शुक्रवार, फ़रवरी 19, 2010

अनैतिकता के चश्मों को बदलकर देखना होगा

अनैतिकता के चश्मों को बदलकर देखना होगा

गलत राहों पे वो कैसे गई ये सोचना होगा


कहाँ तक याद रखिए —खट्टी, मीठी, कड़वी बातों को

हमें आगत की खतिर भी विगत को भूलना होगा


विरोधी दोस्त भी है, रोज मिलता है, इसी कारण

विरोधी के इरादों को समझना —बूझना होगा


बहुत उन्मुक्त हो कर जिन्दगी जीना भी जोखिम है

नदी की धार को अनुशासनों में बाँधना होगा


लड़ाई में उतर कर, भागना तो का—पुरुषता है,

लड़ाई में उतर कर, जीतना या हारना होगा


मनोविज्ञान की भाषा में अपने मन की गाँठों को

अकेले बंद कमरे में किसी दिन खोलना होगा


बचाना है अगर इस मुल्क की उजली विरसत को

हमें अपनी जड़ों की ओर फिर से लौटना होगा

हवा विपरीत है हम जानते हैं

हवा विपरीत है हम जानते हैं

हवाओं का भी दम—खम जानते हैं !


अगर तुम जानते हो सारी बातें

तो हम भी तुम से कुछ कम जानते हैं !


युवा नदियों के बूढ़े सागरों से

कहाँ होते हैं संगम , जानते हैं !


मुझे वे क्षण नहीं अब याद, लेकिन

वे सारे दृश्य अलबम जानते हैं


धरा पर मौत के सौदागरों को

बहुत अच्छी तरह 'यम' जानते हैं !


कहाँ तक जाएँगे ये क्रांतिकारी

ये हर दल—बल के परचम जानते हैं !


वे अपने बाद, अपने दुश्मनों का

गजल—साहित्य में क्रम जानते हैं !

गुरुवार, फ़रवरी 18, 2010

पहले मन फिर वचन बिक गया

पहले मन फिर वचन बिक गया

व्यक्ति का मूलधन बिक गया


देह के गर्म बाज़ार में

हर कली, हर सुमन बिक गया


रक्षकों को खबर ही नहीं

और चुपके से वन बिक गया


'द्रौपदी' नग्न होने को है

इस सदी का किशन बिक गया


उसका बस एक ही स्वपन था

अंतत: वो स्वपन बिक गया


डगमगाने लगी है तुला

न्याय का संतुलन बिक गया


'सैटेलाइट' के आदेश पर—

इस धरा का गगन बिक गया

अनावश्यक से मुझको प्यार कम है

अनावश्यक से मुझको प्यार कम है

मेरे खेतों में 'खरपतवार' कम है


अभी तुम कल्पना में उड़ रहे हो

तुम्हारा सत्य से व्यवहार कम है


मैं यूँ तो सारी धरती नाप आया

मगर, मेरे लिए संसार कम है


जो ये जोखिम उठाना चाहता है

वो जोखिम के लिए तैयार कम है


सुखी हो तुम इसी कारण सुखी हो

तुम्हारे मन में हाहाकार कम है


वो प्रतिभावान है, ये तो सही है

मगर, ये भी सही है— धार कम है


बहुत ऊँची इमारत मत उठाओ

अभी उसके लिए आधार कम है

कभी जो आया था पल भर को

कभी जो आया था पल भर को 'उड़न—छू' बनकर

आजतक मन में चमकता है वो जुगनू बनकर


कंठ रुँधते ही, बदल जाता है भाषा का स्वरूप

शब्द तब फूटते देखे गए आँसू बनकर


ये प्रजातन्त्र की कुर्सी है उतारो उसको

वो जो आ बैठा है कुर्सी पे स्वयं—भू बनकर


जो भी आता है, भँवर में ही फँसा जाता है

ज़िन्दगी में कोई आता नहीं चप्पू बनकर


ये तो सच है कि किया पिंजरे से आज़ाद मुझे

किंतु 'पर' काट लिए उसने ही ,चाकू बनकर


मैं कोई बैल नहीं हूँ कि जो जोता जाऊँ

मेरी गर्दन पे न लद पाओगे कोल्हू बनकर


आज तक जिअने भी आशीष दिए हैं माँ ने

तन गए सिर पे सुरक्षाओं के तंबू बनकर

अपनी फुलवारी की सीमा

अपनी फुलवारी की सीमा पार करने के लिए

लोग हैं बेताब खुशबू—से बिखरने के लिए


जो हुआ निर्भय , उसे फिर डर भला किस बात का

वरना साया ही बहुत होता है डरने के लिए


आप 'हरसिंगार' की शाखें हिलाना छोड़िए,

आपकी बातें बहुत हैं फूल झरने के लिए


आजकल महसूस करती है अमन की 'उर्वशी'

एक भी दर्पन नहीं बनने संवरने के लिए


कैमरे में ही ठहर पाता है पल—दो—पल समय

वक्त को फुरसत कहाँ वर्ना ठहरने के लिए

अथक प्रयास के उजले विचार से निकली

अथक प्रयास के उजले विचार से निकली

हमारी जीत, निरंतर जुझार से निकली


हरेक युद्ध किसी संधि पर समाप्त हुआ

अमन की राह हमेशा प्यार से निकली


जो मन का मैल है, उसको तो व्यक्त होना है

हमारी कुण्ठा हजारों प्रकार से निकली


ये अर्थ—शास्त्र भी कहता है, अपनी भाषा में—

नकद की राह हमेशा उधार से निकली


नजर में आने की उद्दंड युक्ति अपनाकर ,

वो चलते—चलते अचानक कतार से निकली


हमारी चादरें छोटी, शरीर लंबे है

हमारे खर्च की सीमा पगार से निकली


ये सोच कर ही तुम्हें रात से गुजरना है

सुहानी भोर सदा अंधकार से निकली

मीठी—मीठी आग से परिचित हुए

मीठी—मीठी आग से परिचित हुए

हम दहन की राग से परिचित हुए


तन से कुछ ज्यादा ही भीगा मन का छोर

तन से मन तक फाग से परिचित हुए


उम्र भर, यायावरी के बाद भी

कितने कम भू—भाग से परिचित हुए


लोग डँस लेते हैं अवसर देखकर

जो स्वयं के नाग से परिचित हए !


भोर होते ही किया चिड़ियों ने शोर

दिन की भागम—भाग से परिचित हुए


हमने गाँधी की तरह पढ़ा जीवन—चरित्र

इस तरह भी त्याग से परिचित हुए


घर के अंदर बैठकर वन में रहे

मानसिक बैराग से परिचित हुए

लिंग निर्धारण समस्या हो गई

‘लिंग निर्धारण’ समस्या हो गई

कोख में ही कत्ल कन्या हो गई


लोग कर पाए नहीं खुल कर विरोध

सिर्फ अखबारों में निन्दा हो गई


चल रहा है माफिया —गुंडों का राज

इस कदर कमजोर सत्ता हो गई !


क्या पता किस वक्त अणुबम फट पड़े

ये हमारे युग की चिन्ता हो गई


साधु—संतों ने मचाया इतना शोर

भंग भक्तों की तपस्या हो गई


राज करने के लिए नेता हुए

वोट देने भर को जनता हो गई


मन में मिसरी की तरह घुलती नही

सिर्फ भाषा—जाल कविता हो गई

हम भी उड़ने लगे हवाओं में

डूबते ही परी— कथाओं में

हम भी उड़ने लगे हवाओं में


अपने तन— मन को बेच देने की

होड़ है, इन दिनों, कलाओं में


आज भी द्रौपदी का चीर —हरण

हो रहा है भरी सभाओं में


जो गुफा में भटक गए थे कहीं

फिर न झाँके कभी गुफाओं में


ढाई आखर के अर्थ मत ढूँढो

चार आखर की कामनाओं में


सिर्फ रोमांच के मजे के लिए

लोग फँसते हैं वर्जनाओं में


मंत्र जैसा प्रभाव होता है

दिल से निकली हुई दुआओं में

वो जब लुट—पिट गया तो ज्ञान आया

वो जब लुट—पिट गया तो ज्ञान आया

निकट संबंधियों का ध्यान आया


उसे मरने से पहले थी ज़रूरत

मरण के बाद लाखों दान आया


पुलिस के सामने मुँह कैसे खोलूँ

मैं अपने ‘दोस्त’ को पहचान आया


वो सबके सामने नंगी खड़ी थी

हुआ ‘शो’ खत्म तो परिधान आया


मेरे भीतर उठा है ज्वार —भाटा

कभी मन में अगर तूफान आया


पचहत्तर फीसदी वे खा गए, तब—

हमारे हाथ में अनुदान आया


तो दोनों को ही इसका लाभ होगा

कला के घर अगर विज्ञान आया

नदी के मस्त धारे जानते हैं

नदी के मस्त धारे जानते हैं

समंदर के इशारे जानते हैं


सहारा कौन दे सकता है उनको

ये अक्सर बेसहारे जानते हैं


धरा से उनकी बेहद दूरियाँ हैं

गगन के चाँद—तारे जानते हैं


किसी बिरहन ने कितनी बार खोले

ये उसके घर के द्वारे जानते हैं


हमारी ख़ूबियों और ख़ामियों को

हमारे दोस्त सारे जानते हैं


चला समवेत स्वर में उनका जादू

ये हर दल—बल के नारे जानते हैं


धरम का अर्थ ‘गुरू’ के बाद केवल

निकटतम ‘पंच—प्यारे’ जानते हैं

अपने कद की लड़ाई लड़ी

अपने कद की लड़ाई लड़ी

एक पर्वत से राई लड़ी


ताड़ बौना बनाया गया

इसलिए बौनसाई लड़ी


डिग्रियों से लड़ी योग्यता

अनुभवों से पढ़ाई लड़ी


स्वस्थ करने के आवेश में

रोग से खुद दवाई लड़ी


जब्त करने की सीमा तलक

आँसुओं से रुलाई लड़ी


चोट जब भी पड़ी स्वार्थ पर

एक ही माँ की जाई लड़ी


सबसे पहले तो दुश्मन से खुद

दुर्ग की एक खाई लड़ी

तुम पर अगर सितारों जड़ा आसमान है

तुम पर अगर सितारों जड़ा आसमान है

अपनी धरा के पास भी हीरों की खान है


ये देखना है— कैसे चलाते हो तीर तुम

हाथों में इस समय तो हमारे कमान है


कड़वा रहा अतीत, अनिश्चित मिला भविष्य

अपना तो मूलधन भी यही वर्तमान है


वे कैसे दौड़ पाएँगे आकाश—मार्ग पर

जिनके ‘परों’ में आज ही कल की थकान है


मेरे ‘बयान’ तुम नहीं जारी करोगे अब

मेरा ‘बयान’ आज से मेरा बयान है


संघर्ष खत्म करने का दो दुश्मनों के पास

क्या संधि के अलावा भी कोई निदान है ?


