके ÷ मैं' में जिसके कारण बार बार उन पर आक्षेप किये गये भक्तिन, बिबिया, गुंगिया, मुन्नू, भाभी, सबिया, विन्दा, बिट्टो, बालिका मां, अभागी स्त्री, बदलू, लछमा, घीसा और नीलकण्ठ, सोना, वसन्त, गोधूलि, राधा आदि शामिल हैं। इसलिए उनके ÷ मैं' को विरह, मिलन, रुदन, हास जैसे स्वानुभूतिमूलक दुःख सुख को & नगेन्द्र की तरह 11 न तो फ्रायडीय प्रसंग में अतृप्ति की तृप्ति के रूप में देखा जा सकता है, न बौद्धिक प्रतीकीकरण के रूप में, और न महज रहस्यवाद के रूप में। क्योंकि कविता में वैयक्तिकता के भीतर से अभ्यन्तरित समष्टि झलकती रहती है। दुुःख और सुख की निरन्तरता का वर्णन वैसे तो छायावाद की विशेषता से अधिक रूढ़ि है परन्तु इसका एक पाठ सांत्वनापरकता भी है, जो क्लासकीय साहित्य का एक महत्वपूर्ण लक्षण माना जाता रहा है। महादेवी के काव्य की प्रतीक व्यवस्था में जहां दीपक से जीवन की सार्थकता का संकेत मिलता है वहीं पीड़ित और दुखी के लिए यह सांत्वना भी है कि ये स्थायी नहीं हैं। पतझड़ और वसन्त आदि के अनेक प्रतीक इस संकेत के लिए प्रयुक्त हुए हैं कि जीवन सुख दुःख का क्रम है। बौद्ध शब्दावली में भवचक्र है। महादेवी की दुखात्मक अनुभूति चूंकि बौद्ध धर्म भावित है इसलिए दुःख और पीड़ा आर्यसत्य के रूप में विश्व्याप्त दुःख, पीड़ा और हाहाकार में रूपान्तरित हो जाते हैं। कविताओं में निरन्तर प्रयुक्त ÷ तम' तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक जड़ता और आंतरिक तमस का भी द्योतक है जिसके नाश के बगैर दुःख समाप्त नहीं हो सकता है। इसलिए पथ है भले ही उस पर अकेले चलने का संकल्प हो। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अनेक परिदृश्य लाक्षणिक रूप में भविष्य के सपने को वर्तमान से परिभाषित भी करते हैं। अतः काव्य प्रयुक्त इन प्रतीकों को व्यापक अर्थ में ग्रहण करना चाहिए। प्रसाद और निराला में भी अन्धकार के प्रतीक इन्हीं अर्थों में विन्यस्त हैं। नीचे लिखी कविता पंक्तियां ÷ सत्याग्रह युग' के इस पदविन्यास को स्पष्ट करती हैं:

इस असीमतम में मिल कर

मुझको पल भर सो जाने दो

बुझ जाने दो देव आज

मेरा दीपक बुझ जाने दो

नीहार



घोर तम छाया चारों ओर

घटाएं घिर आयीं घनघोर

वेग मारुत का है प्रतिकूल

हिले जाते हैं पर्वत मूल

गरजता सागर बारम्बार

कौन पहुंचा देगा उस पार

नीहार



जहां आशा बनती नैराश्य

राग बन जाता है उच्छ्वास

मधुर वीणा है अन्तर्नाद

तिमिर में मिलता दिव्य प्रकाश

हास बन जाता है रोदन

वहीं मिलता नीरव भाषण।

नीहार



कुहरे सा धुंधला भविष्य है

है अतीत तम घोर

कौन बता देगा जाता यह

किस असीम की ओर

रश्मि

उपरोक्त उदाहरण इन स्थापनाओं का खण्डन करते हैं कि ÷ उनमें सहज द्रवित सूक्ष्म संवेदना तो थी, पर मुक्त अभिव्यक्ति को सम्भव बनाने वाला निःसंशय आत्मविश्वास नहीं, फलतः उनके काव्य की दिशा उत्तरोत्तर अन्तर्मुख होती गयी और पीछे के काव्य को छायावादी न कह कर रहस्यवादी कहना ही उचित होगा। उनमें भावोच्छ्वास क्रमशः कम होता गया, प्रतीकों का उत्तरोत्तर अधिक सहारा लिया गया।'12 जहां तक ÷ संकोच' की बात है यह संकोच या वर्जित स्पर्श बकौल विजयदेवनारायण साही छायावाद मात्र में है इसलिए महादेवी इसकी दोषी नहीं हैं। दूसरे उस पार क्या है को जानने की इच्छा और आशंका उन्हें निःसंशय कर भी नहीं सकती थी क्योंकि गांधी इरविन पैक्ट से उत्पन्न ÷ व्यापक शून्यता', जिसका उल्लेख साही ने पण्डित नेहरू के उद्धरण के प्रमाण से किया है, रिक्तता और शून्यता की वृद्धि ही कर रही थी। उससे क्षितिज के उस पार की जिज्ञासा और कौतूहल आशंका तक सीमित हो जाता था। महादेवी भी अपने समय के कवियों की तरह अन्धकार के पार क्या होगा यह जानना चाहती हैं।

उनकी कविता में निरन्तर विकास मिलता है। भावोच्छ्वास कविता नहीं यह तो निराला भी मानते हैं। उन्होंने लिखा है कि कविता ÷ शैशव संलाप' नहीं है। महादेवी ÷ नीहार' और ÷ रश्मि' के भावोच्छ्वास और शेैशव संलाप से ÷ नीरजा' और दीपशिखा में मुक्त होती जाती हैं। मेरी राय में तो अन्तर्मुखता कम ही हुई बल्कि ÷ नीरजा' और ÷ दीपशिखा' के गीतों में वैश्विकता बढ़ जाती है। यह ठीक है कि ÷ नीरजा' और ÷ दीपशिखा' में ऐसा लगता है कि जैसे महादेवी वर्मा को बतर्ज रीतिसिद्धता छायासिद्धि प्राप्त है, मगर इस प्रकार की रीतिसिद्धता पन्त और सबसे अधिक निर्मल वर्मा में मिलती है। रमेशचन्द्र शाह को महादेवी जी में यह दोष दिखायी पड़ता है, पन्त और अज्ञेय में नहीं। यह कहना कि ÷ कविता महादेवी के लिए निखालिस आत्माभिव्यक्ति की बजाय कलाभ्यास के रूप में ही अधिक साध्य रही है'13 या ÷ उनके गद्य और उनकी कविता के बीच कोई जीवन्त सम्बन्ध नहीं है'14 एक प्रकार का सरलीकरण है। महादेवी की कविता एक सीमित दायरे की कविता है परन्तु वह कविता नहीं काव्याभ्यास है यह कहना कठिन है। यह सही है कि गीत को विशेषीकृत करने का कार्य महादेवी ने किया परन्तु इससे वे मात्र गीतकार नहीं बन जातीं। और गीत कविता नहीं हो सकता यह तो शाह ही कह सकते हैं। निराला, पन्त और प्रसाद के गीतों की परम्परा में ही महादेवी की मूल्यांकन सम्भव है। गीत और कविता के द्वैत को न तो महादेवी ने सम्भव बनाया और न बच्चन और दिनकर ने ही। कवि सम्मेलन और काव्य गोष्ठियों के सस्तेपन पर तो महादेवी ने ÷ ठकुरी बाबा' के रेखाचित्र में तीखा व्यंग्य किया है15 और ÷ चांद' के जून 1936 के ÷ अपनी बात' में लिखा किः

÷÷ मिट्टी के कच्चे घडे+ से गंगाजल भी बह जाएगा चाहे वह पवित्रतम क्यों न माना जाता हो। संसार में आवश्यकता के अनुकूल जो वस्तु है, वही उपयोगी कही जाती है, उसके प्रतिकूल वस्तु से अभाव दूर न होने के साथ साथ असुविधाएं अधिक हो जाती हैं। इस समय सर्वसाधारण में काव्यप्रेम उत्पन्न करने की आवश्यकता थी परन्तु अपने विकृत रूप से कवि सम्मेलन इसके विपरीत कर रहे हैं।'' 16

पन्त जी इससे मुक्त होने के क्रम में प्रवक्ता मात्र ही रह गये या उत्तरवर्ती जीवन में बुद्धिखोजी अध्यात्म के मायाजाल में फंस गये। महादेवी ने अपना रास्ता इसलिए नहीं बदला कि उनके पास जीवनानुभव नहीं था बल्कि पन्त और प्रसाद से तो कहीं ज्यादा था - इसलिए कि कविता का जो मुहावरा उन्होंने विकसित किया प्रसाद, पन्त और निराला से भिन्न उनका अपना था और निश्चय ही वही पहचान और सीमा दोनों का कारण बना। परन्तु यह तो किसी भी मुहावरा विकसित करने वाले साहित्यकार की सीमा होती है। लगभग सभी बड़े लेखकों को अपने मुहावरे से लड़ना पड़ता है।

काव्य में अन्तःप्रवाहित करुणा उनके रचनात्मक गद्य का वस्तुविन्यास है। उनके रेखाचित्रें में उनकी शब्द तूलिका ने हर पात्र को कुछ रेखाओं में न केवल रूपायित किया है बल्कि उस रूपायन से आर्थिक और सामाजिक स्थिति में उसकी मर्मव्यथा भी विन्यस्त होती गयी है। घटनाक्रम , टिप्पणियां और संकेतों से उनमें अतिरिक्त अर्थगर्भता पैदा हुई है। इन अर्थगर्भ संकेतों को समग्र विन्यास के साथ देखने पर पारम्परिक भारतीय समाज के गरीब, अभावग्रत, परित्यक्त, निष्कासित, पदमर्दित, असहाय लोगों के जीवन का, जो दारुण और बेचैनी पैदा करने वाला प्रभाव पड़ता है वह प्रताड़ित के प्रति करुणा और रूढ़िबद्ध गतिहीन समाज के प्रति आक्रोश का भाव पैदा करता है। इन संस्मरणों में महादेवी की जीवन चर्या भी है और व्यष्टि की द्वन्द्वात्मक संहति भी। इस सन्दर्भ में निम्नांकित उद्धरण दृष्टव्य हैं:

÷÷ बिन्दा मुझसे कुछ बड़ी ही रही होगी, परन्तु उसका नाटापन देख कर ऐसा लगता था, मानो किसी ने ऊपर से दबा कर उसे कुछ छोटा कर दिया हो। दो पैसों में आने वाली खंजड़ी के ऊपर चढ़ी हुई झिल्ली के समान पतले चर्म से मढ़े और भीतर से हरी हरी नसों की झलक देने वाले उसके दुबले हाथ पैर न जाने किस अज्ञात भय से अवसन्न रहते थे। कहीं से कुछ आहट होते ही उसका विचित्र रूप से चौंक पड़ना और पण्डिताइन चाची का स्वर कान में पड़ते ही उसके सारे शरीर का थरथरा उठना मेरे विस्मय को बढ़ा ही नहीं देता था, प्रत्युत उसे भय में बदल देता था। और बिन्दा की आंखें तो मुझे पिंजरे में बन्द चिड़िया की याद दिलाती थीं।'' 17



÷÷ एक दिन मास भर के नामधारी मांसपिण्ड को चीकट से कपड़े में लपेट और अपनी नग्नता को मलिनता से ढांकने वाली पांच वर्ष की बचिया को उंगली से सहारा दिये, सबिया मेरे सामने आ उपस्थित हुई। उसका मुख चिकनी काली मिट्टी से गढ़ा जान पड़ता था, परन्तु प्रत्येक रेखा में साचे की वैसी ही सुडौलता थी, जैसी प्रायःपेरिस प्लास्टर की मूर्तियों में देखी जाती है। आंखों की गढ़न लम्बी न होकर गोल गोल होने के कारण उनमें मेले में खोये, बच्चे जैसी सभय चकित दृष्टि थी। हाथ पैर में मोटे मोटे चमकहीन, गिलट के कड़े उसे कैदी की स्थिति में डाल देते थे। कुछ कम चौड़े ललाट पर जुड़ी भौंहों के ऊपर लगी पीली कांच की टिकुली में जो श्रृंगार था, वह था भटकटैया के फूल से घूरे के श्रृंगार का स्मरण दिलाता था। कभी लाल पर अब पुराने घड़े के रंग वाली धोती में लिपटी सबिया ऐसी लगी, मानो किसी अपटु शिल्पी की सयत्न गढ़ी मिट्टी की मूर्ति हो, जिसके सब कच्चे रंग घुल गये हैं और जहां तहां से केवल सुडौल रेखाओं में बंधी मिट्टी झांकने लगी है।'' 18



÷÷ बाबा जी मानों आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास को चरितार्थ करने के लिए अवतीर्ण हुए थे। तम्बाकू के पिण्ड जैसे काले शरीर में राख का अंगराग लगा कर, नकली जटाजूट का मुकुट धारण कर और चिमटे का राजदण्ड थाम कर वे एक कुशासन पर आसीन होकर इन याचकों के दरबार का संचालन करते थे। उनके दान की प्रणाली भी कम रहस्यपूर्ण नहीं थी। किसी याचक की ओर प्रसन्न मुद्रा से देख भर लेते, किसी को हाथ के संकेत से आश्वासन देने का अनुग्रह करते, किसी के प्रति चिमटा खनका कर, असन्तोष व्यक्त करते, किसी को धूनी में से चुटकी भर विभूति देकर सन्तुष्ट कर देेेेेेत s] इस प्रकार न उनके पास से कोई पूर्णतः निराश लौट सकता था , न कृतार्थ।'' 19



÷÷ बिबिया के शरीर पर घूसों के भारीपन के स्मारक के गुम्मड़ उभर आये थे, लकड़ी के आघातों की संख्या बताने वाली नीली रेखाएं खिंच गयी थीं और लातों की सीमा नापने वाली पीड़ा जोड़ों में फैल रही थी। उस पर द्वार का बन्द हो जाना उसके लिए क्षमा की परिधि से निर्वासित हो जाना था। वह अन्धकार में अदृष्ट की रेखा जैसी पगडण्डी पर गिरती पड़ती, रोती कराहती अपने नैहर की ओर चल पड़ी। झनकू को पति का कर्तव्य सिखाने के लिए कभी एक पंचदेवता भी आविर्भूत नहीं हुए पर बिबिया को कर्तव्यच्युत होने का दण्ड देने के लिए पंचायत बेैठी'' 20

वस्तुत ; ÷ अतीत के चलचित्र' और ÷ स्मृति की रेखाएं' तो, ÷ श्रृंखला की कड़ियां' के उदाहरण हैं। इन रेखाचित्रें मे पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था के पुरुषोन्मुखी चरित्र के उद्घाटन के साथ ही साथ स्त्रियों की अन्धता, सहनशीलता और मूकता की विडम्बना के भी संकेत हैं। बिबिया का विद्रोह, गंगिया, मातृत्व, मुन्नूकी माई की विवशताजन्य हाड़तोड़ मेहनत, विधवा भाभी पर छायी सास ससुर के आतंक की छाया, और लाल कपड़ों से देवी जी की वितृष्णा, अपराध के अभाव की मर्मान्तक दण्ड सहती विन्दा, न मरने के लिए जीवन संघर्ष करती सबिया, 64 वर्ष वाले पुरुष से जबर्दस्ती ब्याही गयी 18 वर्षीय बिट्टो। समाज के हर व्यंग्य से बचने के लिए घोरतम नरक में अज्ञातवास कर रही करुणामूर्ति बालिका मां, पे्रम करने का अपराध कर बैठी वैश्या पुत्री अभागी स्त्री, ससुराल के अत्याचार से जिसकी हड्डी हड्डी ढीली हो गयी निल और निडर ÷ लछमा' आदि भारतीय स्त्रियों का इतिहास भारतीय स्त्री की सामाजिक स्थिति के विकृत से विकृततर होते जाने की कहानी मात्र है।''21 यह विकृततर होती कहानी चांद में 1935 से 1938 तक ÷ अपनीबात' शीर्षक से लगातार छपती रही है जो 1942 में श्रृंखला की कड़ियां शीर्षक से प्रकाशित हुई। ध्यान देने की बात है कि महादेवी वर्मा के रेखाचित्र भी इसी समय छपते रहे हैं। निम्नलिखित उद्धरण अतीत के चलचित्र और स्मृति की रेखाएं के अनुभवों के अधिक तथ्यात्मक विद्रोहपरक रूपान्तरण माने जा सकते हैं।

÷÷ चरम दुरवस्था के सजीव निदर्शन हमारे यहां के सम्पन्न पुरुषों की विधवाओं और पैतृक धन के रहते हुए भी दरिद्र पुत्रियों के जीवन हैं। स्त्री पुरुष के वैभव की प्रदर्शनी मात्र समझी जाती है और बालक के न रहने पर जैसे उसके खिलौने निर्दिष्ट स्थान से उठा कर फेंक दिये जाते हैं उसी प्रकार पुरुष के न रहने पर स्त्री के जीवन का कोई उपयोग रह जाता है न समाज या गृह में उसको कोई निश्चित स्थान ही मिल सकता है। जब जला सकते थे तब इच्छा या अनिच्छा से उसे जीवित ही भस्म करके स्वर्ग में पति के विनोदनार्थ भेज देते थे, परन्तु अब उसे मृत पति का ऐसा निर्जीव स्मारक बन कर जीना पड़ता है जिसके सामने श्रद्धा से नतमस्तक होना तो दूर रहा, कोई उसे मलिन करने की इच्छा भी रखना नहीं चाहता।'' 22