अब तुम पहँच गए हो शिखर पर, ये सत्य है,

लेकिन शिखर के आगे तो केवल ढलान है

कीट—पतंगे, पशु—पक्षी, आदम

कीट—पतंगे,पशु—पक्षी, आदम भी शामिल रहते हैं

अपनी इस दुनिया में जड़—जंगम भी शामिल रहते हैं


सिर्फ उजालों से धरती का काम नहीं चलने वाला

इसीलिए जगमग जीवन में तम भी शामिल रहते हैं


पहले जिसको कभी नहीं देखा , उसके ही बारे में

चिंतन करते समय अनेकों भ्रम भी शामिल रहते हैं


कई बार, गिरते—गिरते हम गिरने से बच जाते हैं

उस बचाव में, बरसों के संयम भी शामिल रहते हैं


पहले केवल याददाश्त का संबल था, लेकिन, अब तो,

यादें ताजा करने में अलबम भी शामिल रहते हैं

पहले उनके डर समझ में आ गए

पहले उनके डर समझ में आ गए

और फिर कायर समझ में आ गए


लोग जितने भी समझ आए न थे

रोज़ मिल—मिलकर समझ में आ गए


‘ढाई आखर’ तीन होते ही हमें

वासना के स्वर समझ में आ गए


फूल के घर जा रही हैं तितलियाँ

तितलियों के ‘ पर ’ समझ में आ गए


पीठ पीछे से चले थे इसलिए

दोस्तों के शर समझ में आ गए


कैसे नागिन हाथ आएगी नहीं

रूप के मन्तर समझ में आ गए


असली हीरा तो न मिल पाया, मगर

काँच के पत्थर समझ में आ गए

अंतस में दुबकाकर रखना

अंतस में दुबकाकर रखना

लेकिन, आग बचाकर रखना


बीती बातों का क्या रोना

आँसू को भी गाकर रखना


खुद से अनबन मत कर लेना

खुद को दोस्त बनाकर रखना


बस्ती के पागल कुत्तों को

पहले ही हड़का कर रखना


लाख अहसमतियाँ हों, लेकिन

उनसे भी चर्चा कर रखना


मीठी मुस्कानों की खातिर

मन में फूल खिलाकर रखना


जीवन के व्यवहार —मार्ग पर

कुछ सिद्धांत बनाकर रखना

हमेशा द्वंद्व का ठंडा बुखार ठीक नहीं

हमेशा द्वंद्व का ठंडा बुखार ठीक नहीं

मैं सोचता हूँ कि मन में गुबार ठीक नहीं


शिकार करने को जंगल भी कम नहीं होते

खुद अपने घर में ही छिप कर शिकार ठीक नहीं


कभी कुठार को खुद पे चला के देख जरा

हमेशा वृक्षों के तन पर कुठार ठीक नहीं


वे रोज़ रात को सो कर भी सो नहीं पाते

ये स्वप्न नींद के अंदर जगार ठीक नहीं


मैं जूझता हूँ सदा एकमुश्त आँधी से

अनेक किश्तों में आँधी पे वार ठीक नहीं


तुम्हारे बारे में, हम भी तो सोचते होंगे

स्वयं के मुँह से स्वयं का प्रचार ठीक नहीं

लोग अपनी बात के पक्के नहीं रहे

आपस में इसलिए ही भरोसे नहीं रहे

अब लोग अपनी बात के पक्के नहीं रहे


जबसे जुड़ा है शहर से गाँवों का आदमी

गाँवों में रहने वाले भी भोले नहीं रहे


कुछ इस तरह से घास के जंगल हुए सपाट

अब घोंसले बनाने को तिनके नहीं रहे


जिस दिन से राजनीति ने अपना लिया उन्हें

उस दिन से वे भी चोर—उचक्के नहीं रहे


हम एक माँ के जाए थे, लेकिन, ये सत्य है—

जो स्वप्न थे हमारे, वो उनके नहीं रहे


जो लोग आमजन से निकल कर बने थे ‘खास’

अब वे भी आम लोगों के अपने नहीं रहे


कैसे समझ सकोगे समंदर का तुम सुभाव

तुम से किसी समुद्र के रिश्ते नहीं रहे

कुछ इरादे सफल न हो पाए

कुछ इरादे सफल न हो पाए

झोंपड़ी से महल न हो पाए


पाप के पंक में धँसे ऐसे—

चाहकर भी कमल न हो पाए


ऐसे— ऐसे कठिन सवाल मिले

हल किए किन्तु हल न हो पाए


बंद मुठ्ठी में कैद है जुगनू

कैद मुठ्ठी मे पल न हो पाए


मुस्कुराने में फँस गए इतने—

फूल के बाद फल न हो पाए


हमको पत्थर बना के छोड़ दिया

और पत्थर, तरल न हो पाए


जितने चाहे थे अपने जीवन में

उतने रद्दो—बदल न हो पाए

हमारी आपकी यारी से निकले

हमारी आपकी यारी से निकले

कई रस्ते समझदारी से निकले


बहुत कम थे, जो यूँ ही चल पड़े थे,

सफर पर लोग तैयारी से निकले


उन्हीं फूलों को मिल पाती है इज्जत

जो हिम्मत करके फुलवारी से निकले


अजब थे खेल आतिश—बाजियों के

अगन के पेड़ चिंगारी से निकले


जो स्पर्धाओं में पीछे रह गए थे

वो आगे ही ‘कलाकारी’ से निकले


तुम्हारे इस महल के सामने से

बहुत कम लोग खुद्दारी से निकले


जो सच्चे रंग हैं ‘सद्भावना’ के

सदा होली की पिचकारी से निकले

जो अपने डर की सीमा जानते हैं

जो अपने डर की सीमा जानते हैं

वो अपने ‘स्वर’ की सीमा जानते हैं


तुम्हारे पास अवसर है, ये सच है

हम हर अवसर की सीमा जानते हैं


हथौड़े—छैनियों से लैस शिल्पी

अघढ़ पत्थर की सीमा जानते हैं


जिन्हें मालूम है जादू जगाना,

वो हर मन्तर की सीमा जानते हैं


नई पीढ़ी के धीरज के मुताबिक

पिता आदर की सीमा जानते हैं


वो लाँघेंगे नहीं देहरी पराई

जो अपने घर की सीमा जानते हैं


हमें प्रश्नों की हद में सोचना है

हम हर उत्तर की सीमा जानते हैं

खोट सद्भावनाओं में है

खोट सद्भावनाओं में है

कितनी नफरत हवाओं में है


पेड़ से जा लिपटने का दम

प्रेम—पागल लताओं में है


बच रहे हैं जो औलाद से

वो भी ऐसे पिताओं में है


गंध सीमित नहीं फूल तक

गंध चारों दिशाओं में है


व्यक्त होने के पश्चात भी

क्रोध अब तक शिराओं में है


आज तक, मंत्र जैसा असर

मेरी माँ की दुआओं में है


आदमी का तिरस्कार भी

सोची—समझी सजाओं में है

पुण्य करते हुए भी थकते हैं

पुण्य करते हुए भी थकते हैं

जलते—जलते दिये भी थकते हैं


बोलते— बोलते जुबान थकी

गाते—गाते गले भी थकते हैं


हर कदम पर अगर पराजय हो

तो बुलँद हौसले भी थकते हैं


महफिलों, चुटकलों, ठहाकों से

एक दिन, मसखरे भी थकते हैं


चलते—चलते तो थक ही जाते हैं

सोचते—सोचते भी थकते हैं


मंजिलों तक जो ले गए हमको

वे सभी रास्ते भी थकते हैं


अंत में लोग अपने जीवन से

जूझते— जूझते भी थकते हैं.

अनुभवी होने का मतलब नहीं ज्ञानी होना

ज़िन्दगी है तो ज़रूरी है कहानी होना

वो कहानी भी हमें याद जुबानी होना


वे जो सागर से चुराते हैं, उसे भी देखो

सिर्फ तुम देख सके मेघों का दानी होना !


रात भी होगी सुहानी, ये जरूरी तो नहीं

तुमने देखा है अभी शाम सुहानी होना


वो नदी है, उसे बहने में मज़ा आता है

उसको भाता नहीं, ठहरा हुआ पानी होना


तुमने फसलों से लगाया है रकम का अंदाज,

तुमने देखा ही नहीं फस्लों का धानी होना


जिसने तकलीफें सहीं, उसको मिले हैं अनुभव,

अनुभवी होने का मतलब नहीं ज्ञानी होना

वो हम नहीं जो हवाओं में घर बनाते

वो हम नहीं जो हवाओं में घर बनाते हैं

मकान, ठोस जगह देखकर बनाते हैं


वे लोग आग लगाने से पूर्व चुपके से

शहर के लोगों में दंगों का डर बनाते हैं


शिखर—पुरुष तो जनम से कोई नहीं होता

शिखर—पुरुष के लिए, हम शिखर बनाते हैं


शहर मिटा के बनाए हों गाँव, याद नहीं

ये लोग गाँव मिटा के शहर बनाते हैं


नज़र के चश्में परस्पर ये बात करते हैं—

तमाम लोगों की हम भी नज़र बनाते हैं !

मैंने चाहा— बात करे वो फुलवारी की भाषा में

मैंने चाहा— बात करे वो फुलवारी की भाषा में

वो बातें करती है, लेकिन, चिंगारी की भाषा में


यह कहना भी सत्य नहीं दो सच्चे दोस्त नहीं लड़ते

हम भी लड़ते—भिड़ते रहते हैं यारी की भाषा में


दरबारी लोगों ने अपने स्वाभिमान को बेच दिया

वे क्या बात करेंगे तन कर खुद्दारी की भाषा में


आँखों पर पट्टी बाँधे जो सच को देखा करते है

वे उत्तर देते हैं अक्सर ‘गाँधारी’ की भाषा में


चाहे नन्हा बच्चा मुँह से बोल नहीं पाए, लेकिन,

घर भर से बातें करता है किलकारी की भाषा में


एक विनय के साथ प्रशंसा का भी भाव उभरता है

शब्दों से लेकर आँखों तक आभारी की भाषा में


लोग सामने से आकर अब खुल कर बात नहीं करते

चुपके—चुपके काटा करते हैं आरी की भाषा में

तमाम जुल्मों को सहने के बाद होता है

तमाम जुल्मों को सहने के बाद होता है

निबल का जब भी सबल से विवाद होता है


तो सबसे पहले हुआ औरतों का चीर—हरण

शहर या गाँव में जब भी फसाद होता है


ये पूछना ही गलत है कि किसने याद किया

अमर वही है जो मर कर भी याद होता है


मैं कैसे जीत के लाऊँगा कोई ‘खेल—पदक’

मैं खेलता हूँ तो घर में विषाद होता है


इसीलिए ही चखा होगा बाबा आदम ने

निषिद्ध फल का अलग अपना स्वाद होता है

दु:ख का मनोविज्ञान छुपाना मुश्किल है

दु:ख का मनोविज्ञान छुपाना मुश्किल है

सागर में तूफान छुपाना मुश्किल है


आप छिपा भी लें मन के कौतुहल को

होंठों की मुस्कान छुपाना मुश्किल है


शब्दों का संयम धोखा दे सकता है

मुश्किल है अज्ञान छुपाना मुश्किल है


जादूगर से कह दो जान गए दुश्मन

अब तोते में जान छुपाना मुश्किल है


परिधानों से काया तो छुप सकती है

काया से परिधान छुपाना मुश्किल है


बगिया की सीमा के अंदर खुश्बू का

उड़ता हुआ विमान छुपाना मुश्किल है


अभिमानी कब तक गूँगा रह सकता है,

आजीवन अभिमान छुपाना मुश्किल है

डबडबाए नयन का पता चल गया

डबडबाए नयन का पता चल गया

बदलियों से गगन का पता चल गया


लाख कोई छिपाने की कोशिश करे

हाव—भावों से मन का पता चल गया


एक मीठी नदी ज्यों ही खारी हुई

उसको अपने ‘चयन’ का पता चल गया


अवसरों के निकष से गुज़रते हुए

खुद—ब—खुद मन—वचन का पता चल गया


वो ही रस्सी पे दौड़ेगा नट की तरह

जिसको निज संतुलन का पता चल गया


उम्र के मोड़ पर साठ के बाद में

सबको अपनी थकन का पता चल गया


अपने शे’रों से दुनिया बदलते हुए

शायरी के मिशन का पता चल गया !