÷÷ स्त्री किस प्रकार अपने हृदय को चूर चूर कर पत्थर की देव प्रतिमा बन सकती है यह देखना हो तो हिन्दू गृहस्थ की दुधमुंही बालिका से शापमयी युवती में परिवर्तित होती हुई विधवा को देखना चाहिए जो किसी अज्ञात व्यक्ति के लिए अपने हृदय की हृदय के समान ही प्रिय इच्छाएं कुचल कुचल कर निर्मूल कर देती है, सतीत्व और संयम के नाम पर अपने शरीर और मन को अमानुषिक यंत्रणाओं के सहने का अभ्यस्त बना लेती है और इस पर भी दूसरे के अमंगलमय भय से आंखों में दो बूंद जल भी इच्छानुसार नहीं आने दे सकती। अर्धांगिनी की विडम्बना का भार लिए सीता सावित्री के अलौकिक तथा पवित्र आदर्श का भार अपने भेदे हुए जीर्ण शीर्ण स्त्रीत्व पर किसी प्रकार संभाल कर क्रीतदासी के समान अपने मद्यप, दुराचारी तथा पशु भी निकृष्ट स्वामी की परिचर्चा में लगी हुई और उसके दुर्व्यवहार को सह कर भी देवताओं से जन्म जन्मांतर में उसी का संग पाने का वरदान मांगने वाली पत्नी को देख कर कौन आश्चर्याभिभूत न हो उठेगाा।'' 23

श्रृंखला की कड़ियां की भाषा ÷ स्त्री विमर्श' की या एक्टिविस्ट की भाषा है। महादेवी की ÷ अपनी बात' है। अपने लोगों यानी स्त्रियों की और स्वयं महादेवी की मिलीजुली। इस अर्थवत्ता में भी एक वैयक्तिक संकेतपरकता तो है ही। ÷ श्रृंखला की कड़ियां' का गद्य रेखाचित्रें और संस्मरणों के गद्य से अलग है। इसमें आक्रोशमूलक विवेचनपरकता है, इसलिए एक प्रकार की पत्रकारिता का संस्पर्श भी है। परन्तु रेखाचित्रें में संस्कार, मान्यताओं, परम्पराओं आदि पर मर्मस्पर्शी व्यंग्य के साथ टिप्पणियों और दृश्यों के नियोजन से यथार्थ और यथार्थ हेतुओं का भयानक संसार बन गया है। पीड़ा और दुःख की व्यापकता से विकसित करुणा और वेदना के कारण यह गद्य छायावाद का ही गद्य है। इसमें भी यात्र पर हृदय ही निकला बुद्धि नहीं पर इनसे समाज के बदलाव की आवश्यकता महसूस होती है। पशु पक्षी, जीव जन्तु, पेड़ पौधे, लता पत्तर सब यहां समान ममता से भावित हैं। उनका वर्णन परिवार के सदस्य के रूप में सम्बन्धों के आधार पर किया गया है। महादेवी की सूक्ष्म दृष्टि यहां भी उन्हीं व्यवहारों को रेखांकित करती है जो भाव संकेत हैं। महादेवी की यह सूक्ष्म संकेती दृष्टि सभी विधाओं में है। वस्तुतः ÷ मनुष्य अपनी रागात्मक व्याप्ति के बिना समष्टि में पहचाना नहीं जा सकता। वह अपने बौद्धिक विस्तार के बिना माना नहीं जा सकता और इस व्याप्ति और विस्तार के मूल्यांकन के अभाव में मानव जाति की प्रगति का लेखा जोखा अमिट नहीं रह सकता। नदी जिस प्रकार दोनों तटों को अलग अलग स्पर्श करके भी उनको अपनी एकता में रखती है, उसी प्रकार साहित्य भी जीवन की भिन्न जान पड़ने वाली वृत्तियों को अपने स्पर्श की एकता में रखता है। वह बहुमुखी दायित्व देने वाला ऐसा रागात्मक कर्म है जिसके कारण साहित्यकार की स्थिति को एक कारण से देखना कठिन हो जाता है।'24 महादेवी वर्मा ने इतिवृत्तात्मक यथार्थ के प्रश्न पर विचार करते हुए प्रसाद ÷ कंकाल' और निराला की ÷ भिक्षुक' का उदाहरण देते हुए कहाः

÷÷ इस भावभूमि पर परम सुकुमार ये कवि तर्क भूमि पर कितने कठोर हो जाते हैं इसे बिना जाने छायावाद के साथ न्याय नहीं कर सकते।'' 25

यहां महादेवी एक प्रकार से अपने रेखाचित्रें और ÷ श्रृंखला की कड़ियां' के गद्य की तार्किकता का ही संकेत कर रही हैं। महादेवी के गद्य में ग्रामीण जीवन की सड़ान्ध के प्रमुख कारक धर्म और अर्थ का अनेक स्थानों पर उल्लेख है। वे भी प्रेमचन्द की तरह पुरुषों की पशुता और स्त्रियों की शवता का कारण इन्हीं पुरुषार्थों को मानती हैं। एक दृष्टि से यह भी कहा जा सकता है कि महादेवी का समस्त साहित्य स्त्री के प्रतिरोध और करुणा का साहित्य है।

सरोज स्मृति - सूर्यकान्त त्रिपाठी’निराला’

ऊनविंश पर जो प्रथम चरण
तेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण:
तनये, ली कर दृक्पात तरुण
जनक से जन्म की विदा अरुण!

गीते मेरी, तज रूप-नाम
वर लिया अमर शाश्वत विराम
पूरे कर शुचितर सपर्याय
जीवन के अष्टादशाध्याय,
चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण
कह-”पित:, पूर्ण आलोक वरण
करती हूं मै, यह नहीं मरण,
‘सरोज’ का ज्योति:शरण-तरण”-
अशब्द अधरों का,सुना, भाष,
मैं कवि हूं,पाया है प्रकाश
मैंने कुछ अहरह रह निर्भर
ज्योतिस्तरणा के चरणों पर।
जीवित-कविते,शत-शर-जर्जर
छोड़कर पिता को पृथ्वी पर
तू गयी स्वर्ग, क्या यह विचार-
“जब पिता करेंगे मार्ग पार
यह, अक्षम अति,तब मैं सक्षम,
तारूंगी कर गह दुस्तर तम?”
कहता तेरा प्रयाण सविनय,-
कोई न अन्य था भावोदय।
श्रावण-नभ का स्तब्धान्धकार
शुक्ला प्रथमा कर गयी पार!

धन्ये, मैं पिता निरर्थक था,
कुछ भी तेरे हित कर न सका!
जाना तो अर्थागमोपाय
पर रहा सदा संकुचित-काय
लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर
हारता रहा मैं स्वार्थ समर।
शुचिते,पहनाकर चीनांशुक
रख सका न तुझे अत: दधिमुख।
क्षीण का न छीना कभी अन्न,
मैं लख सका न वे दृग विपन्न:
अपने आंसुओं अत: बिम्बित
देखे हैं अपने ही मुख-चित।
सोचा है नत हो बार-बार-
“यह हिंदी का स्नेहोपहार,
यह नहीं हार मेरी भास्वर
वह रत्नहार-लोकोत्तर वर।”
अन्यथा, जहां है भाव शुद्ध
साहित्य, कला- कौशल -प्रबुद्ध,
हैं दिये हुये मेरे प्रमाण
कुछ वहां,प्राप्ति को समाधान,-
पार्श्व में अन्य रख कुशल हस्त
गद्य में पद्य में समाभ्यस्त-
देखें वे; हंसते हुये प्रवर
जो रहे देखते सदा समर,
एक साथ जब शत घात घूर्ण
आते थे मुझ पर तले तूर्ण,
देखता रहा मैं खड़ा अपल
वह शर-क्षेप वह रण-कौशल।
व्यक्त हो चुका चीत्कारोत्कल
क्रुद्द युद्ध का रुद्ध-कण्ठ फल।
और भी फलित होगी वह छवि,
जागे जीवन जीवन का रवि,
लेकर कर कल तूलिका कला,
देखो क्या रंग भरती विमला,
वांछित उस किस लांक्षित छवि पर
फेरती स्नेह की कूची भर!

अस्तु मैं उपार्जन को अक्षम
कर नहीं सका पोषण उत्तम
कुछ दिन को, जब तू रही साथ
अपने गौरव से झुका माथ,
पुत्री भी, पिता गेह में स्थिर,
छोड़ने के प्रथम जीर्ण अजिर।
आंसुऒं सजल दृष्टि की छलक
पूरी न हुई जो रही कलक
प्राणों की प्राणों में दबकर
कहती लघु-लघु उसांस में भर:
समझता हुआ मैं रहा देख
हटती भी पथ पर दृष्टि टेक।

तू सवा साल की जब कोमल,
पहचान रही ज्ञान में चपल,
मां का मुख, हो चुम्बित क्षण-क्षण,
भरती जीवन में नव जीवन,
वह चरित पूर्ण कर गयी चली,
तू नानी की गोद जा पली।
सब किये वहीं कौतुक विनोद
उस घर निशि-वासर भरे मोद;
खायी भाई की मार विकल
रोयी, उत्पल-दल-दृग छलछल;
चुमकारा फिर उसने निहार,
फिर गंगा तट सैकत विहार
करने को लेकर साथ चला,
तू गहकर हाथ चली चपला;
आंसुओं धुला मुख हासोच्छल,
लखती प्रसार वह ऊर्मि धवल।
तब भी मैं इसी तरह समस्त
कवि जीवन में व्यर्थ भी व्यस्त
लिखता अबाध गति मुक्त छन्द,
पर सम्पादकगण निरानन्द
वापस कर देते पढ़ सत्वर
रो एक-पंक्ति-दो में उत्तर।
लौटी रचना लेकर उदास
ताकता रहा मैं दिशाकाश
बैठा प्रान्तर में दीर्घ प्रहर
व्यतीत करता था गुन-गुन कर
सम्पादक के गुण; यथाभ्यास
पास की नोचता हुआ घास
अज्ञात फ़ेकता इधर-उधर
भाव की चढ़ी पूजा उन पर।

याद है, दिवस की प्रथम धूप
थी पड़ी हुई तुझ पर सुरूप,
खेलती हुई तू परी चपल,
मैं दूरस्थित प्रवास से चल
दो वर्ष बाद, होकर उत्सुक
देखने के लिए अपने मुख
था गया हुआ, बैठा बाहर
आंगन में फ़ाटक के भीतर
मोढ़े पर, ले कुण्डली हाथ
अपने जीवन की दीर्घ गाथ।
पढ़ लिखे हुए शुभ दो विवाह
हंसता था, मन में बढ़ी चाह
खण्डित करने को भाग्य-अंक,
देखा भविष्य के प्रति अशंक।

इससे पहले आत्मीय स्वजन
सस्नेह कह चुके थे, जीवन
सुखमय होगा, विवाह कर लो
जो पढ़ी-लिखी हो-सुन्दर हो।
आये ऎसे अनेक परिणय,
पर विदा किया मैने सविनय
सबको, जो अड़े प्रार्थना भर
नयनों में, पाने को उत्तर
अनुकूल, उन्हें जब कहा निडर-
“मैं हूं मंगली”,मुड़े सुनकर।
इस बार एक आया विवाह
जो किसी तरह भी हतोत्साह
होने को न था, पड़ी अड़चन,
आया मन में भर आकर्षण
उन नयनों का, सासु ने कहा-
“वे बड़े भले जन है, भय्या,
एन्ट्रेंन्स पास है लड़की वह,
बोले मुझसे, ‘छब्बिस ही तो
वर की है उम्र, ठीक ही है,
लड़की भी अट्ठारह की है।
फ़िर हाथ जोड़ने लगे, कहा-
‘वे नहीं कर रहे ब्याह, अहा,
हैं सुधरे हुए बड़े सज्जन !
अच्छे कवि, अच्छे विद्दज्जन!
है बड़े नाम उनके! शिक्षित
लड़की भी रूपवती; समुचित
आपको यही होगा कि कहें
हर तरह उन्हें; वर सुखी रहें।’
आयेंगे कल।” दृष्टि थी शिथिल,
आयी पुतली तू खिल-खिल-खिल
हंसती, मैं हुआ पुन: चेतन
सोचता हुआ विवाह-बन्धन।
कुण्डली दिखा बोला-”ए-लो”
आयी तू, दिया, कहा, “खेलो!”
कर स्नान-शेष, उन्मुक्त-केश
सासुजी रहस्य - स्मित सुवेश
आयी करने को बातचीत
जो कल होनेवाली, अजीज,
संकेत किये मैंने अखिन्न
जिस ओर कुण्डली छिन्न-भन्न;
देखने लगीं वे विस्मय भर
तू बैठी सच्चित टुकड़ों पर।

धीरे-धीरे फ़िर बढ़ा चरण,
बाल्य की केलियों का प्रांगण
कर पार, कुंज-तारूण्य सुधर
आयी, लावण्य-भार थर-थर
कांपा कोमलता पर सस्वर
ज्यों मालकौश नव वीणा पर :
नैश स्वप्न ज्यों तू मन्द-मन्द
फ़ूटी ऊषा जागरण-छन्द,
कांपी भर निज आलोक-भार,
कांपी वन, कांपा दिक प्रसार।
परिचय-परिचय पर खिला सकल-
नभ, पृथ्वी,द्रुम,कलि, किसलय-दल।

क्या दृष्टि! अतल की सिक्त-धर
ज्यों भोगावती उठी अपार,
उमड़ता ऊर्ध्व को कल सलील
जल टलमल करता नील-नील,
पर बंधा देह के दिव्य बांध,
छलकता दृगों से साध-साध।
फूटा कैसा प्रिय कण्ठ-स्वर
मां की मधुरिमा व्यंज्जना भर
हर पिता-कण्ठ की दृप्त धार
उत्कलित रागिनी की बहार!
बन जन्मसिद्ध गायिका, तन्वि,
मेरे स्वर की रागिनी वहिन
साकार हुई दृष्टि में सुधर,
समझा मैं क्या संस्कार प्रखर।
शिक्षा के बिना बना वह स्वर
है, सुना न अब तक पृथ्वी पर!
जाना बस, पिक-बालिका प्रथम
पल अन्य नीड़ में जब सक्षम
होती उड़ने को, अपना स्वर
भर करती ध्वनित मौन प्रान्तर।
तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि,।
जागा उर में तेरा प्रिय कवि,
उन्मनन-गुज्ज सज हिला कुंज
तरू-पल्लव कलि-दल पुंज-पुंज
बह चली एक अज्ञात बात
चूमती केश-मृदु नवल गात,
देखती सकल निष्पलक-नयन
तू, समझा मैं तेरा जीवन।

सासु ने कहा लख एक दिवस:-
“भैया अब नहीं हमारा बस,
पालना-पोसना रहा काम,
देना ‘सरोज’ को धन्य-धाम,
शुचि वर के कर, कुलीन लखकर,
है काम तुम्हारा धर्मोतर;
अब कुछ दिन इसे साथ लेकर
अपने घर रहो, ढूंढ़कर वर
जो योग्य तुम्हारे, करो ब्याह
होगें सहाय हम सहोत्साह।
सुनकर, गुनकर चुपचाप रहा,
कुछ भी न कहा,-न अहो, न अहा;
ले चला साथ मैं तुझे, कनक
ज्यों भिक्षुक लेकर, स्वर्ण-झनक
अपने जीवन की, प्रभा विमल
ले आया निज गृह-छाया-तल।
सोचा मन में हत वार वार-
“ये कान्यकुब्ज-कुल-कुलाड्गार;
खाकर पत्तल में करें छेद,
इनके कर कन्या, अर्थ खेद,
इस विषय-बेलि में विष ही फ़ल,
यह दग्ध मरूस्थल-नहीं सुजल।”
फ़िर सोचा-”मेरे पूर्वजगण
गुजरे जिस राह, वही शोभन
होगा मुझको, यह लोक-रीति
कर दूं पूरी, गो नहीं भीति
कुछ मुझे तोड़ते गत विचार;
पर पूर्ण रूप प्राचीन भार
ढोते मैं हूं अछम; निश्चय
आयेगी मुझमें नहीं विनय
उतनी जो रेखा करे पार
सौहार्द-बन्ध की, निराधार।
वे जो जमुना के-से कछार
पद फ़टे बिवाई के, उधार
खाये के मुख ज्यों, पिये तेल
चमरौधे जूते से सकेल
निकले, जी लेते, घोर-गन्ध,
उन चरणों को मैं यथा अन्ध,
कल घ्राण-प्राण से रहित व्यक्ति
हो पूजूं, ऎसी नहीं शक्ति।
ऎसे शिव से गिरिजा-विवाह
करने की मुझको नहीं चाह।”