पिता के घर से पीहर की दिशा में

पिता के घर से पीहर की दिशा में

चली नदिया समंदर की दिशा में


पतंगे कट के गिरती हैं धरा पर

मगर, उड़ती हैं अंबर की दिशा में


अँधेरे खुद कभी आते नहीं हैं

हमारे रौशनी —घर की दिशा में


हुए वृक्षों के वे ही पात पीले

जो थे तैयार पतझर की दिशा में


तुम्हारे द्वंद्व बढ़ते जा रहे हैं

किसी पागल बवंडर की दिशा में


हुई बरसात तो झुग्गी ने सोचा

अचानक अपने छप्पर की दिशा में


जो ‘सत्यम’ है, ‘शिवम’ है जिन्दगी में

वो जाएगा ही सुंदर की दिशा में

आँखों से सिर्फ सच नहीं, सपना भी देखिए

आँखों से सिर्फ सच नहीं, सपना भी देखिए

कलियों का रूप—रंग महकना भी देखिए


सब लोग ही पराए हैं, ये बात सच नहीं

दुनिया की भीड़ में कोई अपना भी देखिए


नदियों को सिर्फ पानी ही पानी न मानिए

नदियों का गीत गाना थिरकना भी देखिए


बरखा की स्याह रात में उम्मीद की तरह

निर्भीक जुगनुओं का चमकना भी देखिए


पत्थर का दिल पसीजते देखा न हो अगर

तो बर्फ की शिलाओं का गलना भी देखिए


जो चुभ रहे हैं —शूल हैं,ये अर्द्ध—सत्य है

इन नर्म—नर्म फूलों का चुभना भी देखिए

सत्य ही जब कहानी लगे

सत्य ही जब कहानी लगे

तब तो गूँगा भी ज्ञानी लगे


आज के लोक—व्यवहार में

कुछ अधिक सावधानी लगे


काले पैसे को दिल खोल कर

देने वाला ही ‘दानी’ लगे


उस जगह नाग भी आएँगे

जिस जगह रातरानी लगे


कुछ तो संयम से उपयोग कर

तन की चादर पुरानी लगे


प्यास बुझती नही ओस से

प्यास को सिर्फ पानी लगे


राजनैतिक हुई इसलिए

व्यर्थ संतों की बानी लगे

पीठ पीछे से हुए वार से डर लगता है

पीठ पीछे से हुए वार से डर लगता है

मुझको हर दोस्त से,हर यार से डर लगता है


चाहे पत्नी करे या प्रेमिका अथवा गणिका,

प्यार की शैली में, व्यापार से डर लगता है


संविधानों की भी रक्षा नहीं कर पाई जो

मूक दर्शक बनी सरकार से डर लगता है


इस महानगरी में करना पड़े कब और कहाँ

व्यस्तताओं भरे अभिसार से डर लगता है


कोई तलवार कभी काट न पाई जिसको

वक्त की नदिया की उस धार से डर लगता है


एक झटके में चुका दे जो समूची कीमत

रूप को ऐसे खरीदार से डर लगता है


हम चमत्कारों में विश्वास तो करते हैं, मगर

हम गरीबों को चमत्कार से डर लगता है

घर में रहकर ही नहीं संवाद हम दोनों के बीच

घर में रहकर भी नहीं संवाद हम दोनों के बीच

मौन पसरा है कई हफ्तों से, संबंधों के बीच


फँस गई है बीच में बत्तीस दाँतों के जुबान

फिर भी, चुप रहती नहीं है, जान के खतरों के बीच


सोचता हूँ कोई गुस्सा क्यों जनम लेता नहीं

मुख्य—धारा से अलग होते हुए लोगों के बीच


दिल पे रख कर हाथ , अपनी धड़कनें सुनते रहें

ये जरूरी है बहुत, जीते हुए यंत्रों के बीच


हम इसी कारण, विगत के गाँव तक जाते नहीं

गाँव में घुसते ही ,फँस जाते हैं हम यादों के बीच


बिजलियाँ भी दर्ज करती ही रहीं अपना विरोध,

छेड़खानी पर तुले मेघों के हुड़दंगों के बीच


शेर समकालीन कविता—से न बातूने सही

फिर भी, कह जाते हैं गहरी बात, संकेतों के बीच

आँसुओं की धार को बन्दी बना लेते हैं लोग

आँसुओं की धार को बन्दी बना लेते हैं लोग

ये करिश्मा है कि फिर भी मुस्कुरा लेते हैं लोग !


स्वप्न को साकार करने की कला सीखे बिना

आने वाले कल को सपनों में सजा लेते हैं लोग


एक भी अन्याय का करते नहीं तन कर विरोध

खुद को कालीनों की शैली में बिछा लेते हैं लोग


चाल चलने से अगर हो ‘मात’ की संभावना

राजनैतिक दुश्मनों से भी निभा लेते हैं लोग


आज ये फल चख लिया, कल दूसरा फल चख लिया,

अपनी इस आवारगी का भी मजा लेते हैं लोग


इस तरह अपराध करते हैं कि गायब हो गवाह

न्याय घर में शक का पूरा फायदा लेते हैं लोग

जो पेड़ मेरे पिता ने कभी लगाया था

जो पेड़, मेरे पिता ने कभी लगाया था

पिता के बाद पिता— सा ही उसका साया था


ये दर्पणों के अलावा न कोई देख सका

स्वयं सँवरते हुए रूप कब लजाया था


गगन है मन में मेरे, ये गगन को क्या मालूम

ये प्रश्न, झील की आँखों में झिलमिलाया था


तुम्हारा गीत, तुम्हारा नहीं रहा अब तो

तुम्हारा गीत, करोड़ों स्वरों ने गाया था


मुझे वो लगने लगा अंगरक्षकों की तरह

जो हर समय मेरी परछाईं में समाया था


इसीलिए मैं गुलाबों की कद्र करता हूँ

गुलाब, काँटों में घिर कर भी मुस्कुराया था

होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी

होती है तेरे नाम से वहशत कभी-कभी
बरहम हुई है यूँ भी तबीयत कभी-कभी

ऐ दिल किसे नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िन्दगी में ये राहत कभी-कभी

तेरे करम से ऐ अलम-ए-हुस्न-ए-आफ़रीन
दिल बन गया है दोस्त की ख़िल्वत कभी-कभी

दिल को कहाँ नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िन्दगी में ये राहत कभी-कभी

जोश-ए-जुनूँ में दर्द की तुग़यानियों के साथ
अश्कों में ढल गई तेरी सूरत कभी-कभी

तेरे क़रीब रह के भी दिल मुतमईन न था
गुज़री है मुझ पे भी ये क़यामत कभी-कभी

कुछ अपना होश था न तुम्हारा ख़याल था
यूँ भी गुज़र गई शब-ए-फ़ुर्क़त कभी-कभी

ऐ दोस्त हम ने तर्क-ए-मुहब्बत के बावजूद
महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी-कभी