फ़िर आयी याद-मुझे सज्जन
है मिला प्रथम ही विद्धज्जन
नवयुवक एक, सत्साहित्यिक,
कुल कान्यकुब्ज, यह नैमित्तिक
होगा कोई इंगित अदृश्य,
मेरे हित है हित यही स्पृश्य
अभिनन्दनीय। बंध गया भाव,
खुल गया ह्रदय का स्नेह-स्राव,
खत लिखा, बुला भेजा तत्क्षण,
युवक भी मिला प्रफ़ुल्ल,चेतन।
बोला मैं-”मैं हूं रिक्त-हस्त
इस समय, विवेचन में समस्त-
जो कुछ है मेरा अपना धन
पूर्वज से मिला, करूं अर्पण
यदि महाजनों को, तो विवाह
कर सकता हूं, पर नहीं चाह
मेरी ऎसी, दहेज देकर
मैं मूर्ख बनूं, यह नहीं सुधर,
बारात बुलाकर मिथ्या व्यय
मैं करूं, नही ऎसा सुसमय।
तुम करो ब्याह, तोड़ता नियम
मैं सामाजिक योग के प्रथम,
लग्न के; पढूंगा स्वयं मन्त्र
यदि पण्डितजी होंगे स्वतन्त्र।
जो कुछ मेरे, वह कन्या का,
निश्चय समझो, कुल धन्या का।”
आये पण्डितजी, प्रजावर्ग,
आमन्त्रित साहित्यिक, ससर्ग
देखा विवाह आमूल नवल,
तुझ पर शुभ पड़ा कलश का जल।
देखती मुझे तू, हंसी मन्द,
होठों में बिजली फ़ंसी, स्पन्द
उर में भर झूली छबि सुन्दर,
प्रिय की अशब्द श्रंगार-मुखर
तू खुली एक-उच्छ्वास-संग,
विश्वास-स्तब्ध बंध अंग-अंग,
नत नयनो से आलोक उतर
कांपा अधरों पर थर-थर-थर।
देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति
मेरे वसन्त प्रथम गीति-
श्रंगार, रहा जो निराकार
रस कविता में उच्छ्वसित-धार
गाया स्वर्गीया-प्रिय-संग-
भरता प्राणों में राग-रंग,
रति-रूप प्राप्त कर रहा वही,
आकाश बदलकर बना मही।

हो गया ब्याह, आत्मीय स्वजन
कोई थे नहीं, न आमन्त्रण
था भेजा गया, विवाह-राग
भर रहा न घर निशि-दिवस जाग;
प्रिय मौन एक संगीत भरा
नव जीवन के स्वर पर उतरा।
मां की कुल शिक्षा मैने दी,
पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची,
सोचा मन में-”वह शकुन्तला,
पर पाठ अन्य यह, अन्य कला।”
कुछ दिन रह गृह तू फ़िर समोद,
बैठी नानी की स्नेह-गोद।
मामा-मामी का रहा प्यार,
भर जलद धरा को ज्यों अपार;
वे ही सुख-दुख में रहे न्यस्त;
तेरे हित सदा समस्त, व्यस्त;
वह लता वहीं की, जहां कली
तू खिली, स्नेह से हिली, पली,
अन्त भी उसी गोद में शरण
ली मूंद दृग वर महामरण!

मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल,
युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
दु:ख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूं आज, जो नही कही!
हो इसी कर्म पर वज्रपात
यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल
हों भ्रष्ट शीत के-से शतदल!
कन्ये, गत कर्मो का अर्पण
कर, करता मैं तेरा तर्पण!

चाहिए मुझे मेरा असंग बबूल पन- गजानन माधव मुक्तिबोध



मुझे नहीं मालूम
मेरी प्रतिक्रियाएं
सही हैं या ग़लत हैं
या और कुछ सच,
हूँ मात्र मैं निवेदन-सौन्दर्य


सुबह से शाम तक

मन में ही

आड़ी-टेढ़ी लकीरों से करता हूँ

अपनी ही काटपीट

ग़लत के ख़िलाफ़ नित सही की तलाश में कि

इतना उलझ जाता हूँ कि

जहर नहीं

लिखने की स्याही में पीता हूँ कि

नीला मुँह...

दायित्व-भावों की तुलना में

अपना ही व्यक्ति जब देखता

तो पाता हूँ कि

खुद नहीं मालूम

सही हूँ या गलत हूँ

या और कुछ


सत्य हूँ कि सिर्फ मैं कहने की तारीफ

मनोहर केन्द्र में

खूबसूरत मजेदार

बिजली के खम्भे पर

अँगड़ाई लेते हुए मेहराबदार चार

तड़ित-प्रकाश-दीप...

खम्भे के अलंकार!!


सत्य मेरा अलंकार यदि, हाय

तो फिर मैं बुरा हूँ.

निजत्व तुम्हारा, प्राण-स्वप्न तुम्हारा और

व्यक्तित्व तड़ित्-अग्नि-भारवाही तार-तार

बिजली के खम्भे की भांति ही

कन्धों पर रख मैं

विभिन्न तुम्हारे मुख-भाव कान्ति-रश्मि-दीप

निज के हृदय-प्राण

वक्ष से प्रकट, आविर्भूत, अभिव्यक्त

यदि करता हूँ तो....

दोष तुम्हारा है


मैंने नहीं कहा था कि

मेरी इस जिन्दगी के बन्द किवार की

दरार से

रश्मि-सी घुसो और विभिन्न दीवारों पर लगे हुए शीशों पर

प्रत्यावर्तित होती रहो

मनोज्ञ रश्मि की लीला बन

होती हो प्रत्यावर्तित विभिन्न कोणों से

विभिन्न शीशों पर

आकाशीय मार्ग से रश्मि-प्रवाहों के

कमरे के सूने में सांवले

निज-चेतस् आलोक


सत्य है कि

बहुत भव्य रम्य विशाल मृदु

कोई चीज़

कभी-कभी सिकुड़ती है इतनी कि

तुच्छ और क्षुद्र ही लगती है!!

मेरे भीतर आलोचनाशील आँख

बुद्धि की सचाई से

कल्पनाशील दृग फोड़ती!!


संवेदनशील मैं कि चिन्ताग्रस्त

कभी बहुत कुद्ध हो

सोचता हूँ

मैंने नहीं कहा था कि तुम मुझे

अपना सम्बल बना लो

मुझे नहीं चाहिए निज वक्ष कोई मुख

किसी पुष्पलता के विकास-प्रसार-हित

जाली नहीं बनूंगा मैं बांस की

जाहिए मुझे मैं

चाहिए मुझे मेरा खोया हुए

रूखा सूखा व्यक्तित्व


चाहिए मुझे मेरा पाषाण

चाहिए मुझे मेरा असंग बबूलपन

कौन हो की कही की अजीब तुम

बीसवीं सदी की एक

नालायक ट्रैजेडी


जमाने की दुखान्त मूर्खता

फैन्टेसी मनोहर

बुदबुदाता हुआ आत्म संवाद

होठों का बेवकूफ़ कथ्य और


फफक-फफक ढुला अश्रुजल


अरी तुम षडयन्त्र-व्यूह-जाल-फंसी हुई

अजान सब पैंतरों से बातों से

भोले विश्वास की सहजता

स्वाभाविक सौंप

यह प्राकृतिक हृदय-दान

बेसिकली गलत तुम.

सोमवार, अप्रैल 13, 2009

रामधारी सिंह दिनकर (१९०८-१९७४) आग की भीख, समर शेष है

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म बिहार प्रदेश के बेगूसराय (पुराने मुंगेर) जिले के सिमरिया गांव में एक निम्न मध्यवर्गीय भूमिहार ब्राह्मण किसान परिवार में 23 सिंतबर 1908 को हुआ था। यह ग्राम पुण्यतोया गंगा नदी के पावन उत्तरी तट पर बसा हुआ है। और मिथिलाचंल का एक प्रसिद्ध तीर्थ है। यहां पूरे उत्तर बिहार समेत नेपाल से तीर्थ यात्री बड़ी संख्या में आते हैं और प्रति वर्ष कार्तिक माह कल्पवास चलता है। किंवदंती यह है कि विवाहोपरांत सीता को विदा कराकर ले जाते समय राम ने इसी स्थान पर गंगा को पार किया था। तभी से यह स्थान सिमरियाघाट के नाम से प्रसद्धि है। इस नाम में से ‘म’ और ’रि’ को हटा दें तो वह ‘सियाघाट’ हो जाता है।

दिनकर जी के पिता का नाम बाबू रविराय (रविसिंह) था और पितामह का नाम शंकर राय था। इनके वंश में भैरवराय नामक एक कवि भी थे जिनकी ब्रजभाषा में लिखित पोथी ‘नगर-विलाप’ है। दिनकर जी की माता का नाम मनरूप देवी था। उस जमाने में सिमरिया गांव के घर–घर में नित्य ‘रामचरितमानस’ का पाठ होता था। उनके पिता जी अपने समाज में मानस के मर्मज्ञ समझे जाते थे और लोगों का ख्याल था कि उनको यह ग्रंथ लगभग पूरी तरह कंठस्थ है। इसी धर्ममय वातावरण में बालक रामधारी का जन्म और लालन-पालन हुआ।जिस समाज में उन्होंने होश संभाला वह साधारण किसानों और खेतिहर मजदूरों का समाज था, जहां अधिकांश लोग निरक्षर और अंधविश्वासी थे।

‘दिनकर’ ने अपने जीवन मूल्य इसी परिवेश में स्थिर किए। इसी वातावरण में उन्होंने अपने साहित्य की दिशा निर्धारित की।1 दिसंबर 1973 को जब दिनकर जी को ‘उर्वशी’ के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जा रहा था, तब अपने उद्बोधन में उन्होने कहा था-भगवान ने मुझको जब इस पृथ्वी पर भेजा तो मेरे हाथ में एक हथौड़ा दिया और कहा कि जा तू इस हथौड़े से चट्टान के पत्थर तोड़ेगा और तेरे तोड़े हुए अनगढ़ पत्थर भी कला के समुद्र में फूल के समान तैरेंगे।....मैं रंदा लेकर काठ को चिकनाने नहीं आया था। मेरे हाथ में तो कुल्हाड़ा था जिससे मैं जड़ता की लकड़ियों को फाड़ रहा था।....अपने प्रशंसकों के बीच, जिनमें इन पंक्तियों के लेखक से लेकर स्व. जवाहरलाल नेहरू तक शामिल हैं, दिनकर, पौरुष और ललकार के कवि माने जाते हैं।

राम स्वरूप चतुर्वेंदी जैसे प्रशंसा–कृपण आलोचकों ने भी उन्हें उद्बोधन का कवि माना है।दिनकर जब दो साल के थे तभी उनके सर से पिता का साया उठ गया। उनके अग्रज और अनुज–दोनों ने इसीलिए अपनी पढ़ाई छोड़ दी और किसानी में लग गए ताकि दिनकर की पढ़ाई निर्बाध गति से चलती रहे। तेरह वर्ष की उम्र में इनका विवाह हुआ और 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने माध्यमिक परीक्षा पास की। उनका काव्य-सृजन इसी समय शुरू हुआ।सन् 1928 में दिनकर जी ने मैट्रिक पास किया। पूरे प्रांत में हिन्दी विषय में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने के कारण उनको ‘भूदेव स्वर्ग-पदक’ प्रदान किया गया था। इसके बाद से सन् 1932 तक वे पटना कॉलेज के छात्र रहे और इतिहास में बी. ए. ऑनर्स किया।दिनकर के छात्र जीवन का समय मोटे तौर पर स्वाधीनता संघर्ष में असहयोग आंदोलन का युग था। उस समय की पुस्तकों तथा पत्र-पत्रिकाओं में इतिहास और संस्कृति, धर्म और दर्शन तथा राजनीति से संबंधित सामग्री ही अधिक पाई जाती थी। उनमें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में संबंधित चित्रों, कार्टूनों तथा देश भक्ति पूर्ण कविताओं और गीतों का ही बाहुल्य रहता था। राष्ट्रीयता, स्वतंत्रता, समाजवाद और साम्यवाद की चारों तरफ धूम थी। इसी समय ‘दिनकर’ राष्ट्रीय नेताओं की सभाओं में जाने लगे थे और यदा-कदा सभा मंचों से ‘वंदे मातरम्’ का गायन भी करने लगे थे।

उन दिनों पटने से प्रकाशित होने वाली ‘देश’ पत्रिका तथा कन्नौज से प्रकाशित ‘प्रतिभा’ पत्रिका में ‘दिनकर’ की कविताएं स्थान पाने लगी थीं। ‘देश के संस्थापक डॉ. राजेंद्र थे जो स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति बने। उनकी पहली कविता जबलपुर से प्रकाशित ‘छात्र-सहोदर’ में छपी थी, जिसके संपादक पं. मातादीन शुक्ल थे। उसी जमाने में बेगूसराय (दिनकर का गृह जिला) से ‘प्रकाश’ नामक पत्रिका प्रकाशित होती थी जिसमें दिनकर की कविताएं प्रमुखता से छपा करती थीं। कहते हैं कि इसी समय उन्होंने अपना उपनाम ‘दिनकर’ रखा। उनके पिता का नाम भी ‘रवि’ था। इस प्रकार अपने ही शब्दों में वे ‘रवि के पुत्र दिनकर हुए।’सन् 1933 में बिहार प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन का वार्षिक अधिवेशन भागलपुर में हुआ। उसकी अध्यक्षता सुप्रसिद्ध इतिहासविद् और पुराविद् डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल ने की थी। उसी अधिवेशन में ‘दिनकर’ ने अपनी ‘हिमालय के प्रति’ कविता पढ़ी तो समस्त हिन्दी जगत में एकाएक उनका नाम फैल गया। उसी सम्मेलन में वे डॉ. जायसवाल के संपर्क में आए। उन्होंने ही इनकी प्रतिभा को अपने प्रेम और प्रोत्साहन से सींचा। उस समय जायसवाल जी की पुस्तक ‘हिन्दी पॉलिटी’ की चारों तरफ चर्चा थी। स्वाधीनता आंदोलन से संबंधित किसी भी प्रबुद्ध व्यक्ति के लिए संगति और उस माहौल का परिणाम यह निकला कि दिनकर की साहित्य साधना पर इतिहास तथा राष्ट्रवादी विचारधारा का पहले से ही चढ़ा हुआ रंग कुछ और गाढ़ा हो गया।सन् 1930-35 की अवधि में दिनकर ने जितनी देशभक्ति से परिपूर्ण क्रांतिकारी कविताएं रचीं उनका संग्रह 1935 में ‘रेणुका’ नाम से निकला। इस काव्य संग्रह का पूरे हिन्दी जगत् में उत्साह के साथ स्वागत किया गया। फिर सन् 1938 में ‘धुंधार’ निकली। अब तक दिनकर’ का प्रचंड तेज समस्त हिन्दी साहित्यकाश में फैल चुका था। इनका पहला प्रबंध काव्य’ ‘कुरुक्षेत्र’ सन् 1946 में निकला जिसमें हिंसा-अहिंसा, युद्ध और शांति आदि समस्याओं पर उनके गहन विचारों का अनुवाद कन्नड़ और तेलुगु आदि भाषाओं में हो चुका है।

फिर सन् 1952 में ‘रश्मिरथी’ नामक खंडकाव्य जो महाभारत के उपेक्षित महानायक कर्ण के जीवन पर आधारित है। इसने दिनकर की लोकप्रियता को सर्वाधिक ऊंचाई दी। इन काव्यों के अंश हिन्दी भाषी जनता की जिह्वा पर उक्तियों की तरह चढ़े हुए हैं—
जिसके पास गरल हो।उसको क्या जो दंतहीन, विष रहित, विनीत, सरल हो।
दिनकर की कोई 32 काव्य कृतियां एक-एक कर प्रकाश में आईं। लेकिन ‘उर्वशी’ (1961) महाकाव्य को उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति माना जाता है, उसके लिए सन् 1973 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। उनकी गद्य रचना ‘संस्कृति के चार अध्याय’ के लिए उन्हें सन् 1959 में साहित्य अकादमी सम्मान दिया गया। इनकी कई रचनाओं का अंग्रेजी, रूसी, स्पेनिश आदि भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।उनका व्यक्तिगत जीवन संघर्षों, उपलब्धियों और दायित्वों से भरा रहा। स्कूल में शिक्षक की नौकरी की। सन् 1934 में सरकारी नौकरी में गए और सन् 1942 तक सब–रजिस्ट्रार के पद पर रहे, जमीन–जायदाद और शादी-ब्याह से संबंधित दस्तावेजों का पंजीयन करना था। सन् 1947 में वे बिहार सरकार के जनसंपर्क विभाग में उपनिदेशक बने। इसके बाद से उनके जीवन में पदों और सम्मानों की बाढ़ सी आ गई।स्नातकोत्तर उपाधि से रहित होने के बावजूद उन्हें महाविद्यालय में हिन्दी का अध्यापक नियुक्त किया गया। यह उनकी असाधारण योग्यता और प्रतिभा का सम्मान था। बारह वर्षों तक राज्यसभा के सदस्य रहे। फिर भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति बनाए गए। इसके बाद भारत सरकार के गृहमंत्रालय में हिन्दी सलाहकार मनोनीत हुए। सन् 1971 में वे सारे पदभारों से मुक्त होकर पटना चले आए।इस बीच सन् 1959 में उन्हें ‘पद्मभूषण की उपाधि प्रदान की गई। सन् 1962 में भागलपुर विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डी।लिट. की मानद उपाधि प्रदान की गई। उन्होंने इंग्लैंड, स्विटजरलैंड, पश्चिम जर्मनी और रूस के साथ-साथ चीन, मिस्त्र और मॉरीशस आदि देशों का भी भ्रमण किया। इस क्रम में बड़े-बड़े राष्ट्रीय–अंतर्राष्ट्रीय बुद्धिजीवियों और राजनेताओं से उनकी निकटता बढ़ी।इस पूरे दौर में एक भरे-पूरे संयुक्त परिवार का दायित्व उनके कंधों पर रहा। उन्होंने अपने हाथों दस कन्याओं का विवाह रचाया, जिसमें उनकी दो पुत्रियां, छह भतीजियां तथा दो पोतियां शामिल हैं। इसको वे अपने जीवन की बड़ी उपलब्धि मानते थे।