हुस्न को दिल में छुपा कर देखो

हुस्न को दिल में छुपा कर देखो
ध्यान की शमा जला कर देखो



क्या खबर कोई दफीना मिल जाये
कोई दीवार गिरा कर देखो



फाख्ता चुप है बड़ी देर से क्यूँ
सरो की शाख हिला कर देखो



नहर क्यूँ सो गई चलते-चलते
कोई पत्थर ही गिरा कर देखो



दिल में बेताब हैं क्या-क्या मंज़र
कभी इस शहर में आ कर देखो



इन अंधेरों में किरन है कोई
शबज़दों आंख उठाकर देखो

सफ़र-ए-मन्ज़िल-ए-शब याद नहीं

सफ़र-ए-मन्ज़िल-ए-शब याद नहीं
लोग रुख़्सत हुये कब याद नहीं

दिल में हर वक़्त चुभन रहती थी
थी मुझे किस की तलब याद नहीं

वो सितारा थी के शबनम थी के फूल
इक सूरत थी अजब याद नहीं

ऐसा उलझा हूँ ग़म-ए-दुनिया में
एक भी ख़्वाब-ए-तरब याद नहीं

भूलते जाते हैं माज़ी के दयार
याद आयें भी तो सब याद नहीं

ये हक़ीक़त है के अहबाब को हम
याद ही कब थे के अब याद नहीं

याद है सैर-ए-चराग़ाँ "नासिर"
दी के बुझने का सबब याद नहीं

वो साहिलों पे गाने वाले क्या हुए

वो साहिलों पे गाने वाले क्या हुए
वो कश्तियाँ जलाने वाले क्या हुए



वो सुबह आते-आते रह गई कहाँ
जो क़ाफ़िले थे आने वाले क्या हुए



मैं जिन की राह देखता हूँ रात भर
वो रौशनी दिखाने वाले क्या हुए



ये कौन लोग हैं मेरे इधर-उधर
वो दोस्ती निभाने वाले क्या हुए



इमारतें तो जल के राख हो गईं
इमारतें बनाने वाले क्या हुए



ये आप-हम तो बोझ हैं ज़मीन के
ज़मीं का बोझ उठाने वाले क्या हुए

वो दिल नवाज़ है नज़र शनास नहीं

वो दिल नवाज़ है लेकिन नज़र-शनास नहीं
मेरा इलाज मेरे चारागर के पास नहीं



तड़प रहे हैं ज़बाँ पर कई सवाल मगर
मेरे लिये कोई शयान-ए-इल्तमास नहीं



तेरे उजालों में भी दिल काँप-काँप उठता है
मेरे मिज़ाज को आसूदगी भी रास नहीं



कभी-कभी जो तेरे क़ुर्ब में गुज़ारे थे
अब उन दिनों का तसव्वुर भी मेरे पास नहीं



गुज़र रहे हैं अजब मर्हलों से दीदा-ओ-दिल
सहर की आस तो है ज़िन्दगी की आस नहीं



मुझे ये डर है तेरी आरज़ू न मिट जाये
बहुत दिनों से तबीयत मेरी उदास नहीं

ये भी क्या शाम-ए-मुलाक़ात आई

ये भी क्या शाम-ए-मुलाक़ात आई
लब पे मुश्किल से तेरी बात आई

सुबह से चुप हैं तेरे हिज्र नसीब
हाय क्या होगा अगर रात आई

बस्तियाँ छोड़ के बरसे बादल
किस क़यामत की ये बरसात आई

कोई जब मिल के हुआ था रुख़सत
दिल-ए-बेताब वही रात आई

साया-ए-ज़ुल्फ़-ए-बुताँ में 'नासिर'
एक से एक नई रात आई

मुसलसल बेकली दिल को रही है

मुसलसल बेकली दिल को रही है
मगर जीने की सूरत तो रही है



मैं क्यूँ फिरता हूँ तन्हा मारा-मारा
ये बस्ती चैन से क्यों सो रही है



चल दिल से उम्मीदों के मुसाफ़िर
ये नगरी आज ख़ाली हो रही है



न समझो तुम इसे शोर-ए-बहाराँ
ख़िज़ाँ पत्तों में छुप के रो रही है



हमारे घर की दीवारों पे "नासिर"
उदासी बाल खोले सो रही है

मुमकिन नहीं मता-ए-सुख़न

मुमकिन नहीं मता-ए-सुख़न मुझ से छीन ले
गो बाग़बाँ ये कंज-ए-चमन मुझ से छीन ले



गर एहतराम-ए-रस्म-ए-वफ़ा है तो ऐ ख़ुदा
ये एहतराम-ए-रस्म-ए-कोहन मुझ से छीन ले



मंज़र दिल-ओ-निगाह के जब हो गये उदास
ये बे-फ़ज़ा इलाक़ा-ओ-तन मुझ से छीन ले



गुलरेज़ मेरी नालाकशी से है शाख़-शाख़
गुलचीँ का बस चले तो ये फ़न मुझ से छीन ले



सींची हैं दिल के ख़ून से मैं ने ये क्यारियाँ
किस की मजाल मेरा चमन मुझ से छीन

फिर सावन रुत की पवन चली

फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आये
फिर पत्तों की पाज़ेब बजी तुम याद आये



फिर कुँजें बोलीं घास के हरे समन्दर में
रुत आई पीले फूलों की तुम याद आये



फिर कागा बोला घर के सूने आँगन में
फिर अम्रत रस की बूँद पड़ी तुम याद आये



पहले तो मैं चीख़ के रोया फिर हँसने लगा
बादल गरजा बिजली चमकी तुम याद आये



दिन भर तो मैं दुनिया के धंधों में खोया रहा
जब दीवारों से धूप ढली तुम याद आये

फिक्र-ए-तामीर-ए-आशियाँ भी है

फिक्र-ए-तामीर-ए-आशियाँ भी है
खौफ-ए-बे माहरी-ए-खिजाँ भी है



खाक भी उड़ रही है रास्तों में
आमद-ए-सुबह-ए-समाँ भी है



रंग भी उड़ रहा है फूलों का
गुंचा-गुंचा सर्द-फसाँ भी है



ओस भी है कहीं-कहीं लरज़ाँ
बज़्म-ए-अंजुमन धुआँ-धुआँ भी है



कुछ तो मौसम भी है ख़याल अंगेज़
कुछ तबियत मेरी रवाँ भी है



कुछ तेरा हुस्न भी है होश-रुबा
कुछ मेरी शौकी-ए-बुताँ भी है



हर नफ्स शौक भी है मंजिल का
हर कदम याद-ए-रफ्तुगाँ भी है



वजह-ए-तस्कीं भी है ख़याल उसका
हद से बढ़ जाये तो गिराँ भी है



ज़िन्दगी जिस के दम से है नासिर
याद उसकी अज़ाब-ए-जाँ भी है

नीयत-ए-शौक़ भर न जाये कहीं

नीयत-ए-शौक़ भर न जाये कहीं
तू भी दिल से उतर न जाये कहीं

आज देखा है तुझे देर के बाद
आज का दिन गुज़र न जाये कहीं

न मिला कर उदास लोगों से
हुस्न तेरा बिखर न जाये कहीं

आरज़ू है के तू यहाँ आये
और फिर उम्र भर न जाये कहीं

जी जलाता हूँ और ये सोचता हूँ
रायेगाँ ये हुनर न जाये कहीं

आओ कुछ देर रो ही लें "नासिर"
फिर ये दरिया उतर न जाये कहीं

कुछ न सुनो तो बेहतर है

"नासिर" क्या कहता फिरता है कुछ न सुनो तो बेहतर है
दीवाना है दीवाने के मुँह न लगो तो बेहतर है

कल जो था वो आज नहीं जो आज है कल मिट जायेगा
रूखी-सूखी जो मिल जाये शुक्र करो तो बेहतर है

कल ये ताब-ओ-तवाँ न रहेगी ठंडा हो जायेगा लहू
नाम-ए-ख़ुदा हो जवाँ अभी कुछ कर गुज़रो तो बेहतर है

क्या जाने क्या रुत बदले हालात का कोई ठीक नहीं
अब के सफ़र में तुम भी हमारे साथ चलो तो बेहतर है

कपड़े बदल कर बाल बना कर कहाँ चले हो किस के लिये
रात बहुत काली है "नासिर" घर में रहो तो बेहतर है

नये कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ

नये कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिये
वो शख़्स तो शहर ही छोड़ गया अब ख़ाक उड़ाऊँ किस के लिये

जिस धूप की दिल को ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई
इन जलती बुझती गलियों में अब ख़ाक उड़ाऊँ किस के लिये

वो शहर में था तो उस के लिये औरों से मिलना पड़ता था
अब ऐसे-वैसे लोगों के मैं नाज़ उठाऊँ किस के लिये

अब शहर में इस का बादल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं
ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुलदान सजाऊँ किस के लिये

मुद्दत से कोई आया न गया सुनसान पड़ी है घर की फ़ज़ा
इन ख़ाली कमरों में "नासिर" अब शम्मा जलाऊँ किस के लिये

दुख की लहर ने छेड़ा होगा

दुख की लहर ने छेड़ा होगा
याद ने कंकड़ फेंका होगा

आज तो मेरा दिल कहता है
तू इस वक़्त अकेला होगा

मेरे चूमे हुए हाथों से
औरों को ख़त लिखता होगा

भीग चलीं अब रात की पलकें
तू अब थक कर सोया होगा

रेल की गहरी सीटी सुन कर
रात का जंगल गूँजा होगा

शहर के ख़ाली स्टेशन पर
कोई मुसाफ़िर उतरा होगा

आँगन में फिर चिड़ियाँ बोलें
तू अब सो कर उठा होगा

यादों की जलती शबनम से
फूल सा मुखड़ा धोया होगा

मोती जैसी शक़्ल बनाकर
आईने को तकता होगा

शाम हुई अब तू भी शायद
आपने घर को लौटा होगा

नीली धुंधली ख़ामोशी में
तारों की धुन सुनता होगा

मेरा साथी शाम का तारा
तुझ से आँख मिलाता होगा

शाम के चलते हाथ ने तुझ को
मेरा सलाम तो भेजा होगा

प्यासी कुर्लाती कून्जूँ ने
मेरा दुख तो सुनाया होगा

मैं तो आज बहुत रोया हूँ
तू भी शायद रोया होगा

"नासिर" तेरा मीत पुराना
तुझ को याद तो आता होगा

दिल में इक लहर सी उठी है अभी

दिल में इक लहर सी उठी है अभी
कोई ताज़ा हवा चली है अभी



शोर बरपा है ख़ाना-ए-दिल में
कोई दीवार सी गिरी है अभी



कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी
और ये चोट भी नई है अभी



भरी दुनिया में जी नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमी है अभी



तू शरीक-ए-सुख़न नहीं है तो क्या
हम-सुख़न तेरी ख़ामोशी है अभी



याद के बे-निशाँ जज़ीरों से
तेरी आवाज़ आ रही है अभी



शहर की बेचिराग़ गलियों में
ज़िन्दगी तुझ को ढूँढती है अभी



सो गये लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी



तुम तो यारो अभी से उठ बैठे
शहर में रात जागती है अभी



वक़्त अच्छा भी आयेगा 'नासिर'
ग़म न कर ज़िन्दगी पड़ी है अभी

दिल धड़कने का सबब याद आया

दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी अब याद आया

आज मुश्किल था सम्भलना ऐ दोस्त
तू मुसीबत में अजब याद आया

दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से
फिर तेरा वादा-ए-शब याद आया

तेरा भूला हुआ पैमान-ए-वफ़ा
मर रहेंगे अगर अब याद आया

फिर कई लोग नज़र से गुज़रे
फिर कोई शहर-ए-तरब याद आया

हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़सत हुए तब याद आया

बैठ कर साया-ए-गुल में "नासिर"
हम बहुत रोये वो जब याद आया

दयार-ए-दिल की रात में

दयार-ए-दिल की रात में चिराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक़्ल तो दिखा गया



जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिये
तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया



ये सुबह की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ
अब आईने में देख़ता हूँ मैं कहाँ चला गया



पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहाँ गई वो सोहबतें
ज़मीं निगल गई उन्हें या आसमान खा गया



वो दोस्ती तो ख़ैर अब नसीब-ए-दुश्मनाँ हुई
वो छोटी-छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया



ये किस ख़ुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई
वो लहर किस तरफ़ गई ये मैं कहाँ समा गया



गये दिनों की लाश पर पड़े रहोगे कब तलक
उठो अमलकशो उठो कि आफ़ताब सर पे आ गया

तेरे मिलने को बेकल हो गये हैं

तेरे मिलने को बेकल हो गये हैं
मगर ये लोग पागल हो गये हैं

बहारें लेके आये थे जहाँ तुम
वो घर सुनसान जंगल हो गये हैं

यहाँ तक बढ़ गये आलाम-ए-हस्ती
कि दिल के हौसले शल हो गये हैं

कहाँ तक ताब लाये नातवाँ दिल
कि सदमे अब मुसलसल हो गये हैं

निगाह-ए-यास को नींद आ रही है
मुसर्दा पुरअश्क बोझल हो गये हैं

उन्हें सदियों न भूलेगा ज़माना
यहाँ जो हादसे कल हो गये हैं

जिन्हें हम देख कर जीते थे "नासिर"
वो लोग आँखों से ओझल हो गये हैं

तेरे ख़याल से लौ दे उठी है तनहाई

तेरे ख़याल से लौ दे उठी है तनहाई
शब-ए-फ़िराक़ है या तेरी जल्वाआराई



तू किस ख़याल में है ऐ मंज़िलों के शादाई
उन्हें भी देख जिन्हें रास्ते में नींद आई



पुकार ऐ जरस-ए-कारवाँ-ए-सुबह-ए-तरब
भटक रहे हैं अँधेरों में तेरे सौदाई



राह-ए-हयात में कुछ मर्हले तो देख लिये
ये और बात तेरी आरज़ू न रास आई



ये सानिहा भी मुहब्बत में बारहा गुज़रा
कि उस ने हाल भी पूछा तो आँख भर आई



फिर उस की याद में दिल बेक़रार है "नासिर"
बिछड़ के जिस से हुई शहर-शहर रुसवाई

तू है या तेरा साया है

तू है या तेरा साया है
भेस जुदाई ने बदला है



दिल की हवेली पर मुद्दत से
ख़ामोशी का क़ुफ़्ल पड़ा है



चीख़ रहे हैं ख़ाली कमरे
शाम से कितनी तेज़ हवा है



दरवाज़े सर फोड़ रहे हैं
कौन इस घर को छोड़ गया है



हिचकी थमती ही नहीं 'नासिर'
आज किसी ने याद किया है

थोड़ा ग़म भी उठा प्यारे

तन्हा इश्क के ख़्वाब न बुन
कभी हमारी बात भी सुन



थोड़ा ग़म भी उठा प्यारे
फूल चुने हैं ख़ार भी चुन



सुख़ की नींदें सोने वाले
मरहूमी के राग भी सुन



तन्हाई में तेरी याद
जैसे एक सुरीली धुन



जैसे चाँद की ठंडी लौ
जैसे किरणों कि कन मन



जैसे जल-परियों का ताज
जैसे पायल की छन छन

ज़िन्दगी को न बना दें वो सज़ा मेरे बाद

ज़िन्दगी को न बना दें वो सज़ा मेरे बाद
हौसला देना उन्हें मेरे ख़ुदा मेरे बाद

कौन घूंघट उठाएगा सितमगर कह के
और फिर किस से करेंगे वो हया मेरे बाद

हाथ उठते हुए उनके न देखेगा
किस के आने की करेंगे वो दुआ मेरे बाद

फिर ज़माना-ए-मुहब्बत की न पुरसिश होगी
रोएगी सिसकियाँ ले-ले के वफ़ा मेरे बाद

वो जो कहता था कि 'नासिर' के लिए जीता हूं
उसका क्या जानिए, क्या हाल हुआ मेरे बाद

ज़बाँ सुख़न को, सुख़न बाँकपन को तरसेगा

ज़बाँ सुख़न को सुख़न बाँकपन को तरसेगा
सुख़नकदा मेरी तर्ज़-ए-सुख़न को तरसेगा

नये प्याले सही तेरे दौर में साक़ी
ये दौर मेरी शराब-ए-कोहन को तरसेगा

मुझे तो ख़ैर वतन छोड़ के अमन न मिली
वतन भी मुझ से ग़रीब-उल-वतन को तरसेगा

उन्हीं के दम से फ़रोज़ाँ हैं मिल्लतों के चराग़
ज़माना सोहबत-ए-अरबाब-ए-फ़न को तरसेगा

बदल सको तो बदल दो ये बाग़बाँ वरना
ये बाग़ साया-ए-सर्द-ओ-समन को तरसेगा

हवा-ए-ज़ुल्म यही है तो देखना एक दिन
ज़मीं पानी को सूरज किरन को तरसेगा

गिरिफ़्ता-दिल हैं बहुत

गिरिफ़्ता-दिल हैं बहुत आज तेरे दीवाने
ख़ुदा करे कोई तेरे सिवा न पहचाने



मिटी-मिटी सी उम्मीदें थके-थके से ख़याल
बुझे-बुझे से निगाहों में ग़म के अफ़साने



हज़ार शुक्र के हम ने ज़ुबाँ से कुछ न कहा
ये और बात के पूछा न अहल-ए-दुनिया ने



बक़द्र-ए-तश्नालबी पुर्सिश-ए-वफ़ा न हुई
छलक के रह गये तेरी नज़र के पैमाने



ख़याल आ गया मायूस रहगुज़ारों का
पलट के आ गये मंज़िल से तेरे दीवाने



कहाँ है तू के तेरे इंतज़ार में ऐ दोस्त
तमाम रात सुलगते रहे दिल के वीराने



उम्मीद-ए-पुर्सिश-ए-ग़म किस से कीजिये "नासिर"
जो मेरे दिल पे गुज़रती है कोई क्या जाने

गये दिनों का सुराग़ लेकर

गये दिनों का सुराग़ लेकर किधर से आया किधर गया वो
अजीब मानूस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो



ख़ुशी की रुत हो के ग़म का मौसम नज़र उसे ढूँढती है हर दम
वो बू-ए-गुल था के नग़्मा-ए-जान मेरे तो दिल में उतर गया वो



वो मयकदे को जगानेवाला वो रात की नींद उड़ानेवाला
न जाने क्या उस के जी में आई कि शाम होते ही घर गया वो



कुछ अब संभलने लगी है जाँ भी बदल चला रंग-ए-आस्माँ भी
जो रात भारी थी टल गई है जो दिन कड़ा था गुज़र गया वो



शिकस्त पा राह में खड़ा हूँ गये दिनों को बुला रहा हूँ
जो क़ाफ़िला मेरा हमसफ़र था मिस्ल-ए-गर्द-ए-सफ़र गया वो



बस एक मंज़िल है बुलहवस की हज़ार रास्ते हैं अहल-ए-दिल के
ये ही तो है फ़र्क़ मुझ में उस में गुज़र गया मैं ठहर गया वो



वो जिस के शाने पे हाथ रख कर सफ़र किया तूने मंज़िलों का
तेरी गली से न जाने क्यूँ आज सर झुकाये गुज़र गया वो



वो हिज्र कि रात का सितारा वो हमनफ़स हमसुख़न हमारा
सदा रहे उस का नाम प्यारा सुना है कल रात मर गया वो



बस एक मोती सी छब दिखाकर बस एक मीठी सी धुन सुना कर
सितारा-ए-शाम बन के आया बरंग-ए-ख़याल-ए-सहर गया वो



न अब वो यादों का चढ़ता दरिया न फ़ुर्सतों की उदास बरखा
यूँ ही ज़रा सी कसक है दिल में जो ज़ख़्म गहरा था भर गया वो



वो रात का बेनवा मुसाफ़िर वो तेरा शायर वो तेरा "नासिर"
तेरी गली तक तो हम ने देखा फिर न जाने किधर गया वो

कौन इस राह से गुज़रता है

कौन इस राह से गुज़रता है
दिल यूँ ही इंतज़ार करता है

देख कर भी न देखने वाले
दिल तुझे देख-देख डरता है

शहर-ए-गुल में कटी है सारी रात
देखिये दिन कहाँ गुज़रता है

ध्यान की सीढ़ियों पे पिछले पहर
कोई चुपके से पाँव धरता है

दिल तो मेरा उदास है "नासिर"
शहर क्यों सायँ-सायँ करता है

कुछ यादगार-ए-शहर-ए-सितमगर ही ले चलें

कुछ यादगार-ए-शहर-ए-सितमगर ही ले चलें
आये हैं इस गली में तो पत्थर ही ले चलें



यूँ किस तरह कटेगा कड़ी धूप का सफ़र
सर पर ख़याल-ए-यार की चादर ही ले चलें



रंज-ए-सफ़र की कोई निशानी तो पास हो
थोड़ी सी ख़ाक-ए-कूचा-ए-दिलबर ही ले चलें



ये कह के छेड़ती है हमें दिलगिरफ़्तगी
घबरा गये हैं आप तो बाहर ही ले चलें



इस शहर-ए-बेचराग़ में जायेगी तू कहाँ
आ ऐ शब-ए-फ़िराक़ तुझे घर ही ले चलें

कुछ तो एहसास-ए-ज़ियाँ था पहले

कुछ तो एहसास-ए-ज़ियाँ था पहले
दिल का ये हाल कहाँ था पहले

अब तो मन्ज़िल भी है ख़ुद गर्म-ए-सफ़र
हर क़दम संग-ए-निशाँ था पहले

सफ़र-ए-शौक़ के फ़रसंग न पूछ
वक़्त बेक़ैद-ए-मकाँ था पहले

ये अलग बात कि ग़म रास है अब
इस में अंदेशा-ए-जाँ था पहले

यूँ न घबराये हुये फिरते थे
दिल अजब कुंज-ए-अमाँ था पहले

अब भी तू पास नहीं है लेकिन
इस क़दर दूर कहाँ था पहले

डेरे डाले हैं बगुलों ने जहाँ
उस तरफ़ चश्म-ए-रवाँ था पहले

अब वो दरिया न बस्ती न वो लोग
क्या ख़बर कौन कहाँ था पहले

हर ख़राबा ये सदा देता है
मैं भी आबाद मकाँ था पहले

क्या से क्या हो गई दुनिया प्यारे
तू वहीं पर है जहाँ था पहले

हम ने आबाद किया मुल्क-ए-सुख़न
कैसा सुनसान समाँ था पहले

हम ने बख़्शी है ख़मोशी को ज़ुबाँ
दर्द मजबूर-ए-फ़ुग़ाँ था पहले

हम ने रोशन किया मामूर-ए-ग़म
वरना हर सिम्त धुआँ था पहले

ग़म ने फिर दिल को जगाया "नासिर"
ख़ानाबरबाद कहाँ था पहले

किसे देखें कहाँ देखा न जाये

किसे देखें कहाँ देखा न जाये
वो देखा है जहाँ देखा न जाये

मेरी बरबादियों पर रोने वाले
तुझे महव-ए-फुगाँ देखा न जाये

सफ़र है और गुरबत का सफ़र है
गम-ए-सद-कारवाँ देखा न जाये

कहीं आग और कहीं लाशों के अंबार
बस ऐ दौर-ए-ज़मीँ देखा न जाये

दर-ओ-दीवार वीराँ, शमा मद्धम
शब-ओ-गम का सामाँ देखा न जाये

पुरानी सुहब्बतें याद आती है
चरागों का धुआँ देखा न जाये

भरी बरसात खाली जा रही है
सराबर-ए-रवाँ देखा न जाये

कहीं तुम और कहीं हम, क्या गज़ब है
फिराक-ए-जिस्म-ओ-जाँ देखा न जाये

वही जो हासिल-ए-हस्ती है नासिर
उसी को मेहरबाँ देखा न जाये

किसी कली ने भी देखा न

किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे
गुज़र गई जरस-ए-गुल उदास कर के मुझे