हिन्दी के ‘उर्वशी’, ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘रश्मिरथी’ समेत 33 काव्य-कृतियों के रचयिता और ‘राष्ट्रकवि’ के विशेषण से विभूषित डॉ। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ एक उत्कृष्ट गद्यकार भी थे। उनकी पुस्तकों की कुल संख्या 60 बताई जाती है, जिनमें सत्ताइस गद्यग्रंथ हैं। इनमें आधी पुस्तकों में निबंध या निबंध के ढंग की चीजें संकलित हैं। प्रकाशन वर्ष के अनुसार इनका क्रम है-मिट्टी की ओर (1946), अर्धनारीश्वर (1952), रेती के फूल (1954), हमारी सांस्कृतिक एकता (1954), राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता (1958), काव्य की भूमिका (1958), पंत, प्रसाद और मैथिली शरण (1958), वेणुवन (1958), धर्म, नैतिकता और विज्ञान (1959), वर-पीपल (1961), शुद्ध कविता की खोज (1966), साहित्यमुखी (1968), भारतीय एकता (1970), आधुनिक बोध (1973), विवाह की मुसीबतें (1974) आदि। इनके अतिरिक्त–देश–विदेश (1957), लोकदेव नेहरू (1965), राष्ट्रभाषा आंदोलन और गांधी जी (1968) जैसी कृतियां भी हैं, जिनमें यात्रा-वृतांत व संस्मरण आदि के बीच–बीच में वैचारिक निबंध गुम्फित हैं। इन संकलनों में दिनकर जी के लगभग एक सौ पच्चीस निबंध संकलित हैं। उपर्युक्त सूची से पता चलता है कि दिनकर जी सन् 1940 के आसपास गद्य लेखन की ओर गंभीरता से प्रवृत्त हुए। उनका पहला संकलन ‘मिट्टी की ओर’ 1946 में प्रकाशित हुआ। जबकि कविता लेखन वे 15-16 वर्ष की अवस्था से ही करने लगे थे। उस समय वे माध्यमिक विद्यालय के छात्र थे।उनकी पहली कविता 1924-25 में जबलपुर से प्रकाशित पत्रिका ‘छात्र-सहोदर’ में छपी थी। दिनकर की पहली काव्य पुस्तक ‘प्रण-भंग सन् 1929 में प्रकाशित हुई थी। यह ‘महाभारत’ के कथानक पर आधारित थी। इस समय उनकी अवस्था 21 वर्ष की थी।पद्य से गद्य की ओर प्रवृत्त होने में दिनकर जी ने लगभग 20 वर्षों का समय लिया। प्राचीन मनीषियों ने भी गद्यं कवीणां निकषं वदन्ति ! अनुमान होता है कि दिनकर ने लगभग दो दशकों की काव्य–साधना के बाद पूरे आत्मविश्वास के साथ गद्य के क्षेत्र में प्रवेश लिया। तभी तो उनका गद्य इतना प्रगल्भ, परिमार्जित और प्रभावोत्पादक बन पड़ा है। बाद की पीढ़ियों के कवियों-लेखकों के लिए यह एक अनुकरणीय बात है।इस ग्रंथ–सूची से यह भी पता चलता है कि वर्ष 1958-59 में दिनकर का गद्य–लेखन अपने उत्कर्ष पर था। इस साल उनके 5 निबंध संग्रह प्रकाशित हुए। ‘मिट्टी की ओर’ उनका पहला और ‘विवाह की मुसीबतें’ अंतिम निबंध संकलन माना जाता है। इस संबंध में एक दिलचस्प तथ्य यह है कि लेखक का विवाह 1920-21 में हुआ था जब उनकी अवस्था 13 वर्ष की थी। लेकिन विवाह की मुसीबतें नामक यह संकलन सन् 1974 में अर्थात उनके विवाह के लगभग 54 वर्ष बाद प्रकाश में आया। उनकी पत्नी का नाम श्रीमती श्यामवती थी।

हिन्दी के विद्यार्थियों और सामान्य पाठकों के बीच भी रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का कवि रूप ही अधिक उजागर है। जबकि उनका गद्यकार रूप भी कम उज्जवल नहीं है। उनके निबंधों का यह संकलन तैयार करवाकर नेशनल बुक ट्रस्ट ने एक बड़े अभाव की पूर्ति की है। इसके लिए दिनकर के सभी प्रेमियों को ट्रस्ट का आभारी होना चाहिए।रचना संसार के साथ-साथ दिनकर का जीवन वृत्त भी दिलचस्प है। पाठकों को उनके निबंधों में व्यक्त विचारों और भावनाओं की पृष्ठभूमि को समझने में उनके जीवन वृत्त से सहूलियत होगी। हिन्दी साहित्याकाश के अपने समय के इस जाज्वल्यमान नक्षत्र की दीप्ति समय के अंतराल के साथ कुछ अर्चिचत–सी हो गई है।


प्रमुख कृतियां:

गद्य रचनाएं: मिट्टी की ओर, रेती के फूल, वेणुवन, साहित्यमुखी, काव्य की भूमिका, प्रसाद पंत और मैथिलीशरणगुप्त, संस्कृति के चार अध्याय। पद्य रचनाएं: रेणुका, हुंकार, रसवंती, कुरूक्षेत्र, रश्मिरथी , परशुराम की प्रतिज्ञा, उर्वशी, हारे को हरिनाम ।


...............आग की भीख- दिनकर.....................



धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा।
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है,
मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज सो रहा है?
दाता पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।
प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।

बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?
मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।
तमवेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।
ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ।

आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,
बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ डेर हो रहा है,
है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है!
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है,
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।
जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।

मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है,
अरमानआरज़ू की लाशें निकल रही हैं।
भीगीखुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं,
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं,
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।

आँसूभरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
मेरे शमशान में आ श्रंगी जरा बजा दे।
फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे,
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे,
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।
बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।

ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे,
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।
हम दे चुके लहु हैं, तू देवता विभा दे,
अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे।
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ।
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ।


ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो
किसने कहा, युद्ध की बेला गई, शान्ति से बोलो?
किसने कहा, और मत बेधो हृदय वह्नि के शर से
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?

कुंकुम? लेपूँ किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान।

फूलों की रंगीन लहर पर ओ उतराने वाले!
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!
सकल देश में हालाहल है दिल्ली में हाला है,
दिल्ली में रौशनी शेष भारत में अंधियाला है।

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,
ज्यों का त्यों है खड़ा आज भी मरघट सा संसार।

वह संसार जहाँ पर पहुँची अब तक नहीं किरण है,
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर-वरण है।
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्तस्तल हिलता है,
माँ को लज्जा वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है।

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज,
सात वर्ष हो गए राह में अटका कहाँ स्वराज?

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रक्खे हैं किसने अपने कर में ?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी, बता किस घर में?


...............समर शेष है.....................





समर शेष है यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा,
और नहीं तो तुझ पर पापिनि! महावज्र टूटेगा।

समर शेष है इस स्वराज को सत्य बनाना होगा।
जिसका है यह न्यास, उसे सत्वर पहुँचाना होगा।
धारा के मग में अनेक पर्वत जो खड़े हुए हैं,
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अड़े हुए हैं,

कह दो उनसे झुके अगर तो जग में यश पाएँगे,
अड़े रहे तो ऐरावत पत्तों -से बह जाएँगे।

समर शेष है जनगंगा को खुल कर लहराने दो,
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो।
पथरीली, ऊँची ज़मीन है? तो उसको तोडेंग़े।
समतल पीटे बिना समर की भूमि नहीं छोड़ेंगे।

समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर,
खंड-खंड हो गिरे विषमता की काली जंज़ीर।

समर शेष है, अभी मनुज-भक्षी हुँकार रहे हैं।
गाँधी का पी रुधिर, जवाहर पर फुंकार रहे हैं।
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है,
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है।

समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
विचरें अभय देश में गांधी और जवाहर लाल।

तिमिरपुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्कांड रचें ना!
सावधान, हो खड़ी देश भर में गांधी की सेना।
बलि देकर भी बली! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर औ’ मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे!

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध



...............बालिका से वधु .....................




माथे में सेंदूर पर छोटी दो बिंदी चमचम-सी,
पपनी पर आँसू की बूँदें मोती-सी, शबनम-सी।
लदी हुई कलियों में मादक टहनी एक नरम-सी,
यौवन की विनती-सी भोली, गुमसुम खड़ी शरम-सी।

पीला चीर, कोर में जिसकी चकमक गोटा-जाली,
चली पिया के गांव उमर के सोलह फूलोंवाली।
पी चुपके आनंद, उदासी भरे सजल चितवन में,
आँसू में भींगी माया चुपचाप खड़ी आंगन में।

आँखों में दे आँख हेरती हैं उसको जब सखियाँ,
मुस्की आ जाती मुख पर, हँस देती रोती अँखियाँ।
पर, समेट लेती शरमाकर बिखरी-सी मुस्कान,
मिट्टी उकसाने लगती है अपराधिनी-समान।

भींग रहा मीठी उमंग से दिल का कोना-कोना,
भीतर-भीतर हँसी देख लो, बाहर-बाहर रोना।
तू वह, जो झुरमुट पर आयी हँसती कनक-कली-सी,
तू वह, जो फूटी शराब की निर्झरिणी पतली-सी।

तू वह, रचकर जिसे प्रकृति ने अपना किया सिंगार,
तू वह जो धूसर में आयी सुबज रंग की धार।
मां की ढीठ दुलार! पिता की ओ लजवंती भोली,
ले जायेगी हिय की मणि को अभी पिया की डोली।

कहो, कौन होगी इस घर तब शीतल उजियारी?
किसे देख हँस-हँस कर फूलेगी सरसों की क्यारी?
वृक्ष रीझ कर किसे करेंगे पहला फल अर्पण-सा?
झुकते किसको देख पोखरा चमकेगा दर्पण-सा?

किसके बाल ओज भर देंगे खुलकर मंद पवन में?
पड़ जायेगी जान देखकर किसको चंद्र-किरन में?
महँ-महँ कर मंजरी गले से मिल किसको चूमेगी?
कौन खेत में खड़ी फ़सल की देवी-सी झूमेगी?

बनी फिरेगी कौन बोलती प्रतिमा हरियाली की?
कौन रूह होगी इस धरती फल-फूलों वाली की?
हँसकर हृदय पहन लेता जब कठिन प्रेम-ज़ंजीर,
खुलकर तब बजते न सुहागिन, पाँवों के मंजीर।

घड़ी गिनी जाती तब निशिदिन उँगली की पोरों पर,
प्रिय की याद झूलती है साँसों के हिंडोरों पर।
पलती है दिल का रस पीकर सबसे प्यारी पीर,
बनती है बिगड़ती रहती पुतली में तस्वीर।

पड़ जाता चस्का जब मोहक प्रेम-सुधा पीने का,
सारा स्वाद बदल जाता है दुनिया में जीने का।
मंगलमय हो पंथ सुहागिन, यह मेरा वरदान;
हरसिंगार की टहनी-से फूलें तेरे अरमान।

जगे हृदय को शीतल करनेवाली मीठी पीर,
निज को डुबो सके निज में, मन हो इतना गंभीर।
छाया करती रहे सदा तुझको सुहाग की छाँह,
सुख-दुख में ग्रीवा के नीचे हो प्रियतम की बाँह।

पल-पल मंगल-लग्न, ज़िंदगी के दिन-दिन त्यौहार,
उर का प्रेम फूटकर हो आँचल में उजली धार।

पटकथा- धूमिल की सबसे लंबी कविता

जब मैं बाहर आया
मेरे हाथों में
एक कविता थी
और दिमाग में
आँतों का एक्स-रे।
वह काला धब्बा
कल तक एक शब्द था;
खून के अँधेर में
दवा का ट्रेडमार्क
बन गया था।
औरतों के लिये गै़र-ज़रूरी होने के बाद
अपनी ऊब का
दूसरा समाधान ढूँढना ज़रूरी है।
मैंने सोचा !

क्योंकि शब्द और स्वाद के बीच
अपनी भूख को ज़िन्दा रखना
जीभ और जाँघ के स्थानिक भूगोल की
वाजिब मजबूरी है।
मैंने सोचा और संस्कार के
वर्जित इलाकों में
अपनी आदतों का शिकार
होने के पहले ही बाहर चला आया।
बाहर हवा थी
धूप थी
घास थी
मैंने कहा आजादी…
मुझे अच्छी तरह याद है-
मैंने यही कहा था
मेरी नस-नस में बिजली
दौड़ रही थी
उत्साह में
खुद मेरा स्वर
मुझे अजनबी लग रहा था
मैंने कहा-आ-जा-दी
और दौड़ता हुआ खेतों की ओर
गया। वहाँ कतार के कतार
अनाज के अँकुए फूट रहे थे
मैंने कहा- जैसे कसरत करते हुये
बच्चे। तारों पर
चिडि़याँ चहचहा रही थीं
मैंने कहा-काँसे की बजती हुई घण्टियाँ…
खेत की मेड़ पार करते हुये
मैंने एक बैल की पीठ थपथपायी
सड़क पर जाते हुये आदमी से
उसका नाम पूछा
और कहा- बधाई…

घर लौटकर
मैंने सारी बत्तियाँ जला दीं
पुरानी तस्वीरों को दीवार से
उतारकर
उन्हें साफ किया
और फिर उन्हें दीवार पर (उसी जगह)
पोंछकर टाँग दिया।
मैंने दरवाजे के बाहर
एक पौधा लगाया और कहा–
वन महोत्सव…
और देर तक
हवा में गरदन उचका-उचकाकर
लम्बी-लम्बी साँस खींचता रहा
देर तक महसूस करता रहा–
कि मेरे भीतर
वक्त का सामना करने के लिये
औसतन ,जवान खून है
मगर ,मुझे शान्ति चाहिये
इसलिये एक जोड़ा कबूतर लाकर डाल दिया
‘गूँ..गुटरगूँ…गूँ…गुटरगूँ…’
और चहकते हुये कहा
यही मेरी आस्था है
यही मेरा कानून है।

इस तरह जो था उसे मैंने
जी भरकर प्यार किया
और जो नहीं था
उसका इंतज़ार किया।
मैंने इंतज़ार किया–
अब कोई बच्चा
भूखा रहकर स्कूल नहीं जायेगा
अब कोई छत बारिश में
नहीं टपकेगी।
अब कोई आदमी कपड़ों की लाचारी में
अपना नंगा चेहरा नहीं पहनेगा
अब कोई दवा के अभाव में
घुट-घुटकर नहीं मरेगा
अब कोई किसी की रोटी नहीं छीनेगा
कोई किसी को नंगा नहीं करेगा
अब यह ज़मीन अपनी है
आसमान अपना है
जैसा पहले हुआ करता था…
सूर्य,हमारा सपना है
मैं इन्तजा़र करता रहा..
इन्तजा़र करता रहा…
इन्तजा़र करता रहा…
जनतन्त्र,त्याग,स्वतन्त्रता…
संस्कृति,शान्ति,मनुष्यता…
ये सारे शब्द थे
सुनहरे वादे थे
खुशफ़हम इरादे थे

सुन्दर थे
मौलिक थे
मुखर थे
मैं सुनता रहा…
सुनता रहा…
सुनता रहा…
मतदान होते रहे
मैं अपनी सम्मोहित बुद्धि के नीचे
उसी लोकनायक को
बार-बार चुनता रहा
जिसके पास हर शंका और
हर सवाल का
एक ही जवाब था
यानी कि कोट के बटन-होल में
महकता हुआ एक फूल
गुलाब का।
वह हमें विश्वशान्ति के और पंचशील के सूत्र
समझाता रहा। मैं खुद को
समझाता रहा-’जो मैं चाहता हूँ-
वही होगा। होगा-आज नहीं तो कल
मगर सब कुछ सही होगा।

मैं अपनी सम्मोहित बुद्धि के नीचे
उसी लोकनायक को
बार-बार चुनता रहा
जिसके पास हर शंका और
हर सवाल का
एक ही जवाब था

यानी कि कोट के बटन-होल में
महकता हुआ एक फूल
गुलाब की भीड़ बढ़ती रही।
चौराहे चौड़े होते रहे।
लोग अपने-अपने हिस्से का अनाज
खाकर-निरापद भाव से
बच्चे जनते रहे।
योजनायेँ चलती रहीं
बन्दूकों के कारखानों में
जूते बनते रहे।
और जब कभी मौसम
उतार पर होता था।
हमारा संशय
हमें कोंचता था।
हम उत्तेजित होकर
पूछते थे
यह क्या है?
ऐसा क्यों है?
फिर बहसें होतीं थीं
शब्दों के जंगल में
हम एक-दूसरे को काटते थे
भाषा की खाई को
जुबान से कम जूतों से
ज्यादा पाटते थे

कभी वह हारता रहा…
कभी हम जीतते रहे…
इसी तरह नोक-झोंक चलती रही
दिन बीतते रहे…
मगर एक दिन मैं स्तब्ध रह गया।
मेरा सारा धीरज
युद्ध की आग से पिघलती हुयी बर्फ में
बह गया।
मैंने देखा कि मैदानों में
नदियों की जगह
मरे हुये साँपों की केंचुलें बिछी हैं
पेड़-टूटे हुये रडार की तरह खड़े हैं
दूर-दूर तक
कोई मौसम नहीं है
लोग-
घरों के भीतर नंगे हो गये हैं
और बाहर मुर्दे पड़े हैं
विधवायें तमगा लूट रहीं हैं
सधवायें मंगल गा रहीं हैं
वन-महोत्सव से लौटी हुई कार्यप्रणालियाँ
अकाल का लंगर चला रही हैं
जगह-जगह तख्तियाँ लटक रहीं हैं-
‘यह श्मशान है,यहाँ की तश्वीर लेना
सख्त मना है।’

क्योंकि शब्द और स्वाद के बीच
अपनी भूख को ज़िन्दा रखना
जीभ और जाँघ के स्थानिक भूगोल की
वाजिब मजबूरी है।

फिर भी उस उजाड़ में
कहीं-कहीं घास का हरा कोना
कितना डरावना है
मैंने अचरज से देखा कि दुनिया का
सबसे बड़ा बौद्ध- मठ
बारूद का सबसे बड़ा गोदाम है
अखबार के मटमैले हासिये पर
लेटे हुये ,एक तटस्थ और कोढ़ी देवता का
शांतिवाद ,नाम है
यह मेरा देश है…
यह मेरा देश है…
हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक
फैला हुआ
जली हुई मिट्टी का ढेर है
जहाँ हर तीसरी जुबान का मतलब-
नफ़रत है।
साज़िश है।
अन्धेर है।
यह मेरा देश है
और यह मेरे देश की जनता है
जनता क्या है?
एक शब्द…सिर्फ एक शब्द है:
कुहरा,कीचड़ और कांच से
बना हुआ…
एक भेड़ है
जो दूसरों की ठण्ड के लिये
अपनी पीठ पर
ऊन की फसल ढो रही है।

जनता क्या है?
एक शब्द…
सिर्फ एक शब्द है
कुहरा,कीचड़ और कांच से
बना हुआ…
एक भेड़ है
जो दूसरों की ठण्ड के लिये
अपनी पीठ पर
ऊन की फसल ढो रही है
एक पेड़ है
जो ढलान पर
हर आती-जाती हवा की जुबान में
हाँऽऽ..हाँऽऽ करता है
क्योंकि अपनी हरियाली से
डरता है।
गाँवों में गन्दे पनालों से लेकर
शहर के शिवालों तक फैली हुई
‘कथाकलि’ की अंमूर्त मुद्रा है
यह जनता…
उसकी श्रद्धा अटूट है
उसको समझा दिया गया है कि यहाँ
ऐसा जनतन्त्र है जिसमें
घोड़े और घास को
एक-जैसी छूट है
कैसी विडम्बना है
कैसा झूठ है
दरअसल, अपने यहाँ जनतन्त्र
एक ऐसा तमाशा है
जिसकी जान
मदारी की भाषा है।

दरअसल,
अपने यहाँ जनतन्त्र
एक ऐसा तमाशा है
जिसकी जान
मदारी की भाषा है।

हर तरफ धुआँ है
हर तरफ कुहासा है
जो दाँतों और दलदलों का दलाल है
वही देशभक्त है
अन्धकार में सुरक्षित होने का
नाम है- तटस्थता। ...

यहाँ कायरता के चेहरे पर
सबसे ज्यादा रक्त हैं।
जिसके पास थाली है
हर भूखा आदमी
उसके लिये,सबसे भद्दी गाली है...

हर तरफ कुआँ है
हर तरफ खाई है
यहाँ,सिर्फ ,वह आदमी,देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है
या फिर गरीब है...

मैं सोचता रहा
और घूमता रहा-
टूटे हुये पुलों के नीचे
वीरान सड़कों पर आँखों के
अंधे रेगिस्तानों में
फटे हुये पालों की
अधूरी जल-यात्राओं में
टूटी हुई चीज़ों के ढेर में
मैं खोयी हुई आजादी का अर्थ
ढूँढता रहा।

अपनी पसलियों के नीचे /अस्पतालों के
बिस्तरों में/ नुमाइशों में
बाजारों में /गाँवों में
जंगलों में /पहाडों पर
देश के इस छोर से उस छोर तक
उसी लोक-चेतना को
बार-बार टेरता रहा
जो मुझे दोबारा जी सके
जो मुझे शान्ति दे और
मेरे भीतर-बाहर का ज़हर
खुद पी सके।
–और तभी सुलग उठा पश्चिमी सीमान्त
…ध्वस्त…ध्वस्त…ध्वान्त…ध्वान्त…
मैं दोबार चौंककर खड़ा हो गया
जो चेहरा आत्महीनता की स्वीकृति में
कन्धों पर लुढ़क रहा था,
किसी झनझनाते चाकू की तरह
खुलकर,कड़ा हो गया…
अचानक अपने-आपमें जिन्दा होने की
यह घटना
इस देश की परम्परा की -
एक बेमिशाल कड़ी थी
लेकिन इसे साहस मत कहो
दरअस्ल,यह पुट्ठों तक चोट खायी हुई
गाय की घृणा थी...

मगर उसके तुरन्त बाद
मुझे झेलनी पड़ी थी-सबसे बड़ी ट्रैजेडी
अपने इतिहास की
जब दुनिया के स्याह और सफेद चेहरों ने
विस्मय से देखा कि ताशकन्द में
समझौते की सफेद चादर के नीचे
एक शान्तियात्री की लाश थी
और अब यह किसी पौराणिक कथा के
उपसंहार की तरह है कि इसे देश में
रोशनी उन पहाड़ों से आई थी
जहाँ मेरे पडो़सी ने
मात खायी थी।
मगर मैं फिर वहीं चला गया
अपने जुनून के अँधेरे में
फूहड़ इरादों के हाथों
छला गया।
वहाँ बंजर मैदान
कंकालों की नुमाइश कर रहे थे
गोदाम अनाजों से भरे थे और लोग
भूखों मर रहे थे
मैंने महसूस किया कि मैं वक्त के
एक शर्मनाक दौर से गुजर रहा हूँ
अब ऐसा वक्त आ गया है जब कोई
किसी का झुलसा हुआ चेहरा नहीं देखता है
अब न तो कोई किसी का खाली पेट
देखता है, न थरथराती हुई टाँगें
और न ढला हुआ ‘सूर्यहीन कन्धा’ देखता है
हर आदमी,सिर्फ, अपना धन्धा देखता है
सबने भाईचारा भुला दिया है
आत्मा की सरलता को भुलाकर
मतलब के अँधेरे में
सुला दिया है।
सहानुभूति और प्यार
अब ऐसा छलावा है जिसके ज़रिये
एक आदमी दूसरे को,अकेले –
अँधेरे में ले जाता है और
उसकी पीठ में छुरा भोंक देता है
ठीक उस मोची की तरह जो चौक से
गुजरते हुये देहाती को
प्यार से बुलाता है और मरम्मत के नाम पर
रबर के तल्ले में
लोहे के तीन दर्जन फुल्लियाँ
ठोंक देता है और उसके नहीं -नहीं के बावजूद
डपटकर पैसा वसूलता है
गरज़ यह है कि अपराध
अपने यहाँ एक ऐसा सदाबहार फूल है
जो आत्मीयता की खाद पर
लाल-भड़क फूलता है

अपराध
अपने यहाँ एक ऐसा सदाबहार फूल है
जो आत्मीयता की खाद पर
लाल-भड़क फूलता है
मैंने देखा कि
इस जनतांत्रिक जंगल में
हर तरफ हत्याओं के नीचे से निकलते है
हरे-हरे हाथ
और पेड़ों पर
पत्तों की जुबान बनकर
लटक जाते हैं
वे ऐसी भाषा बोलते हैं
जिसे सुनकर
नागरिकता की गोधूलि में
घर लौटते मुसाफिर
अपना रास्ता भटक जाते हैं।

उन्होंने किसी चीज को
सही जगह नहीं रहने दिया
न संज्ञा
न विशेषण
न सर्वनाम
एक समूचा और सही वाक्य
टूटकर
‘बि ख र’ गया है
उनका व्याकरण इस देश की
शिराओं में छिपे हुये कारकों का
हत्यारा है
उनकी सख्त पकड़ के नीचे
भूख से मरा हुआ आदमी
इस मौसम का
सबसे दिलचस्प विज्ञापन है और गाय
सबसे सटीक नारा है
वे खेतों मेंभूख और शहरों में
अफवाहों के पुलिंदे फेंकते हैं

भूख से मरा हुआ आदमी/
इस मौसम का
सबसे दिलचस्प विज्ञापन है
और गाय
सबसे सटीक नारा है
देश और धर्म और नैतिकता की
दुहाई देकर
कुछ लोगों की सुविधा
दूसरों की ‘हाय’पर सेंकते हैं
वे जिसकी पीठ ठोंकते हैं
उसकी रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है
वे मुस्कराते हैं और
दूसरे की आँख में झपटती हुई प्रतिहिंसा
करवट बदलकर सो जाती है
मैं देखता रहा…
देखता रहा…
हर तरफ ऊब थी
संशय था
नफरत थी
मगर हर आदमी अपनी ज़रूरतों के आगे
असहाय था। उसमें
सारी चीज़ों को नये सिरे से बदलने की
बेचैनी थी ,रोष था
लेकिन उसका गुस्सा
एक तथ्यहीन मिश्रण था:
आग और आँसू और हाय का।
इस तरह एक दिन-
जब मैं घूमते-घूमते थक चुका था
मेरे खून में एक काली आँधी-
दौड़ लगा रही थी
मेरी असफलताओं में सोये हुये
वहसी इरादों को
झकझोरकर जगा रही थी
अचानक ,नींद की असंख्य पर्तों में
डूबते हुये मैंने देखा
मेरी उलझनों के अँधेरे में
एक हमशक्ल खड़ा है
मैंने उससे पूछा-’तुम कौन हो?
यहाँ क्यों आये हो?
तुम्हें क्या हुआ है?’
‘तुमने पहचाना नहीं-मैं हिंदुस्तान हूँ
हाँ -मैं हिंदुस्तान हूँ’,
वह हँसता है-ऐसी हँसी कि दिल
दहल जाता है
कलेजा मुँह को आता है
और मैं हैरान हूँ
‘यहाँ आओ
मेरे पास आओ
मुझे छुओ।
मुझे जियो। मेरे साथ चलो
मेरा यकीन करो। इस दलदल से
बाहर निकलो!
सुनो!
तुम चाहे जिसे चुनो
मगर इसे नहीं। इसे बदलो।
मुझे लगा-आवाज़
जैसे किसी जलते हुये कुएँ से
आ रही है।
एक अजीब-सी प्यार भरी गुर्राहट
जैसे कोई मादा भेड़िया
अपने छौने को दूध पिला रही है
साथ ही किसी छौने का सिर चबा रही है...

मेरा सारा जिस्म थरथरा रहा था
उसकी आवाज में
असंख्य नरकों की घृणा भरी थी
वह एक-एक शब्द चबा-चबाकर
बोल रहा था। मगर उसकी आँख
गुस्से में भी हरी थी
वह कह रहा था-
‘तुम्हारी आँखों के चकनाचूर आईनों में
वक्त की बदरंग छायाएँ उलटी कर रही हैं
और तुम पेड़ों की छाल गिनकर
भविष्य का कार्यक्रम तैयार कर रहे हो
तुम एक ऐसी जिन्दगी से गुज़र रहे हो
जिसमें न कोई तुक है
न सुख है
तुम अपनी शापित परछाई से टकराकर
रास्ते में रुक गये हो
तुम जो हर चीज़
अपने दाँतों के नीचे
खाने के आदी हो
चाहे वह सपना अथवा आज़ादी हो
अचानक ,इस तरह,क्यों चुक गये हो
वह क्या है जिसने तुम्हें
बर्बरों के सामने अदब से
रहना सिखलाया है?
क्या यह विश्वास की कमी है
जो तुम्हारी भलमनसाहत बन गयी है
या कि शर्म
अब तुम्हारी सहूलियत बन गयी है
नहीं-सरलता की तरह इस तरह
मत दौड़ो
उसमें भूख और मन्दिर की रोशनी का
रिश्ता है। वह बनिये की पूँजी का
आधार है
मैं बार-बार कहता हूँ कि इस उलझी हुई
दुनिया में
आसानी से समझ में आने वाली चीज़
सिर्फ दीवार है।
और यह दीवार अब तुम्हारी आदत का
हिस्सा बन गयी है
इसे झटककर अलग करो
अपनी आदतों में
फूलों की जगह पत्थर भरो
मासूमियत के हर तकाज़े को
ठोकर मार दो
अब वक्त आ गया है तुम उठो
और अपनी ऊब को आकार दो।

आज मैं तुम्हें वह सत्य बतलाता हूँ
जिसके आगे हर सचाई
छोटी है। इस दुनिया में
भूखे आदमी का सबसे बड़ा तर्क
रोटी है।

मगर तुम्हारी भूख और भाषा में
यदि सही दूरी नहीं है
तो तुम अपने-आपको आदमी मत कहो
क्योंकि पशुता -
सिर्फ पूँछ होने की मज़बूरी नहीं है
वह आदमी को वहीं ले जाती है
जहाँ भूख
सबसे पहले भाषा को खाती है
वक्त सिर्फ उसका चेहरा बिगाड़ता है
जो अपने चेहरे की राख
दूसरों की रूमाल से झाड़ता है
जो अपना हाथ
मैला होने से डरता है
वह एक नहीं ग्यारह कायरों की
मौत मरता है

और सुनो! नफ़रत और रोशनी
सिर्फ़ उनके हिस्से की चीज़ हैं
जिसे जंगल के हाशिये पर
जीने की तमीज है
इसलिये उठो और अपने भीतर
सोये हुए जंगल को
आवाज़ दो
उसे जगाओ और देखो-
कि तुम अकेले नहीं हो
और न किसी के मुहताज हो
लाखों हैं जो तुम्हारे इन्तज़ार में खडे़ हैं
वहाँ चलो।उनका साथ दो
और इस तिलस्म का जादू उतारने में
उनकी मदद करो और साबित करो
कि वे सारी चीज़ें अन्धी हो गयीं हैं
जिनमें तुम शरीक नहीं हो…’

मैं पूरी तत्परता से
उसे सुन रहा था
एक के बाद दूसरा
दूसरे के बाद तीसरा
तीसरे के बाद चौथा
चौथे के बाद पाँचवाँ…
यानी कि एक के बाद दूसरा विकल्प
चुन रहा था
मगर मैं हिचक रहा था
क्योंकि मेरे पास
कुल जमा थोड़ी सुविधायें थीं
जो मेरी सीमाएँ थीं
यद्यपि यह सही है कि मैं
कोई ठण्डा आदमी नहीं है
मुझमें भी आग है-
मगर वह
भभककर बाहर नहीं आती
क्योंकि उसके चारों तरफ चक्कर काटता हुआ
एक ‘पूँजीवादी’दिमाग है
जो परिवर्तन तो चाहता है
मगर आहिस्ता-आहिस्ता
कुछ इस तरह कि चीज़ों की शालीनता
बनी रहे।
कुछ इस तरह कि काँख भी ढकी रहे
और विरोध में उठे हुये हाथ की
मुट्ठी भी तनी रहे…और यही है कि बात
फैलने की हद तक
आते-आते रुक जाती है
क्योंकि हर बार
चन्द सुविधाओं के लालच के सामने
अभियोग की भाषा चुक जाती है।
मैं खुद को कुरेद रहा था
अपने बहाने
उन तमाम लोगों की
असफलताओं को
सोच रहा था
जो मेरे नजदीक थे।
इस तरह साबुत और सीधे विचारों पर
जमी हुई काई और उगी हुई घास को
खरोंच रहा था,नोंच रहा था
पूरे समाज की सीवन उधेड़ते हुये
मैंने आदमी के भीतर की मैल
देख ली थी। मेरा सिर
भिन्ना रहा था
मेरा हृदय भारी था
मेरा शरीर इस बुरी तरह थका था कि मैं
अपनी तरफ़ घूरते उस चेहरे से
थोड़ी देर के लिये
बचना चाह रहा था
जो अपनी पैनी आँखों से
मेरी बेबसी और मेरा उथलापन
थाह रहा था
प्रस्तावित भीड़ में
शरीक होने के लिये
अभी मैंने कोई निर्णय नहीं लिया था
अचानक ,उसने मेरा हाथ पकड़कर
खींच लिया और मैं
जेब में जूतों का टोकन और दिमाग में
ताजे़ अखबार की कतरन लिये हुये
धड़ाम से-
चौथे आम चुनाव की सीढ़ियों से फिसलकर
मत-पेटियों के
गड़गच्च अँधेरे में गिर पड़ा
नींद के भीतर यह दूसरी नींद है
और मुझे कुछ नहीं सूझ रहा है
सिर्फ एक शोर है
जिसमें कानों के पर्दे फटे जा रहे हैं
शासन सुरक्षा रोज़गार शिक्षा …
राष्ट्रधर्म देशहित हिंसा अहिंसा…
सैन्यशक्ति देशभक्ति आजा़दी वीसा…
वाद बिरादरी भूख भीख भाषा…
शान्ति क्रान्ति शीतयुद्ध एटमबम सीमा…
एकता सीढ़ियाँ साहित्यिक पीढ़ियाँ निराशा…
झाँय-झाँय,खाँय-खाँय,हाय-हाय,साँय-साँय…
मैंने कानों में ठूँस ली हैं अँगुलियाँ
और अँधेरे में गाड़ दी है
आंखों की रोशनी।
सब-कुछ अब धीरे-धीरे खुलने लगा है
मत-वर्षा के इस दादुर-शोर में
मैंने देखा हर तरफ
रंग-बिरंगे झण्डे फहरा रहे हैं
गिरगिट की तरह रंग बदलते हुये
गुट से गुट टकरा रहे हैं
वे एक- दूसरे से दाँता-किलकिल कर रहे हैं
एक दूसरे को दुर-दुर,बिल-बिल कर रहे हैं
हर तरफ तरह -तरह के जन्तु हैं
श्रीमान्‌ किन्तु हैं
मिस्टर परन्तु हैं
कुछ रोगी हैं
कुछ भोगी हैं
कुछ हिंजड़े हैं
कुछ रोगी हैं
तिजोरियों के प्रशिक्षित दलाल हैं
आँखों के अन्धे हैं
घर के कंगाल हैं
गूँगे हैं
बहरे हैं
उथले हैं,गहरे हैं।
गिरते हुये लोग हैं
अकड़ते हुये लोग हैं
भागते हुये लोग हैं
पकड़ते हुये लोग हैं
गरज़ यह कि हर तरह के लोग हैं
एक दूसरे से नफ़रत करते हुये वे
इस बात पर सहमत हैं कि इस देश में
असंख्य रोग हैं
और उनका एकमात्र इलाज-
चुनाव है।