मैं सो रहा था किसी याद के शबिस्ताँ में
जगा के छोड़ गये क़ाफ़िले सहर के मुझे

मैं रो रहा था मुक़द्दर की सख़्त राहों में
उड़ा के ले गया जादू तेरी नज़र का मुझे

मैं तेरी दर्द की तुग़ियानियों में डूब गया
पुकारते रहे तारे उभर-उभर के मुझे

तेरे फ़िराक़ की रातें कभी न भूलेंगी
मज़े मिले इन्हीं रातों में उम्र भर के मुझे

ज़रा सी देर ठहरने दे ऐ ग़म-ए-दुनिया
बुला रहा है कोई बाम से उतर के मुझे

फिर आज आई थी इक मौज-ए-हवा-ए-तरब
सुना गई है फ़साने इधर-उधर के मुझे

कितना काम करेंगे

कितना काम करेंगे
अब आराम करेंगे



तेरे दिये हुए दुख
तेरे नाम करेंगे



अहल-ए-दर्द ही आख़िर
ख़ुशियाँ आम करेंगे



कौन बचा है जिसे वो
ज़ेर-ए-दाम करेंगे



नौकरी छोड़ के "नासिर"
अपना काम करेंगे

करता उसे बेकरार कुछ देर

करता उसे बेकरार कुछ देर
होता अगर इख्तियार कुछ देर



क्या रोयें फ़रेब-ए-आसमाँ को
अपना नहीं ऐतबार कुछ देर



आँखों में कटी पहाड़ सी रात
सो जा दिल-ए-बेक़रार कुछ देर



ऐ शहर-ए-तरब को जाने वालों
करना मेरा इंतजार कुछ देर



बेकैफी-ए-रोज़-ओ-शब मुसलसल
सरमस्ती-ए-इंतज़ार कुछ देर



तकलीफ-ए-गम-ए-फिराक दायम
तकरीब-ए-विसाल-ए-यार कुछ देर



ये गुंचा-ओ-गुल हैं सब मुसाफिर
है काफिला-ए-बहार कुछ देर



दुनिया तो सदा रहेगी नासिर
हम लोग हैं यादगार कुछ देर

आराइश-ए-ख़याल भी हो

आराइश-ए-ख़याल भी हो दिलकुशा भी हो
वो दर्द अब कहाँ जिसे जी चाहता भी हो



ये क्या के रोज़ एक सा ग़म एक सी उम्मीद
इस रंज-ए-बेख़ुमार की अब इंतहा भी हो



ये क्या के एक तौर से गुज़रे तमाम उम्र
जी चाहता है अब कोई तेरे सिवा भी हो



टूटे कभी तो ख़्वाब-ए-शब-ओ-रोज़ का तिलिस्म
इतने हुजूम में कोई चेहरा नया भी हो



दीवानगी-ए-शौक़ को ये धुन है इन दिनों
घर भी हो और बे-दर-ओ-दीवार सा भी हो



जुज़ दिल कोई मकान नहीं दहर में जहाँ
रहज़न का ख़ौफ़ भी न रहे दर खुला भी हो



हर ज़र्रा एक महमील-ए-इब्रत है दश्त का
लेकिन किसे दिखाऊँ कोई देखता भी हो



हर शय पुकारती है पस-ए-पर्दा-ए-सुकूत
लेकिन किसे सुनाऊँ कोई हमनवा भी हो



फ़ुर्सत में सुन शगुफ़्तगी-ए-ग़ुंचा की सदा
ये वो सुख़न नहीं जो किसी ने कहा भी हो



बैठा है एक शख़्स मेरे पास देर से
कोई भला-सा हो तो हमें देखता भी हो



बज़्म-ए-सुख़न भी हो सुख़न-ए-गर्म के लिये
ताऊस बोलता हो तो जंगल हरा भी हो

आज तो बेसबब उदास है जी

आज तो बेसबब उदास है जी
इश्क़ होता तो कोई बात भी थी



जलता फिरता हूँ क्यूँ दो-पहरों में
जाने क्या चीज़ खो गई मेरी



वहीं फिरता हूँ मैं भी ख़ाक बसर
इस भरे शहर में है एक गली



छुपता फिरता है इश्क़ दुनिया से
फैलती जा रही है रुसवाई



हमनशीं क्या कहूँ के वो क्या है
छोड़ ये बात नींद उड़ने लगी



आज तो वो भी कुछ ख़ामोश सा था
मैं ने भी उस से कोई बात न की



एक दम उस के हाथ चूम लिये
ये मुझे बैठे-बैठे क्या सूझी



तू जो इतना उदास है "नासिर"
तुझे क्या हो गया बता तो सही

अपनी धुन में रहता हूँ

अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ



ओ पिछली रुत के साथी
अब के बरस मैं तन्हा हूँ



तेरी गली में सारा दिन
दुख के कंकर चुनता हूँ



मुझ से आँख मिलाये कौन
मैं तेरा आईना हूँ



मेरा दिया जलाये कौन
मैं तेरा ख़ाली कमरा हूँ



तू जीवन की भरी गली
मैं जंगल का रस्ता हूँ



अपनी लहर है अपना रोग
दरिया हूँ और प्यासा हूँ



आती रुत मुझे रोयेगी
जाती रुत का झोंका हूँ

रौनकें थीं जहाँ में क्या-क्या कुछ

रौनकें थीं जहाँ में क्या-क्या कुछ
लोग थे रफ़्तगाँ में क्या-क्या कुछ



अबकी फ़स्ल-ए-बहार से पहले
रंग थे गुलसिताँ में क्या-क्या कुछ



क्या कहूँ अब तुम्हें खिज़ाँ वालो
जल गया आशियाँ में क्या-क्या कुछ



दिल तिरे बाद सो गया वरना
शोर था इस मकाँ में क्या-क्या कुछ

क़हर से देख न हर आन मुझे

क़हर से देख न हर आन मुझे
आँख रखता है तो पहचान मुझे



यकबयक आके दिखा दो झमकी
क्यों फिराते हो परेशान मुझे



एक से एक नयी मंजिल में
लिए फिरता है तिरा ध्यान मुझे



सुन के आवाज-ए-गुल कुछ न सुना
बस उसी दिन से हुए कान मुझे



जी ठिकाने नहीं जब से ‘नासिर’
शहर लगता है बयाबान मुझे

ख़त्म हुआ तारों का राग

ख़त्म हुआ तारों का राग
जाग मुसाफ़िर अब तो जाग



धूप की जलती तानों से
दश्त-ए-फ़लक1 में लग गई आग



दिन का सुनहरा नग्मा सुनकर
अबलक़-ए-शब2 ने मोड़ी बाग



कलियाँ झुलसी जाती हैं
सूरज फेंक रहा है आग



ये नगरी अँधियारी है
इस नगरी से जल्दी भाग

रंग बरसात ने भरे कुछ तो

रंग बरसात ने भरे कुछ तो
ज़ख़्म दिल के हुए हरे कुछ तो



फुर्सत-ए-बेखुदी1 ग़नीमत है
गर्दिशें हो गयीं परे कुछ तो



कितने शोरीदा-सर2 थे परवाने
शाम होते ही जल मरे कुछ तो



ऐसा मुश्किल नहीं तिरा मिलना
दिल मगर जुस्तजू करे कुछ तो



आओ ‘नासिर’ कोई ग़ज़ल छेड़ें
जी बहल जाएगा अरे कुछ तो

पहुँचे गोर किनारे हम

पहुँचे गोर किनारे हम
बस ग़म-ए-दौराँ हारे हम



सब कुछ हार के रस्ते में
बैठ गए दुखियारे हम



हर मंजिल से गुज़रे हैं
तेरे ग़म के सहारे हम



देख ख़याल-ए-ख़ातिर-ए-दोस्त
बाज़ी जीत के हारे हम



आँख का तारा आँख में है
अब न गिनेंगे तारे हम

आँखों में हैं दुख भरे फ़साने

आँखों में हैं दुख भरे फ़साने
रोने के फिर आ गये ज़माने



फिर दर्द ने आज राग छेड़ा
लौट आये वही समय पुराने



फिर चाँद को ले गयीं हवाएँ
फिर बाँसुरी छेड़ दी सबा ने



रस्तों में उदास खुशबुओं के
फूलों ने लुटा दिये ख़जाने

कौन इस राह से गुज़रता है

कौन इस राह से गुज़रता है
दिल यूँ ही इंतज़ार करता है

देख कर भी न देखने वाले
दिल तुझे देख-देख डरता है

शहर-ए-गुल में कटी है सारी रात
देखिये दिन कहाँ गुज़रता है

ध्यान की सीढ़ियों पे पिछले पहर
कोई चुपके से पाँव धरता है

दिल तो मेरा उदास है "नासिर"
शहर क्यों सायँ-सायँ करता है

जब से देखा है तिरे हाथ का चांद

जब से देखा है तिरे हाथ का चांद
मैंने देखा ही नहीं रात का चांद



जुल्फ़-ए-शबरंग के सद राहों में
मैंने देखा है तिलिस्मात का चांद



रस कहीं, रूप कहीं, रंग कहीं
एक जादू है ख़यालात का चांद

इश्क़ में जीत हुई या मात

इश्क़ में जीत हुई या मात
आज की रात न छेड़ ये बात



यूँ आया वो जान-ए-बहार
जैसे जग में फैले बात



रंग, खुले सहरा2 की धूप
ज़ुल्फ़ घने जंगल की रात



कुछ न सुना और कुछ न कहा
दिल में रह गयी दिल की बात



यार की नगरी कोसों दूर
कैसे कटेगी भारी रात



बस्ती वालों से छुपकर
रो लेते हैं पिछली रात



सन्नाटों में सुनते हैं
सुनी-सुनाई कोई बात

होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी

होती है तेरे नाम से वहशत कभी-कभी
बरहम हुई है यूँ भी तबीयत कभी-कभी

ऐ दिल किसे नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िन्दगी में ये राहत कभी-कभी

तेरे करम से ऐ अलम-ए-हुस्न-ए-आफ़रीन
दिल बन गया है दोस्त की ख़िल्वत कभी-कभी

दिल को कहाँ नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िन्दगी में ये राहत कभी-कभी

जोश-ए-जुनूँ में दर्द की तुग़यानियों के साथ
अश्कों में ढल गई तेरी सूरत कभी-कभी

तेरे क़रीब रह के भी दिल मुतमईन न था
गुज़री है मुझ पे भी ये क़यामत कभी-कभी

कुछ अपना होश था न तुम्हारा ख़याल था
यूँ भी गुज़र गई शब-ए-फ़ुर्क़त कभी-कभी

ऐ दोस्त हम ने तर्क-ए-मुहब्बत के बावजूद
महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी-कभी

शनिवार, दिसंबर 05, 2009

भारत में 'सुपर चाइल्ड यूनिवर्सिटी' सचिन, शाह रुख़, कलाम जैसे बच्चे पैदा करें...

अगर आप चाहते है कि आपका बच्चा सचिन तेंदुलकर जैसा बल्लेबाज बने या शाहरुख़ खान जैसा अभिनेता बने या फिर अब्दुल कलम जैसा जीनियस साइंटिस्ट, तो अब ये सब संभव है| अब आप अपने बच्चों का भविष्य अपने हाथों से लिख सकते है। आप जैसा चाहें वैसा बच्चा पैदा कर सकते हैं| वैसे तो सुनने में ये नामुमकिन लगता है लेकिन गांधीनगर में शुरू हुई super child university के प्रयास ने इस नामुमकिन को मुमकिन करने की ठान ली है|

एक समय था जब माता पिता अपने बच्चों को उत्तम शिक्षा देकर उन्हें कामयाबी के शिखर पर पहुचांने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते थे, लेकिन अब गांधीनगर की एक संस्था नवपरिणित युगलों को जन्म से ही सुपर चाइल्ड देने का वादा कर रही है | पश्चिम में सुप्रजनन शास्त्र ( यूजेनिक्स ) की शुरुआत अठारवीं सदी में हुई थी। भारत में सुप्रजनन के सिद्धांत प्राचीन काल से अस्तित्व में थे | इसकी जानकारी धर्म शास्त्र , काम शास्त्र और आयुर्वेद में मिलती है। भारत में सुप्रजनन शास्त्र को अखंड एवं स्वतंत्र शास्त्र के रूप में आज तक विकसित नहीं किया गया है |
 
ये तो सबको पता है कि अभिमन्यु ने अपनी माता के पेट में ही कृष्ण से ज्ञान ग्रहण किया था और महाभारत के युद्ध के समय अपने मामा से लिए इसी ज्ञान के आधार पर चक्रव्यूह का भेदन किया था | इस बात को हमने सिर्फ कहानी का किस्सा समझा था लेकिन ये सत्य है कि भारत में प्राचीन काल में गर्भ विज्ञान विकसित था। उस समय भारत समग्र विश्व में जगतगुरु के रूप में स्थापित था | लेकिन समय के चलते भारत में सुप्रजनन विद्या विस्मृत हो गयी और आज लगभग सब उसे भुला चुके हैं |

सुप्रजनन वह शास्त्र है , जिस पर यदि संपूर्ण ध्यान दिया जाए तो भारत में पुनः स्वर्णयुग प्रारंभ हो सकता है | इस शास्त्र में इतनी जबरदस्त संभावनाए है कि आगामी बीस सालों में ये समग्र भारत की कायापलट कर सकता है | गांधीनगर स्थित विश्व कल्याण संस्था ने maharshee prahlad super child university की स्थापना कर ऐसा ही एक प्रयास किया है | आज के जमाने में बच्चों को जन्म के बाद ही शिक्षा दी जाती है लेकिन super child university में नवविवाहित जोड़े की शादी के तुंरत बाद ही सुपर चाइल्ड पाने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है | यहां दी जाने वाली ये ट्रेनिंग प्राचीन भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के आधार पर दी जाती है |
 
इस संस्था के शुरू होने से पहेले Charak sahita, Shrushut sahita, Astang Hriday और अन्य Ayurvedic साहित्य और latest genetic science का गहन अध्ययन किया गया है | यहां दी जाने वाली ट्रेनिंग प्राचीन भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के आधार पर दी जाती है। जिससे अगर एक couple चाहे तो एक असाधारण गुणों के साथ कोई बच्चा दुनिया में आ सकता है |  
 
यहां पर नवदम्पतियों को श्रेष्ठ बालक प्राप्त करने के लिए गर्भाधान से पहले ,गर्भाधान के दौरान और संतान प्राप्ति के बाद ऐसे तीन हिस्सों में विशिष्ट पद्धति से प्रशिक्षित किया जाता है | सुपर चाइल्ड के इच्छुक जोडों को संस्था में एक हफ्ते के लिए रहना पड़ता है। पहले उनसे पूछा जाता है कि वो किस तरह का बच्चा चाहते है ,उसके बाद उन्हें आगे बढ़ने के लिए मार्गदर्शन दिया जाता है| एक हफ्ते के दौरान दी गई ट्रेनिंग के मुताबिक घर जाकर प्रैक्टिस करनी पड़ती है | गर्भ रहने के कुछ समय बाद फिर उन्हें यहां एक हफ्ते के लिए बुलाया जाता है और माता के गर्भ में शिशु को किस तरह की शिक्षा देना चाहिए उसकी ट्रेनिंग दी जाती है| ये पता है कि कि गर्भ में शिशु बाहरी दुनिया का ज्ञान लेने के लिए ग्रहणशील होता है और वो अपने आप सीखना शुरू कर देता है, इसलिए यहां पर इन जोडों को गर्भावस्था के दौरान बच्चे को ज्ञान देना जारी रखने के लिए कहा जाता है | बच्चे के जन्म के बाद तय उम्र पर उसके सर्वांगी विकास के लिए classes ली जाती है |
 
साथ ही इस isntitute में Genome Development and Research Centre (GDRC) को भी डेवलप किया जा रहा है जहाँ couples का सुपर चाइल्ड देने के उदेश्य से संशोधन किया जायेगा | यहां पर निर्मित लेटेस्ट जेनेटिक लैब पुरुष बिज तथा स्त्री बिज में निहित अशुद्धियों ,अवगुणों और अपूर्णताओं को दूर कर अतिशुद्ध ,परिशुद्ध पुरुष बिज एवं स्त्री बिज बनाएगी जिससे नव दंपति वैज्ञानिक पद्धति से श्रेष्ठ संतान प्राप्त कर सके | तो दूसरी तरफ नवदम्पतियों के लिए अद्यतन आश्रम का भी निर्माण किया जा रहा है |
 
हर कोई चाहता है की उनका बच्चा सुपर चाइल्ड हो , और यहां पर एक हफ्ते तक ट्रेनिंग ले चुके लोगों को लगता है कि उनका बच्चा सुपर चाइल्ड होगा | हालांकि इस इंस्टिट्यूट के शुरू होने से पहले शायद उन्हें ये संभव नहीं लगता था | यहां उन्हें सिखाया जाता है कि अगर वो एक सुपर चाइल्ड चाहते हैं तो उन्हें दैनिक जीवन में क्या बदलाव लाने होंगे , उन्हें क्या खाना चाहिए , क्या पीना चाहिए, यहाँ तक कि उन्हें क्या सोचना चाहिए|
 
super child university का ये प्रयास अगर सफल रहा तो हो सकता है की अगले कुछ सालों में भारत अमेरिका और जापान से भी आगे निकल जाएगा। हर माता पिता अपनी इच्छा के अनुसार सुपर चाइल्ड को जन्म दे पाएंगे| महाभारत ,रामायण जैसे पौराणिक महाकाव्यों या ऐतिहासिक ग्रंथो और कहानियों में सुने और पढ़े हुए किस्से अब सच बनकर सामने आएंगे। कुंती की तरह अब हर मां अपनी इच्छा के अनुसार एक सुपर चाइल्ड को जन्म दे पाएगी |
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अगर ऐसे ही रहे तो हम नहीं "चोर होंगे कामयाब"

क्या ये मुमकिन है कि कोई आदमी ATM मशीन से पैसे चोरी का ले और किसी को पता तक न चले , शायद किसी भी नजरिये से नहीं, लेकिन इस नामुमकिन काम को अहमदाबाद के एक चोर ने मुमकिन कर दिखाया | उसकी चोरी ने latest technology और सिक्योरिटी के इन्तजाम को chalange किया। स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की ATM से 9 लाख 18 हजार रुपये की चोरी हो गई और बैंक को इसका पता तक नहीं। उस शक्श के बारे में बैंक के पास कोई जानकारी भी नहीं मिली। मिलती भी कैसे ATM में लगा CCTV कैमरा जो छ: महीने से बंद था|चोरी के बारे में तब पता चला जब इस ATM मशीन का बैलेंस शून्य दिखने लगा लेकिन तब तक चोर क्यों रुकता, वो तो कब का फरार हो चुका था| ATM में लगे सिक्योरिटी इन्तजाम से बैंक प्रशासन अक्सर रिलेक्स हो जाता है लेकिन जब सिक्योरिटी सिस्टम बिगड़ गया तो उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया।इसी का फायदा उठाकर हादसों को अंजाम देकर चोर आसानी से फरार हो गया।
 
तहकीकात कर रही पुलिस टीम ने चोरी में STAFFER की मिलीभगत बताया। ATM से पैसे निकालना किसी आम आदमी के लिए मुमकिन नहीं है| अगर कोई मशीन खोल भी ले तो पैसे नहीं निकाल सकता|मशीन में पैसे फीड करने या निकाले जाने का तरीका पूरी तरह से पासवर्ड प्रोटेक्टेड होता है | एक PETICULAR कंपनी को पैसे फीड करने का CONTRACT दिया जाता है। इस कम्पनी के आदमी जब ATM मशीन में पैसे फीड करने जाते है तब उस बैंक के हेड ऑफिस को इस बात की जानकारी रहती है | ATM से सिक्योरिटी कम्पनी का मैनेजर पासवर्ड डालता है और उसके बाद हेड ऑफिस में बैठा हुआ मैनेजर पासवर्ड एंटर करता है। इन दोनों पासवर्ड की मैचिंग से ही मशीन का वो हिस्सा खुलता है जहां पर पैसे रखे जाते है |
 
इस पूरी घटना ने पुलिस और बैंक दोनों को चैलेंज किया है क्योंकि चोरी के समय वहां लोगों की आवाजाही जारी थी। WEEKEND होने की वजह से ज्यादा TRAFFIC भी था| पुलिस का कहना है कि चोरी का सच तो पुलिस जांच और चोर के पकडे जाने के बाद ही पता चल पायेगा लेकिन हकीकत यही है कि अगर हमारी सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासन ऐसे ही काम करता रहा तो हम नहीं "चोर होंगे कामयाब"

बुधवार, नवंबर 25, 2009

भोलाराम का जीव - हरिशंकर परसाई

ऐसा कभी नहीं हुआ था।

धर्मराज लाखों वर्षो से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफारिश के आधार पर स्वर्ग और नरक में निवास-स्थान अलाट करते आ रहे थे। पर ऐसा कभी नहीं हुआ था।

सामने बैठे चित्रगुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर देख रहे थे। गलती पकड में ही नहीं आरही थी। आखिर उन्होंने खीझकर रजिस्टर इतनी ज़ोरों से बन्द किया कि मख्खी चपेट में आगई। उसे निकालते हुए वे बोले, ''महाराज, रिकार्ड सब ठीक है। भोलाराम के जीव ने पांच दिन पहले देह त्यागी और यमदूत के साथ इस लोक के लिए रवाना हुआ, पर अभी तक यहां नहीं पहुंचा।''

धर्मराज ने पूछा, ''और वह दूत कहां है?''

''महाराज, वह भी लापता है।''

इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बडा बदहवास-सा वहां आया। उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत होगया था। उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे, ''अरे तू कहां रहा इतने दिन? भोलाराम का जीव कहां है?''

यमदूत हाथ जोडक़र बोला, ''दयानिधान, मैं कैसे बतलाऊं कि क्या हो गया। आज तक मैने धोखा नहीं खाया था, पर इस बार भोलाराम का जीव मुझे चकमा दे गया। पांच दिन पहले जब जीव ने भोलाराम की देह को त्यागा, तब मैंने उसे पकडा और इस लोक की यात्रा आरम्भ की। नगर के बाहर ज्योंही मैं इसे लेकर एक तीव्र वायु-तरंग पर सवार हुआ त्योंही वह मेरे चंगुल से छूटकर न जाने कहां गायब होगया। इन पांच दिनों में मैने सारा ब्रह्यांड छान डाला, पर उसका पता नहीं चला।''

धर्मराज क्रोध से बोले, ''मूर्ख, जीवों को लाते-लाते बूडा हो गया, फिर एक मामूली आदमी ने चकमा दे दिया।''

दूत ने सिर झुकाकर कहा, ''महाराज, मेरी सावधानी में बिलकुल कसर नहीं थी। मेरे अभ्यस्त हाथों से अच्छे-अच्छे वकील भी नहीं छूट सके, पर इस बार तो कोई इन्द्रजाल ही हो गया।''

चित्रगुप्त ने कहा, ''महाराज, आजकल पृथ्वी पर इसका व्यापार बहुत चला है। लोग दोस्तों को फल भेजते है, और वे रास्ते में ही रेलवे वाले उडा देते हैं। होज़री के पार्सलों के मोज़े रेलवे आफिसर पहनते हैं। मालगाडी क़े डब्बे के डब्बे रास्ते में कट जाते हैं। एक बात और हो रही है। राजनैतिक दलों के नेता विरोधी नेता को उडा कर कहीं बन्द कर देते हैं। कहीं भोलाराम के जीव को भी किसी विरोधी ने, मरने के बाद, खराबी करने के लिए नहीं उडा दिया?''