लेकिन मुझे लगा कि
एक विशाल दलदल के किनारे
बहुत बड़ा अधमरा पशु पड़ा हुआ है
उसकी नाभि में एक सड़ा हुआ घाव है
जिससे लगातार-भयानक बदबूदार मवाद
बह रहा है
उसमें जाति और धर्म और सम्प्रदाय और
पेशा और पूँजी के असंख्य कीड़े
किलबिला रहे हैं और अन्धकार में
डूबी हुई पृथ्वी
(पता नहीं किस अनहोनी की प्रतीक्षा में)
इस भीषण सड़ाँव को चुपचाप सह रही है
मगर आपस में नफरत करते हुये वे लोग
इस बात पर सहमत हैं कि
‘चुनाव’ ही सही इलाज है
क्योंकि बुरे और बुरे के बीच से
किसी हद तक ‘कम से कम बुरे को’ चुनते हुये
न उन्हें मलाल है,न भय है
न लाज है
दरअस्ल उन्हें एक मौका मिला है
और इसी बहाने
वे अपने पडो़सी को पराजित कर रहे हैं
मैंने देखा कि हर तरफ
मूढ़ता की हरी-हरी घास लहरा रही है
जिसे कुछ जंगली पशु
खूँद रहे हैं
लीद रहे हैं
चर रहे है
मैंने ऊब और गुस्से को
गलत मुहरों के नीचे से गुज़रते हुये देखा
मैंने अहिंसा को
एक सत्तारूढ़ शब्द का गला काटते हुये देखा
मैंने ईमानदारी को अपनी चोरजेबें
भरते हुये देखा
मैंने विवेक को
चापलूसों के तलवे चाटते हुये देखा…

मैं यह सब देख ही रहा था
कि एक नया रेला आया
उन्मत्त लोगों का बर्बर जुलूस।
वे किसी आदमी को
हाथों पर गठरी की तरह उछाल रहे थे
उसे एक दूसरे से छीन रहे थे।उसे घसीट रहे थे।
चूम रहे थे।पीट रहे थे। गालियाँ दे रहे थे।
गले से लगा रहे थे। उसकी प्रशंसा के गीत
गा रहे थे। उस पर अनगिनत झण्डे फहरा रहे थे।
उसकी जीभ बाहर लटक रही थी। उसकी आँखें बन्द
थीं। उसका चेहरा खून और आँसू से तर था।’मूर्खों!
यह क्या कर रहे हो?’ मैं चिल्लाया। और तभी किसी ने
उसे मेरी ओर उछाल दिया। अरे यह कैसे हुआ?
मैं हतप्रभ सा खड़ा था
और मेरा हमशक्ल
मेरे पैरों के पास
मूर्च्छित- सा
पड़ा था-
दुख और भय से झुरझुरी लेकर
मैं उस पर झुक गया
किन्तु बीच में ही रुक गया
उसका हाथ ऊपर उठा था
खून और आँसू से तर चेहरा
मुस्कराया था। उसकी आँखों का हरापन
उसकी आवाज में उतर आया था-
‘दुखी मत हो। यह मेरी नियति है।
मैं हिन्दुस्तान हूँ। जब भी मैंने
उन्हें उजाले से जोड़ा है
उन्होंने मुझे इसी तरह अपमानित किया है
इसी तरह तोड़ा है
मगर समय गवाह है
कि मेरी बेचैनी के आगे भी राह है।’

सुना। वह आहिस्ता-आहिस्ता कह रहा है
जैसे किसी जले हुये जंगल में
पानी का एक ठण्डा सोता बह रहा है
घास की की ताजगी- भरी
ऐसी आवाज़ है
जो न किसी से खुश है,न नाराज़ है।
‘भूख ने उन्हें जानवर कर दिया है
संशय ने उन्हें आग्रहों से भर दिया है
फिर भी वे अपने हैं…
अपने हैं…
अपने हैं…
जीवित भविष्य के सुन्दरतम सपने हैं
नहीं-यह मेरे लिये दुखी होने का समय
नहीं है।अपने लोगों की घृणा के
इस महोत्सव में
मैं शापित निश्चय हूँ

किसी का भय नहीं है।
‘तुम मेरी चिंता न करो। उनके साथ
चलो। इससे पहले कि वे
गलत हाथों के हथियार हों
इससे पहले कि वे नारों और इस्तहारों से
काले बाजा़र हों
उनसे मिलो।उन्हें बदलो।
नहीं-भीड़ के खिलाफ रुकना
एक खूनी विचार है
क्योंकि हर ठहरा हुआ आदमी
इस हिंसक भीड़ का
अन्धा शिकार है।
तुम मेरी चिन्ता मत करो।
मैं हर वक्त सिर्फ एक चेहरा नहीं हूँ
जहाँ वर्तमान
अपने शिकारी कुत्ते उतारता है
अक्सर में मिट्टी की हरक़त करता हुआ
वह टुकड़ा हूँ
जो आदमी की शिराओं में
बहते हुये खू़न को
उसके सही नाम से पुकारता हूँ
इसलिये मैं कहता हूँ,जाओ ,और
देखो कि लोग…

मैं कुछ कहना चाहता था कि एक धक्के ने
मुझे दूर फेंक दिया। इससे पहले कि मैं गिरता
किन्हीं मजबूत हाथों ने मुझे टेक लिया।
अचानक भीड़ में से निकलकर एक प्रशिक्षित दलाल
मेरी देह में समा गया। दूसरा मेरे हाथों में
एक पर्ची थमा गया। तीसरे ने एक मुहर देकर
पर्दे के पीछे ढकेल दिया।
भय और अनिश्चय के दुहरे दबाव में
पता नहीं कब और कैसे और कहाँ–
कितने नामों से और चिन्हों और शब्दों को
काटते हुये मैं चीख पड़ा-
‘हत्यारा!हत्यारा!!हत्यारा!!!’
मुझे ठीक ठीक याद नहीं है।मैंने यह
किसको कहा था। शायद अपने-आपको
शायद उस हमशक्ल को(जिसने खुद को
हिन्दुस्तान कहा था) शायद उस दलाल को
मगर मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है

मेरी नींद टूट चुकी थी
मेरा पूरा जिस्म पसीने में
सराबोर था। मेरे आसपास से
तरह-तरह के लोग गुजर रहे थे।
हर तरफ हलचल थी,शोर था।
और मैं चुपचाप सुनता हूँ
हाँ शायद -
मैंने भी अपने भीतर
(कहीं बहुत गहरे)
‘कुछ जलता हुआ सा ‘ छुआ है
लेकिन मैं जानता हूँ कि जो कुछ हुआ है
नींद में हुआ है
और तब से आजतक
नींद और नींद के बीच का जंगल काटते हुये
मैंने कई रातें जागकर गुजा़र दीं हैं
हफ्तों पर हफ्ते तह किये हैं
अपनी परेशानी के
निर्मम अकेले और बेहद अनमने क्षण
जिये हैं।
और हर बार मुझे लगा है कि कहीं
कोई खास फ़र्क़ नहीं है
ज़िन्दगी उसी पुराने ढर्रे पर चल रही है
जिसके पीछे कोई तर्क नहीं है

हाँ ,यह सही है कि इन दिनों
कुछ अर्जियाँ मँजूर हुई हैं
कुछ तबादले हुये हैं
कल तक जो थे नहले
आज
दहले हुये हैं

हाँ यह सही है कि
मन्त्री जब प्रजा के सामने आता है
तो पहले से ज्यादा मुस्कराता है
नये-नये वादे करता है
और यह सिर्फ़ घास के
सामने होने की मजबूरी है
वर्ना उस भले मानुस को
यह भी पता नहीं कि विधानसभा भवन
और अपने निजी बिस्तर के बीच
कितने जूतों की दूरी है।


हाँ यह सही है कि इन दिनों -चीजों के
भाव कुछ चढ़ गये हैं।अखबारों के
शीर्षक दिलचस्प हैं,नये हैं।
मन्दी की मार से
पट पड़ी हुई चीज़ें ,बाज़ार में
सहसा उछल गयीं हैं
हाँ यह सही है कि कुर्सियाँ वही हैं
सिर्फ टोपियाँ बदल गयी हैं और-
सच्चे मतभेद के अभाव में
लोग उछल-उछलकर
अपनी जगहें बदल रहे हैं
चढ़ी हुई नदी में
भरी हुई नाव में
हर तरफ ,विरोधी विचारों का
दलदल है
सतहों पर हलचल है
नये-नये नारे हैं
भाषण में जोश है
पानी ही पानी है
पर
की

ड़
खामोश है

मैं रोज देखता हूँ कि व्यवस्था की मशीन का
एक पुर्जा़ गरम होकर
अलग छिटक गया है और
ठण्डा होते ही
फिर कुर्सी से चिपक गया है
उसमें न हया है
न दया है

नहीं-अपना कोई हमदर्द
यहाँ नहीं है। मैंने एक-एक को
परख लिया है।
मैंने हरेक को आवाज़ दी है
हरेक का दरवाजा खटखटाया है
मगर बेकार…मैंने जिसकी पूँछ
उठायी है उसको मादा
पाया है।...

वे सब के सब तिजोरियों के
दुभाषिये हैं।
वे वकील हैं। वैज्ञानिक हैं।
अध्यापक हैं। नेता हैं। दार्शनिक
हैं । लेखक हैं। कवि हैं। कलाकार हैं।
यानी कि-
कानून की भाषा बोलता हुआ
अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।

भूख और भूख की आड़ में
चबायी गयी चीजों का अक्स
उनके दाँतों पर ढूँढना
बेकार है। समाजवाद
उनकी जुबान पर अपनी सुरक्षा का
एक आधुनिक मुहावरा है।
मगर मैं जानता हूँ कि मेरे देश का समाजवाद
मालगोदाम में लटकती हुई
उन बाल्टियों की तरह है जिस पर ‘आग’ लिखा है
और उनमें बालू और पानी भरा है।

मेरे देश का समाजवाद
मालगोदाम में लटकती हुई
उन बाल्टियों की तरह है
जिस पर ‘आग’ लिखा है
और उनमें बालू और पानी भरा है...

यहाँ जनता एक गाड़ी है
एक ही संविधान के नीचे
भूख से रिरियाती हुई फैली हथेली का नाम
‘दया’ है
और भूख में
तनी हुई मुट्ठी का नाम नक्सलबाड़ी है।...

मुझसे कहा गया कि संसद
देश की धड़कन को
प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है
जनता को
जनता के विचारों का
नैतिक समर्पण है
लेकिन क्या यह सच है?
या यह सच है कि
अपने यहां संसद -
तेली की वह घानी है
जिसमें आधा तेल है
और आधा पानी है
और यदि यह सच नहीं है
तो यहाँ एक ईमानदार आदमी को
अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है?
जिसने सत्य कह दिया है
उसका बुरा हाल क्यों है?

मैं अक्सर अपने-आपसे सवाल
करता हूँ जिसका मेरे पास
कोई उत्तर नहीं है
और आज तक –
नींद और नींद के बीच का जंगल काटते हुये
मैंने कई रातें जागकर गुजार दी हैं
हफ्ते पर हफ्ते तह किये हैं। ऊब के
निर्मम अकेले और बेहद अनमने क्षण
जिये हैं।
मेरे सामने वही चिरपरिचित अन्धकार है
संशय की अनिश्चयग्रस्त ठण्डी मुद्रायें हैं
हर तरफ शब्दभेदी सन्नाटा है।
दरिद्र की व्यथा की तरह
उचाट और कूँथता हुआ। घृणा में
डूबा हुआ सारा का सारा देश
पहले की तरह आज भी
मेरा कारागार है।

धूमिल साठोत्तरी कविता के धूमकेतु

हिंदी साहित्य की साठोत्तरी कविता के शलाका पुरुष स्व. सुदामा प्रसाद पाण्डेय धूमिल अपने बागी तेवर व समग्र उष्मा के सहारे संबोधन की मुद्रा में ललकारते दिखते हैं। तत्कालीन परिवेश में अनेक काव्यान्दोलनों का दौर सक्रिय था, परंतु वे किसी के सुर में सुर मिलाने के कायल न थे। उन्होंने तमाम ठगे हुए लोगों को जुबान दी। कालांतर में यही बुलन्द व खनकदार आवाज का कवि जन-जन की जुबान पर छा गया।

9 नवंबर 1936 को बनारस के खेवली गांव में जन्मे सुदामा पाण्डेय की प्रारंभिक शिक्षा गांव की प्राथमिक पाठशाला में हुई। हरहुआ के कूर्मि क्षत्रिय इण्टर कालेज से सन् 1953 ई. में हाईस्कूल की परीक्षा पास की। आगे की पढाई के लिए बनारस गये तो, मगर अर्थाभाव के चलते उसे जारी न रख सके। फिर क्या, आजीविका की तलाश में वे काशी से कलकत्ता तक भटकते रहे। नौकरी भी मिली तो लाभ कम, मानसिक यंत्रणा उन पर ज्यादा भारी पडी। वर्षो का सिरदर्द अंतत: ब्रेनट्यूमर बनकर मात्र उनतालिस वर्ष की अल्पायु में ही, उनकी मृत्यु का कारण बना।

सबसे पहली रचना धूमिल ने कक्षा 7 में पढते हुई की। इनकी प्रारंभिक रचनाएं गीत के रूप में मिलती हैं- बांसुरी जल गयी इनके फुटकर व शुरुआती गीतों का संग्रह है, जो आज उपलब्ध नहीं है। उनकी दो कहानियां फिर भी वह जिंदा है और कुसुम दीदी, उनकी मृत्युपरांत 1984 में प्रकाशित हुई। वैसे उनकी अक्षय कीर्ति की आधार बना संसद से सडक तक नामक कविता संग्रह, जो सन् 1971 में प्रकाश में आया।

भय, भूख, अकाल, सत्तालोलुपता, अकर्मण्यता और अन्तहीन भटकाव को रेखांकित करती, आक्रामकता से भरपूर इस संग्रह की सभी कविताएं अपने में बेजोड हैं। पच्चीस कविताओं के इस संग्रह में लगभग सभी रचनाएं तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक परिदृश्य का भी गहराई से परिचय कराती हैं। इस संदर्भ में कवि की समूची राजनैतिक समझ प्रखरता से उभरती है क्योंकि उनकी कविताओं में देहात और शहर, कविकर्म और राजनीति, आस्था और अनास्था, सामाजिकता और असामाजिकता, अहिंसा-हिंसा, ईमानदारी और बेईमानी, जिजीविषा और निराशा आदि प्राय: सभी मानव जीवन से सभ्य-असभ्य अंगों का चित्रण हुआ है। ये सभी चित्रण ठोस सामाजिक यथार्थ के दुर्लभ दस्तावेज हैं। इन कविताओं को पढते हुए ऐसा अनुभव होता है कि मानो कवि हाथ पकडकर कह रहा है- लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा, यह जुलूस के पीछे गिर पडा था। (संसद से सडक तक, पृष्ठ 10)

अकाल दर्शन शीर्षक कविता में कवि प्रश्न करता है- भूख कौन उपजाता है? चतुर आदमी जवाब दिए बगैर बेतहाशा बढती आबादी की ओर इशारा करता है। कवि इस कविता के मार्फत उन लोगों को तलाशता है जो देश के जंगल में भेडिये की तरह लोगों को खा रहे हैं और शोषित उन्हीं की जय-जयकार करने में जुटे हैं। एक दूसरी जोरदार कविता मित्र कवि राजकमल चौधरी के लिए लिख देश का नग्न यथार्थ प्रस्तुत किया है। धूमिल ने राजकमल की हिम्मत के प्रति अगाध श्रद्धा व्यक्त करते हुए लिखा है- वह एक ऐसा आदमी था जिसका मरना/कविता से बाहर नहीं है। (वही, पृष्ठ 73)

इस कृति की सर्वाधिक चर्चित व असरदार रचना मोचीराम है। इस कविता को धूमिल की प्रतिनिधि कविता माना जाता है। जनपक्षधरता के हिमायती कवि ने प्रतीक व बिम्बों के माध्यम से इसे जन-जन से जोडा है- मेरी निगाह में/ न कोई छोटा है/ न कोई बडा है/.. (वही, पृष्ठ 36) मोचीराम के भीतर एक सजग समाजवेत्ता बैठा है, जो महसूस करता है कि जीने के पीछे एक सार्थक उद्देश्य व तर्क तो होना ही चाहिए। वह जिंदगी को किताबों से नापने का कायल नहीं है।

भाषा की रात भी इस संग्रह की एक प्रखर कविता है। इसमें कवि उन चतुर लोगों को अपना निशाना बनाता है, जो तलवार को कलम के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इनकी उदारता में अवसरवाद की गंध है। इसी बहाने वे पूर्व एवं दक्षिण में भाषाई स्तर पर पडी दरार को भी उद्घाटित करते हैं- चंद चालाक लोगों ने.. बहस के लिए/ भूख की जगह/ भाषा को रख दिया है। (वही, 98 पृष्ठ)

धूमिल की अधिकांश कविताओं में कुछ ऐसे शब्द हैं, जो अक्सर मिल जाते हैं जैसे- जंगल, भूख, विदेशी मुद्रा, अमीन, लाल-हरी झण्डियां, फाइलें, विज्ञापन, वारण्ट आदि। ये सीधे तौर पर कवि के राजनीतिक-सामाजिक विमर्श की ओर संकेत करते हैं।

धूमिल अपने परिवेश और जटिल परिस्थितियों के प्रति अत्यन्त सक्रिय हैं। वे कविता के शाश्वत मूल्यों की तलाश करते हैं। वे भाषा, मुहावरों व उक्तियों की सीमाओं से टकराते नजर आते हैं, ताकि कुछ नया दे सकें। इस दृष्टि से वे महत्वपूर्ण हैं कि उन्होंने अपने दौर की कविता को भीड से निकाल जनतांत्रिक बनाया। उसका रुख ही बदल दिया। जनतंत्र का सूर्योदय, मुनासिब कार्यवाई, बारिश में भीगकर और सर्वाधिक लम्बी कविता पटकथा इस दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण रचनाएं हैं।

कल सुनना मुझे सन् 77 में धूमिल के मृत्योपरान्त प्रकाश में आया दूसरा और सशक्त काव्यसंग्रह है। वे हमेशा आत्मसम्मोहन और लेखकीय दादागीरी के खिलाफ रहे। किसी भी कविता को वे पहले सूक्तियों में लिखते थे। असल में बहुत ही अव्यवस्थित और बिखरा-बिखरा उनका कवि कर्म उन्हें अन्य साहित्यकारों से अलग करता है।

इसकी पृष्ठभूमि में उनका गंवई जीवन था। वे घर-घर की समस्याओं, मुकदमेबाजी, पारिवारिक असंगतियों, अंधविश्वास और पिछडेपन का दंश झेलते हुए कविता-रचना के लिए समय निकाल उसी ऊब, उसी हताशा को रेखांकित करते हैं- मेरे गांव में/ वही आलस्य, वही ऊब/ वही कलह, वही तटस्थता/ हर जगह और हर रोज..

(कल सुनना मुझे, पृष्ठ 76)

वे शहर की चतुराई, बेहयाई, छल प्रपंच से परिचित हैं। पूंजीवादी बाजार व्यवस्था को वे अकेले चुनौती देते हैं। वे पहले ऐसे कवि हैं जो आत्महीनता के खिलाफ, पूरे आत्मविश्वास के साथ, कविता के द्वारा जरूरी हस्तक्षेप करते हैं। उनकी कविता जिंदगी के ताप से भरती चलती है और ठहरे हुए आदमी को हरकत में लाकर ही दम लेती है।

सन् 1984 में धूमिल की तीसरी और अंतिम अनूठी काव्यकृति सुदामा पाण्डेय का प्रजातंत्र आने पर पर्याप्त ख्याति अर्जित कर चुकी थी। यह संग्रह तत्कालीन साम्राज्यवादी ताकतों को बेनकाब करती है। कवि एक ठोस सैद्धांतिक धरातल पर खडा होकर अव्यवस्था और अमानवीयता के प्रति मुखर हो उठता है। इस अव्यवस्था की जडों को उखाड फेंकने के लिए वह विचारधारा के माध्यम से संघर्ष करता है-

न मैं पेट हूं/ न दीवार हूं/ न पीठ हूं/ अब मैं विचार हूं (सुदामा प्र. पाण्डेय का प्रजातंत्र, पृ. 43)

कवि तमाम तरह की विद्रूपताओं को खुलकर कहता और लिखता है। इसीलिए उन पर आरोप है कि विशेष रूप से नारी के प्रति वितृष्णा से भरा है। ध्यान रहे- यह उनकी सभी कविताओं के साथ जोडकर न देखें तो न्याय होगा। मां और पत्नी के प्रति उनका आत्मीय संबंध लाजवाब है। सच तो यह है कि अतिशय यथार्थ सामने रखकर उन बातों से अश्लीलता के प्रति वितृष्णा पैदा करने की कोशिश भर की है।

इस संबंध में आचार्य प्रवर स्व. विद्यानिवास मिश्र लिखते हैं- धूमिल के काव्य में काम नहीं है बल्कि कामुकता के प्रति गहरी वितृष्णा है। वह पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र की तरह गरिमा के लिए ही कुछ तीखा होना चाहता है। धूमिल के काव्य की जांच इसलिए धूमिल की वास्तविक चिंता की दृष्टि से की जानी शेष है, भाषा के तेवर की, विचार की तीक्ष्णता की चर्चा तो बहुत हो चुकी है।

कवि धूमिल का शिल्प-विधान और भाषा अपने समकालीन सरोकारों, गंवई सुगंध, ईमानदार व्यक्ति की बगैर लपछप की एक अनूठी झलक है। उनकी नजर में कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है। वे मानते हैं- एक सही कविता पहले एक सार्थक व्यक्तव्य होती है। यह भी सच है, कि वे भाषा का भ्रम तोडना चाहते हैं। वे जनता की यातना और दुख से उभरी तेजस्वी भाषा में कविताई करना पसंद करते हैं। वे कहते हैं- आज महत्व शिल्प का नहीं, कथ्य का है, सवाल यह नहीं कि आपने किस तरह कहा है, सवाल यह है कि आपने क्या कहा है। (कविता पर एक वक्तव्य-धूमिल, नया प्रतीक- 78 पृष्ठ 5)

धूमिल की भाषा का संबोधनात्मक प्रयोग भी उन्हें तमाम समकालीन मुलम्मेदार व पाण्डित्य-प्रदर्शन-प्रिय कवियों से अलग व एक विशिष्ट पहचान देता है। उनकी कविता नये विम्ब विधान व नये संदर्भो में जनता के संघर्ष के स्वर में स्वर मिलाती है। इस दृष्टि से उनकी काव्यभाषा सामाजिक संरचना के औचित्य को चुनौती देती है। उनके काव्य बिंब अपने परवर्ती कवियों से पृथक हैं। वे अपनी प्रकृति और प्रस्तुति में अद्भुत हैं-धूप मां की गोद सी गर्म थी। कहकर कवि मां की महिमा को सिर माथे स्वीकारता है। छंदविधान की दृष्टि से उनकी लगभग सभी कविताएं गद्यात्मक लय की ओर झुकी हुई हैं। कविता की एकरसता और लंबाई तोडने के उद्देश्य से वे पंक्तियों को छोटा-बडा करते हैं और तुकों द्वारा तालमेल एवं लय स्थापित करते हैं। हिंदी कविता को नए तेवर देने वाले इस जनकवि का योगदान चिरस्मरणीय है और रहेगा।

कविता के बारे में धूमिल का विचार

एक सही कविता
पहले
एक सार्थक वक्तव्य होती है।

जीवन में कविता की अहमियत

कविता
भाष़ा में
आदमी होने की
तमीज है।

लेकिन आज के हालात में

कविता
घेराव में
किसी बौखलाये हुये
आदमी का संक्षिप्त एकालाप है।

तथा

कविता
शब्दों की अदालत में
अपराधियों के कटघरे में
खड़े एक निर्दोष आदमी का
हलफनामा है।

बुद्धजीवियों और कवियों के बारे में लिखते हुए सवाल...

आखिर मैं क्या करूँ
आप ही जवाब दो?
तितली के पंखों में
पटाखा बाँधकर भाषा के हलके में
कौन सा गुल खिला दूँ
जब ढेर सारे दोस्तों का गुस्सा
हाशिये पर चुटकुला बन रहा है
क्या मैं व्याकरण की नाक पर रूमाल बाँधकर
निष्ठा का तुक विष्ठा से मिला दँ?

आज के समय में प्यार के बारे में धूमिल का विचार...
एक सम्पूर्ण स्त्री होने के
पहले ही गर्भाधान की क्रिया से गुज़रते हुये
उसने जाना कि प्यार
घनी आबादीवाली बस्तियों में
मकान की तलाश है।

बेकारी, गरीबी, बढ़ती जनसंख्या के बारे में लिखते हुये कहते हैं धूमिल-

मैंने उसका हाथ पकड़ते हुये कहा-
‘बच्चे तो बेकारी के दिनों की बरकत हैं’
इससे वे भी सहमत हैं
जो हमारी हालत पर तरस खाकर,खाने के लिये
रसद देते हैं।
उनका कहना है कि बच्चे हमें
बसन्त बुनने में मदद देते हैं।

देश में एकता ,क्रान्ति के क्या मायने रह गये हैं:-

वे चुपचाप सुनते हैं
उनकी आँखों में विरक्ति है
पछतावा है
संकोच है
या क्या है कुछ पता नहीं चलता
वे इस कदर पस्त हैं-
कि तटस्थ हैं
और मैं सोचने लगता हूँ कि इस देश में
एकता युद्ध की और दया
अकाल की पूंजी है।
क्रान्ति -
यहाँ के असंग लोगों के लिये
किसी अबोध बच्चे के-
हाथों की जूजी है।

अपराधी तत्वों के मजे हैं आज की व्यवस्था में:-

….और जो चरित्रहीन है
उसकी रसोई में पकने वाला चावल
कितना महीन है।

सबसे प्रसिद्ध कविता पंक्तियां धूमिल ने अपनी लंबी कविता पटकथा में लिखीं हैं।इस कविता में आजादी के बाद से सत्तर के दशक तक का देश के हालात का बेबाक लेखा- जोखा है:-

मुझसे कहा गया कि संसद
देश की धड़कन को
प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है
जनता को
जनता के विचारों का
नैतिक समर्पण है
लेकिन क्या यह सच है?
या यह सच है कि
अपने यहां संसद -
तेली की वह घानी है
जिसमें आधा तेल है
और आधा पानी है
और यदि यह सच नहीं है
तो यहाँ एक ईमानदार आदमी को
अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है?
जिसने सत्य कह दिया है
उसका बुरा हाल क्यों है?

मोचीराम- धूमिल

राँपी से उठी हुई आँखों ने मुझे
क्षण-भर टटोला
और फिर
जैसे पतियाये हुये स्वर में
वह हँसते हुये बोला-
बाबूजी सच कहूँ-मेरी निगाह में
न कोई छोटा है
न कोई बड़ा है
मेरे लिये,हर आदमी एक जोड़ी जूता है
जो मेरे सामने
मरम्मत के लिये खड़ा है।

और असल बात तो यह है
कि वह चाहे जो है
जैसा है,जहाँ कहीं है
आजकल
कोई आदमी जूते की नाप से
बाहर नहीं है
फिर भी मुझे ख्याल है रहता है
कि पेशेवर हाथों और फटे जूतों के बीच
कहीं न कहीं एक आदमी है
जिस पर टाँके पड़ते हैं,
जो जूते से झाँकती हुई अँगुली की चोट छाती पर
हथौड़े की तरह सहता है।

यहाँ तरह-तरह के जूते आते हैं
और आदमी की अलग-अलग ‘नवैयत’
बतलाते हैं
सबकी अपनी-अपनी शक्ल है
अपनी-अपनी शैली है
मसलन एक जूता है:
जूता क्या है-चकतियों की थैली है
इसे एक आदमी पहनता है
जिसे चेचक ने चुग लिया है
उस पर उम्मीद को तरह देती हुई हँसी है
जैसे ‘टेलीफ़ून ‘ के खम्भे पर
कोई पतंग फँसी है
और खड़खड़ा रही है।

‘बाबूजी! इस पर पैसा क्यों फूँकते हो?’
मैं कहना चाहता हूँ
मगर मेरी आवाज़ लड़खड़ा रही है
मैं महसूस करता हूँ-भीतर से
एक आवाज़ आती है-’कैसे आदमी हो
अपनी जाति पर थूकते हो।’
आप यकीन करें,उस समय
मैं चकतियों की जगह आँखें टाँकता हूँ
और पेशे में पड़े हुये आदमी को
बड़ी मुश्किल से निबाहता हूँ।

एक जूता और है जिससे पैर को
‘नाँघकर’ एक आदमी निकलता है
सैर को
न वह अक्लमन्द है
न वक्त का पाबन्द है
उसकी आँखों में लालच है
हाथों में घड़ी है
उसे जाना कहीं नहीं है
मगर चेहरे पर
बड़ी हड़बड़ी है
वह कोई बनिया है
या बिसाती है
मगर रोब ऐसा कि हिटलर का नाती है
‘इशे बाँद्धो,उशे काट्टो,हियाँ ठोक्को,वहाँ पीट्टो
घिस्सा दो,अइशा चमकाओ,जूत्ते को ऐना बनाओ
…ओफ्फ़! बड़ी गर्मी है’
रुमाल से हवा करता है,
मौसम के नाम पर बिसूरता है
सड़क पर ‘आतियों-जातियों’ को
बानर की तरह घूरता है
गरज़ यह कि घण्टे भर खटवाता है
मगर नामा देते वक्त
साफ ‘नट’ जाता है
शरीफों को लूटते हो’ वह गुर्राता है
और कुछ सिक्के फेंककर
आगे बढ़ जाता है
अचानक चिंहुककर सड़क से उछलता है
और पटरी पर चढ़ जाता है
चोट जब पेशे पर पड़ती है
तो कहीं-न-कहीं एक चोर कील
दबी रह जाती है
जो मौका पाकर उभरती है
और अँगुली में गड़ती है।

मगर इसका मतलब यह नहीं है
कि मुझे कोई ग़लतफ़हमी है
मुझे हर वक्त यह खयाल रहता है कि जूते
और पेशे के बीच
कहीं-न-कहीं एक अदद आदमी है
जिस पर टाँके पड़ते हैं
जो जूते से झाँकती हुई अँगुली की चोट
छाती पर
हथौड़े की तरह सहता है
और बाबूजी! असल बात तो यह है कि ज़िन्दा रहने के पीछे
अगर सही तर्क नहीं है
तो रामनामी बेंचकर या रण्डियों की
दलाली करके रोज़ी कमाने में
कोई फर्क नहीं है
और यही वह जगह है जहाँ हर आदमी
अपने पेशे से छूटकर
भीड़ का टमकता हुआ हिस्सा बन जाता है
सभी लोगों की तरह
भाष़ा उसे काटती है
मौसम सताता है
अब आप इस बसन्त को ही लो,
यह दिन को ताँत की तरह तानता है
पेड़ों पर लाल-लाल पत्तों के हजा़रों सुखतल्ले
धूप में, सीझने के लिये लटकाता है
सच कहता हूँ-उस समय
राँपी की मूठ को हाथ में सँभालना
मुश्किल हो जाता है
आँख कहीं जाती है
हाथ कहीं जाता है
मन किसी झुँझलाये हुये बच्चे-सा
काम पर आने से बार-बार इन्कार करता है
लगता है कि चमड़े की शराफ़त के पीछे
कोई जंगल है जो आदमी पर
पेड़ से वार करता है
और यह चौकने की नहीं,सोचने की बात है
मगर जो जिन्दगी को किताब से नापता है
जो असलियत और अनुभव के बीच
खून के किसी कमजा़त मौके पर कायर है
वह बड़ी आसानी से कह सकता है
कि यार! तू मोची नहीं ,शायर है
असल में वह एक दिलचस्प ग़लतफ़हमी का
शिकार है
जो वह सोचता कि पेशा एक जाति है
और भाषा पर
आदमी का नहीं,किसी जाति का अधिकार है
जबकि असलियत है यह है कि आग
सबको जलाती है सच्चाई
सबसे होकर गुज़रती है
कुछ हैं जिन्हें शब्द मिल चुके हैं
कुछ हैं जो अक्षरों के आगे अन्धे हैं
वे हर अन्याय को चुपचाप सहते हैं
और पेट की आग से डरते हैं
जबकि मैं जानता हूँ कि ‘इन्कार से भरी हुई एक चीख़’
और ‘एक समझदार चुप’
दोनों का मतलब एक है-
भविष्य गढ़ने में ,’चुप’ और ‘चीख’
अपनी-अपनी जगह एक ही किस्म से
अपना-अपना फ़र्ज अदा करते हैं।

प्रियंका करेंगी कांग्रेस का उद्धार !

प्रियंका ने नरेंद्र मोदी को जवाब क्या दिया कांग्रेसियों की बांछें खिल गयीं। उन्हें लगता है जैसे प्रियंका कांग्रेस के बचाव में उतरी हैं, जल्द ही सक्रिय राजनीति में उतर जायेंगी। ये अलग बात है कि प्रियंका अब भी रायबरेली अमेठी में पूरी तरह से कमान संभाली हैं। प्रियंका के जवाब को कांग्रेसी सक्रिय राजनीति में आने की पहली सीढ़ी मान रहे हैं। उनके मुताबिक अगर प्रियंका राजनीति में उतरती हैं तो पार्टी में नयी जान आ जायेगी। हालांकि वो जानते हैं कि फैसला प्रियंका को ही करना है। एक अर्से से कार्यकर्ता प्रियंका को राजनीति में लाने की मांग कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि उनके आने से कांग्रेस का उद्धार होगा।

गुरुवार, अप्रैल 09, 2009

दोस्तों से दुश्मनी अच्छी नहीं- 'प्राण शर्मा'

नित नई नाराज़गी अच्छी नहीं
प्यार में रस्सा-कशी अच्छी नहीं
दिल्लगी जिन्दादिली से कीजिए
दिलजलों से दिल्लगी अच्छी नहीं
एक रब है और हैं मज़हब कई
बात दुनिया में यही अच्छी नहीं
ज़िन्दगी से प्यार करते हो मगर
कहते हो कि ज़िन्दगी अच्छी नहीं
मुस्कुराओ कुछ तो जीवन में कभी
हर घड़ी संजीदगी अच्छी नहीं
मिलते हैं कहां ये रोज़ रोज़
दोस्तों से दुश्मनी अच्छी नहीं

आइना देकर मुझे मुंह फेर लेता है तू क्यूं

आइना देकर मुझे, मुंह फेर लेता है तू क्यूं
है ये बदसूरत, कह दे झिझकने क्यूं लगा
दिल ने ही राहे-मुहब्बत को चुना था एक दिन
आज आंखों से निकल कर ग़म टपकने क्यूं लगा
गर ये अहसासे-वफ़ा जागा नहीं दिल में मिरे
नाम लेते ही तिरा, फिर दिल धड़कने क्यूं लगा
जाते जाते कह गया था, फिर न आएगा कभी
आज फिर उस ही गली में दिल भटकने क्यूं लगा
छोड़ कर तू भी गया अब, मेरी क़िस्मत की तरह
तेरे संगे-आसतां पर सर पटकने क्यूं लगा
ख़ुश्बुओं को रोक कर बादे-सबा ने यूं कहा
उस के जाने पर चमन फिर भी महकने क्यूं लगा।

मेरी गली के लोग भी कितने अजीब हैं...


मज़हब के नाम पर दिलों से सब क़रीब हैं

मेरी गली के लोग भी कितने अजीब हैं
वे दोस्त, मेरे दोस्त ज़रूरी तो ये नहीं

तेरे क़रीब भी हों जो मेरे क़रीब हैं
उस माँ की खुशदिली का ठिकाना न पूछिए

जिस माँ के बाल-बच्चे सभी खुशनसीब हैं

इसकी हरेक चीज़ मुझे तो अजीज़ है

माना कि जग के ढंग अजीबो-ग़रीब हैं

महफूज़ हैं वे प्राण ख़बर तुझ को भी तो हो

सारे मकाँ जो तेरे मकाँ के क़रीब हैं

बुधवार, अप्रैल 08, 2009

फासले ऐसे भी होंगे - अदीम हाश्मी


फासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा ना था

सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था ,

वो कि खुशबु की तरह फैला था मेरे चारसू,

मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था

रात भर उसी की आहट कान में आती रही

झाँक कर देखा गली में कोई भी आया न था,

अक्स तो मौजूद थे पर अक्स तन्हाई के थे

आईना तो था मगर उस में तेरा चेहरा ना था

उसने दर्द भी अपने अलहदा कर दिए

आज मैं रोया तो मेरे साथ वो रोया ना था

ये सभी वीरानियाँ उसके जुदा होने से थी

आँख धुंधलाई हुयी थी शहर धुन्धलाया हुआ ना था,

याद करके और भी तकलीफ होती थी

भूल जाने के सिवा कोई भी चारा न था।

हम तो हैं परदेश में देश में निकला होगा चाँद...- राही मासून रज़ा

हम तो हैं परदेश में देश में निकला होगा चाँद
अपनी रात की छत पे कितना तनहा होगा चाँद।
चाँद बिना हर शब यों बीती जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा कैसा होगा चाँद।
आ पिया मोरे नैनन में मैं पलक ढाँप तोहे लूँ
ना मैं देखूँ और को, ना तोहे देखन दूँ।
रात ने ऐसा पेंच लगाया टूटी हाथ से डोर
आँगन वाले नीम में जाकर अटका होगा चाँद।
जिन आँखों में काजल बन कर तैरी काली रात
उन आँखों में आँसू का इक कतरा होगा चान्द।...

रविवार, मार्च 29, 2009

यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता

कोई काँटा चुभा नहीं होता
दिल अगर फूल सा नहीं होता
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता
गुफ़्तगू उन से रोज़ होती है
मुद्दतों सामना नहीं होता
जी बहुत चाहता सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता
रात का इंतज़ार कौन करे
आज कल दिन में क्या नहीं होता

शनिवार, मार्च 28, 2009

हसरत जयपुरी की ग़ज़लें

1.
एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों
बनता है मेरा काम तुम्हारे ही काम से
होता है मेरा नाम तुम्हारे ही नाम से
तुम जैसे मेहरबां का सहारा है दोस्तों
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों
जब आ पडा है कोई भी मुश्किल का रास्ता
मैंने दिया है तुम को मुहब्बत का वास्ता
हर हाल में तुम्हीं को पुकारा है दोस्तों
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों
यारों ने मेरे वास्ते क्या कुछ नहीं किया
सौ बार शुक्रिया अरे सौ बार शुक्रिया
बचपन तुम्हारे साथ गुज़ारा है दोस्तो
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों

2.
इस तरह हर ग़म भुलाया कीजिये
रोज़ मैख़ाने में आया कीजिये
छोड़ भी दीजिये तकल्लुफ़ शेख़ जी
जब भी आयें पी के जाया कीजिये
ज़िंदगी भर फिर न उतेरेगा नशा
इन शराबों में नहाया कीजिये
ऐ हसीनों ये गुज़ारिश है मेरी
अपने हाथों से पिलाया कीजिए

3.

तकदीर का फसाना जाकर किसे सुनाएं
इस दिल में जल रही हैं अरमान की चिताएं ।।

सांसों में आज मेरे तूफान उठ रहे हैं
शहनाईयों से कह दो कहीं और जाकर गायें
इस दिल में जल रही हैं अरमान की चिताएं ।।

मतवाले चांद सूरज, तेरा उठायें डोला
तुझको खुशी की परियां घर तेरे लेके जाएं
इस दिल में जल रही हैं अरमान की चिताएं ।।

तुम तो रहो सलामत, सेहरा तुम्हें मुबारक
मेरा हरेक आंसू देने लगा दुआएं
इस दिल में जल रही हैं अरमान की चिताएं ।।

4.

ये कौन आ गई दिलरुबा महकी महकी
फ़िज़ा महकी महकी हवा महकी महकी
वो आँखों में काजल वो बालों में गजरा
हथेली पे उसके हिना महकी महकी
ख़ुदा जाने किस-किस की ये जान लेगी
वो क़ातिल अदा वो सबा महकी महकी
सवेरे सवेरे मेरे घर पे आई
ऐ "हसरत" वो बाद-ए-सबा महकी महकी

5.

ये किस ने कहा है मेरी तक़दीर बना दे
आ अपने ही हाथों से मिटाने के लिये आ
ऐ दोस्त मुझे गर्दिश-ए-हालात ने घेरा
तू ज़ुल्फ़ की कमली में छुपाने के लिये आ
दीवार है दुनिया इसे राहों से हटा दे
हर रस्म मुहब्बत की मिटाने के लिये आ
मतलब तेरी आमद से है दरमाँ से नहीं
"हसरत" की क़सम दिल ही दुखाने के लिये आ

6.

चल मेरे साथ ही चल ऐ मेरी जान-ए-ग़ज़ल
इन समाजों के बनाये हुये बंधन से निकल चल
हम वहाँ जाये जहाँ प्यार पे पहरे न लगें
दिल की दौलत पे जहाँ कोई लुटेरे न लगें कब
है बदला ये ज़माना, तू ज़माने को बदल चल
प्यार सच्चा हो तो राहें भी निकल आती हैं
बिजलियाँ अर्श से ख़ुद रास्ता दिखलाती हैं
तू भी बिजली की तरह ग़म के अँधेरों से निकल चल
अपने मिलने पे जहाँ कोई भी उँगली न उठे
अपनी चाहत पे जहाँ कोई दुश्मन न हँसे
छेड़ दे प्यार से तू साज़-ए-मोहब्बत-ए-ग़ज़ल चल
पीछे मत देख न शामिल हो गुनाहगारों में
सामने देख कि मंज़िल है तेरी तारों में
बात बनती है अगर दिल में इरादे हों अटल चल

हम रातों को उठ उठ के / हसरत जयपुरी

हम रातों को उठ-उठ के जिनके लिये रोते हैं
वो ग़ैर की बाहों में आराम से सोते हैं

हम अश्क जुदाई के गिरने ही नहीं देते
बेचैन सी पलओं में मोती से पिरोते हैं

होता चला आया है बेदर्द ज़माने में
सच्चाई की राहों में काँटे सभी बोतें हैं

अंदाज-ए-सितम उन का देखे तो कोई
मिलने को तो मिलते हैं नश्तर से चुभोते हैं

यारो मुझे मुआफ़ करो मैं नशे में हूँ / हसरत जयपुरी

यारो मुझे मु'आफ़ करो मैं नशे में हूँ
अब थोड़ी दूर साथ चलो मैं नशे में हूँ

जो कुछ भी कह रहा हूँ नशा बोलत है ये
इसका न कुछ ख़याल करो मैं नशे में हूँ

उस मैकदे की राह मे गिर जाऊँ न कहीं
अब मेरा हाथ थाम तो लो मैं नशे में हूँ

मुझको तो अपने घर का पता याद ही नहीं
तुम मेरे आस पास रहो मैं नशे में हूँ

कैसी गुज़र रही है मुहब्बत में ज़िंदगी
कुछ अपना हाल कहो मैं नशे में हूँ

शुक्रवार, मार्च 27, 2009

इंसान इंसान की बलि मांग रहे हैं - हयात हाशमी

दिल खून है, हर आँख है नम,

देख रहे हो इस दौर का दस्तूर-ए-करम,

देख रहे हो इंसान से इंसान की बलि मांग रहे हैं

ज़हनों के तराशीदा सनम, देख रहे हो

अखबार में मिलती है सदा खून की सुर्खी

औराक़-ए-सियाह पोश का ग़म देख रहे हो

बेबस है मेरी ज़ात तो मजबूर महज़ तुम

आज़ाद ग़ुलामों के सितम देख रहे हो

इंसान के बचने की कोई राह नहीं है

हर मोड़ पे ये दैर-ओ-हरम देख रहे हो

खुद अपने लिए फ़ैसला-ए-मौत लिखा है

टूटी हुई ये नोक-ए-क़लम देख रहे हो

देखा है हयात हमने उन्हें मौत के मुँह में

तुम जिनको किताबों में रक़म देख रहे हो

मुझे देख के हँसती है दुनिया - राहत इन्दौरी

वो इक इक बात पर रोने लगा था

समन्दर आबरू खोने लगा था

लगे रहते थे सब दरवाज़े , फिर भी मैं

आँखें खोल कर सोने लगा था

चुराता हूँ अब आँखें आईनों से

खुदा का सामना होने लगा था

वो अब आईने धोता फिर रहा है

उसे चहरों पे शक होने लगा था

मुझे अब देख के हँसती है दुनिया

मैं सब के सामने रोने लगा था

दुनिया बच्चों का खिलौना है

दुनिया जिसे कहते हैं बच्चे का खिलौना है
मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है

अच्छा सा कोई मौसम तन्हा सा कोई आलम
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है

बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है

ये वक़्त जो तेरा है, ये वक़्त जो मेरा है
हर गाम पे पहरा है फिर भी इसे खोना है

ग़म हों कि खुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं
फिर रस्ता ही रस्ता है, हँसना है न रोना है

आवारा मिज़ाजी ने फैला दिया आँगन को
आकाश की चादर है, धरती का बिछौना है

ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटाकर देखो

धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो
ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटाकर देखो।

सिर्फ़ आँखों से ही दुनिया नहीं देखी जाती
दिल की धड़कन को भी बीनाई बनाकर देखो।

पत्थरों में भी ज़ुबाँ होती है दिल होते हैं
अपने घर के दर-ओ-दीवार सजाकर देखो।

वो सितारा है चमकने दो यूँही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो।

फ़ासिला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
चाँद जब चमके ज़रा हाथ बढ़ा कर देखो।

हर नए मोड़ पर कुछ लोग बिछड़ जाते हैं

कच्चे बखिए की तरह रिश्ते उधड़ जाते हैं
हर नए मोड़ पर कुछ लोग बिछड़ जाते हैं।

यूँ हुआ दूरियाँ कम करने लगे थे दोनों
रोज़ चलने से तो रस्ते भी उखड़ जाते हैं।

छाँव में रख के ही पूजा करो ये मोम के बुत
धूप में अच्छे भले नक़्श बिगड़ जाते हैं।

भीड़ से कट के न बैठा करो तन्हाई में
बेख़्याली में कई शहर उजड़ जाते हैं।

दिल मिले या न मिले हाथ मिलाए रहिए

बात कम कीजे ज़ेहानत को छुपाए रहिए
अजनबी शहर है ये, दोस्त बनाए रहिए

दुश्मनी लाख सही, ख़त्म न कीजे रिश्ता
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाए रहिए

ये तो चेहरे की शबाहत हुई तक़दीर नहीं
इस पे कुछ रंग अभी और चढ़ाए रहिए

ग़म है आवारा अकेले में भटक जाता है
जिस जगह रहिए वहाँ मिलते मिलाते रहिए

कोई आवाज़ तो जंगल में दिखाए रस्ता
अपने घर के दर-ओ-दीवार सजाए रहिए

तुमने कितनी निर्दयता की !

तुमने कितनी निर्दयता की !

सम्मुख फैला कर मधु-सागर,

मानस में भर कर प्यास अमर,

मेरी इस कोमल गर्दन पर

रख पत्थर का गुरु भार दिया।

तुमने कितनी निर्दयता की !

अरमान सभी उर के कुचले,

निर्मम कर से छाले मसले,

फिर भी आँसू के घूँघट से

हँसने का ही अधिकार दिया।

तुमने कितनी निर्दयता की !

जग का कटु से कटुतम बन्धन,

बाँधा मेरा तन-मन यौवन,

फिर भी इस छोटे से मन में

निस्सीम प्यार उपहार दिया।

तुमने कितनी निर्दयता की !

कारवां गुज़र गया

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स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़ेखड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पातपात झर गये कि शाख़शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए, छंद हो दफन गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँधुआँ पहन गये,
और हम झुकेझुके, मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूलफूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ जमीन और आसमां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कलीकली कि घुट गयी गलीगली,
और हम लुटेलुटे, वक्त से पिटेपिटे
साँस की शराब का खुमार देखते
कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखरबिखर,
और हम डरेडरे, नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरनचरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन नयन,
पर तभी ज़हर भरी,गाज एक वह गिरी,
पुँछ गया सिंदूर तारतार हुई चूनरी,
और हम अजान से,दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

मज़दूर / सीमाब अकबराबादी

गर्द चेहरे पर, पसीने में जबीं डूबी हई
आँसुओं मे कोहनियों तक आस्तीं डूबी हुई
पीठ पर नाक़ाबिले बरदाश्त इक बारे गिराँ
ज़ोफ़ से लरज़ी हुई सारे बदन की झुर्रियाँ
हड्डियों में तेज़ चलने से चटख़ने की सदा
दर्द में डूबी हुई मजरूह टख़ने की सदा
पाँव मिट्टी की तहों में मैल से चिकटे हुए
एक बदबूदार मैला चीथड़ा बाँधे हुए
जा रहा है जानवर की तरह घबराता हुआ
हाँपता, गिरता,लरज़ता ,ठोकरें खाता हुआ
मुज़महिल बामाँदगी से और फ़ाक़ों से निढाल
चार पैसे की तवक़्क़ोह सारे कुनबे का ख़याल
अपनी ख़िलक़त को गुनाहों की सज़ा समझे हुए
आदमी होने को लानत और बला समझे हुए
इसके दिल तक ज़िन्दगी की रोशनी जती नहीं
भूल कर भी इसके होंठों तक हसीं आती नहीं

मज़रूह: घायल ; मुज़महिल : थका हुआ ; बामाँदगी: दुर्बलता

बुधवार, मार्च 25, 2009

वो लोग बहुत खुश-किस्मत थे / फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

वो लोग बहुत खुश-किस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे

हम जीते जी मसरूफ रहे
कुछ इश्क़ किया, कुछ काम किया
काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा

फिर आखिर तंग आ कर हमने
दोनों को अधूरा छोड दिया