धर्मराज ने व्यंग्य से चित्रगुप्त की ओर देखते हुए कहा, ''तुम्हारी भी रिटायर होने की उम्र आ गई। भला, भोलाराम जैसे दीन आदमी को किसी से क्या लेना-देना?''

इसी समय कहीं से घूमते-घामते नारद मुनि वहां आ गए। धर्मराज को गुमसुम बैठे देख बोले, ''क्यों धर्मराज, कैसे चिंतित बेठे हैं? क्या नरक में निवास-स्थान की समस्या अभी हल नहीं हुई?''

धर्मराज ने कहा, ''वह समस्या तो कभी की हल हो गई। नरक में पिछले सालों से बडे ग़ुणी कारीगर आ गए हैं। कई इमारतों के ठेकेदार हैं, जिन्होंने पूरे पैसे लेकर रद्दी इमारतें बनाई। बडे-बडे इंजीनियर भी आ गए हैं जिन्होंने ठेकेदारों से मिलकर भारत की पंचवर्षीय योजनाओं का पैसा खाया। ओवरसीयर हैं, जिन्होंने उन मज़दूरों की हाज़री भरकर पैसा हडपा, जो कभी काम पर गए ही नहीं। इन्होंने बहुत जल्दी नरक में कई इमारतें तान दी हैं। वह समस्या तो हल हो गई, पर एक विकट उलझन आगई है। भोलाराम के नाम के आदमी की पांच दिन पहले मृत्यु हुई। उसके जीव को यमदूत यहां ला रहा था, कि जीव इसे रास्ते में चकमा देकर भाग गया। इसने सारा ब्रह्यांड छान डाला, पर वह कहीं नहीं मिला। अगर ऐसा होने लगा, तो पाप-पुण्य का भेद ही मिट जाएगा।''

नारद ने पूछा, ''उस पर इनकम टैक्स तो बकाया नहीं था? हो सकता है, उन लोगों ने उसे रोक लिया हो।''

चित्रगुप्त ने कहा, ''इनकम होती तो टैक्स होता। भुखमरा था।''

नारद बोले, ''मामला बडा दिलचस्प है। अच्छा, मुझे उसका नाम, पता बतलाओ। मैं पृथ्वी पर जाता हूं।''

चित्रगुप्त ने रजिस्टर देखकर बतलाया - ''भोलाराम नाम था उसका। जबलपुर शहर के घमापुर मुहल्ले में नाले के किनारे एक डेढ क़मरे के टूटे-फूटे मकान पर वह परिवार समेत रहता था। उसकी एक स्त्री थी, दो लडक़े और एक लडक़ी। उम्र लगभग 60 वर्ष। सरकारी नौकर था। पांच साल पहले रिटायर हो गया था, मकान का उस ने एक साल से किराया नहीं दिया था इसलिए मकान-मालिक उसे निकालना चाहता था। इतने मे भोलाराम ने संसार ही छोड दिया। आज पांचवां दिन है। बहुत संभव है कि, अगर मकान-मालिक वास्तविक मकान-मालिक है, तो उसने भोलाराम के मरते ही, उसके परिवार को निकाल दिया होगा। इसलिए आपको परिवार की तलाश में घूमना होगा।''

मां बेटी के सम्मिलित क्रंदन से ही नारद भोलाराम का मकान पहिचान गए।

द्वार पर जाकर उन्होंने आवाज़ लगाई, ''नारायण नारायण !'' लडक़ी ने देखकर कहा, ''आगे जाओ महाराज।''

नारद ने कहा, ''मुझे भिक्षा नहीं चाहिए, मुझे भोलाराम के बारे में कुछ पूछताछ करनी है। अपनी मां को ज़रा बाहर भेजो बेटी।''

भोलाराम की पत्नी बाहर आई। नारद ने कहा, ''माता, भोलाराम को क्या बिमारी थी?

''क्या बताऊं? गरीबी की बिमारी थी। पांच साल हो गए पैन्शन पर बैठे थे, पर पेन्शन अभी तक नहीं मिली। हर 10-15 दिन में दरख्वास्त देते थे, पर वहां से जवाब नहीं आता था और आता तो यही कि तुम्हारी पेन्शन के मामले पर विचार हो रहा है। इन पांच सालों में सब गहने बेचकर हम लोग खा गए। फिर बर्तन बिके। अब कुछ नहीं बचा। फाके होने लगे थे। चिन्ता मे घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड दिया।''

नारद ने कहा, ''क्या करोगी मां? उनकी इतनी ही उम्र थी।''

''ऐसा मत कहो, महाराज। उम्र तो बहुत थी। 50-60 रूपया महीना पेन्शन मिलती तो कुछ और काम कहीं करके गुज़ारा हो जाता। पर क्या करें? पांच साल नौकरी से बैठे हो गए और अभी तक एक कौडी नहीं मिली।''

दुख की कथा सुनने की फुरसत नारद को थी नहीं। वे अपने मुद्दे पर आए, ''मां, यह बताओ कि यहां किसी से उनका विषेश प्रेम था, जिसमें उनका जी लगा हो?''

पत्नी बोली, ''लगाव तो महाराज, बाल-बच्चों से होता है।''

''नहीं, परिवार के बाहर भी हो सकता है। मेरा मतलब है, कोई स्त्री?''

स्त्री ने गुर्राकर नारद की ओर देखा। बोली, ''बको मत महाराज ! साधु हो, कोई लुच्चे-लफंगे नहीं हो। जिन्दगी भर उन्होंने किसी दूसरी स्त्री को आंख उठाकर नहीं देखा।''

नारद हंस कर बोले, ''हां, तुम्हारा सोचना भी ठीक है। यही भ्रम अच्छी गृहस्थी का आधार है। अच्छा माता, मैं चला।'' व्यंग्य समझने की असमर्थता ने नारद को सती के क्रोध की ज्वाला ने बचा लिया।

स्त्री ने कहा, ''महाराज, आप तो साधु हैं, सिध्द पुरूष हैं। कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि उनकी रूकी पेन्शन मिल जाय। इन बच्चों का पेट कुछ दिन भर जाए?''

नारद को दया आ गई। वे कहने लगे, ''साधुओं की बात कौन मानता है? मेरा यहां कोई मठ तो है नहीं? फिर भी सरकारी दफ्तर में जाऊंगा और कोशिश करूंगा।''

वहां से चलकर नारद सरकारी दफ्तर में पहुंचे। वहां पहले कमरे में बैठे बाबू से भोलाराम के केस के बारे में बातें की। उस बाबू ने उन्हें ध्यानपूर्वक देखा और बोला, ''भोलाराम ने दरखास्तें तो भेजी थीं, पर उनपर वज़न नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड ग़ई होंगी।''

नारद ने कहा, ''भई, ये पेपरवेट तो रखे हैं, इन्हें क्यों नहीं रख दिया?''

बाबू हंसा, ''आप साधु हैं, आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती। दरखास्तें पेपरवेट से नहीं दबती। खैर, आप उस कमरे में बैठे बाबू से मिलिए।''

नारद उस बाबू के पास गये। उसने तीसरे के पास भेजा, चौथे ने पांचवें के पास। जब नारद 25-30 बाबुओं और अफसरों के पास घूम आए तब एक चपरासी ने कहा, '' महाराज, आप क्यों इस झंझट में पड ग़ए। आप यहां साल-भर भी चक्कर लगाते रहें, तो भी काम नहीं होगा। आप तो सीधा बडे साहब से मिलिए। उन्हें खुश कर लिया, तो अभी काम हो जाएगा।''

नारद बडे साहब के कमरे में पहुंचे। बाहर चपरासी ऊंघ रहे थे, इसलिए उन्हें किसी ने छेडा नहीं। उन्हें एकदम विजिटिंग कार्ड के बिना आया देख साहब बडे नाराज़ हुए।बोले, इसे कोई मन्दिर-वन्दिर समझ लिया है क्या? धडधडाते चले आए ! चिट क्यों नहीं भेजी?''

नारद ने कहा, ''कैसे भेजता, चपरासी सो रहा है।''

''क्या काम है?'' साहब ने रौब से पूछा।

नारद ने भोलाराम का पेन्शन-केस बतलाया।

साहब बोले, ''आप हैं बैरागी। दफ्तरों के रीत-रिवाज नहीं जानते। असल मे भोलाराम ने गलती की। भई, यह भी मन्दिर है। यहां भी दान-पुण्य करना पडता है, भेंट चढानी पडती है। आप भोलाराम के आत्मीय मालूम होते हैं। भोलाराम की दरख्वास्तें उड रही हैं, उन पर वज़न रखिए।''

नारद ने सोचा कि फिर यहां वज़न की समस्या खडी हो गई। साहब बोले, ''भई, सरकारी पैसे का मामला है। पेन्शन का केस बीसों दफ्तरों में जाता है। देर लग जाती है। हज़ारों बार एक ही बात को हज़ारों बार लिखना पडता है, तब पक्की होती है। हां, जल्दी भी हो सकती है, मगर '' साहब रूके।

नारद ने कहा, ''मगर क्या?''

साहब ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा, ''मगर वज़न चाहिए। आप समझे नहीं। जैसे आप की यह सुन्दर वीणा है, इसका भी वज़न भोलाराम की दरख्वास्त पर रखा जा सकता है। मेरी लडक़ी गाना सीखती है। यह मैं उसे दे दूंगा। साधु-संतों की वीणा के अच्छे स्वर निकलते हैं। लडक़ी जल्दी संगीत सीख गई तो शादी हो जाएगी।''

नारद अपनी वीणा छिनते देख ज़रा घबराए। पर फिर संभलकर उन्होंने वीणा टेबिल पर रखकर कहा, ''लीजिए। अब ज़रा जल्दी उसकी पेन्शन का आर्डर निकाल दीजिए।''

साहब ने प्रसन्नता से उन्हें कुर्सी दी, वीणा को एक कोने में रखा और घंटी बजाई। चपरासी हाजिर हुआ।

साहब ने हुक्म दिया, ''बडे बाबू से भोलाराम के केस की फाइल लाओ।''

थोडी देर बाद चपरासी भोलाराम की फाइल लेकर आया। उसमें पेन्शन के कागज़ भी थे। साहब ने फाइल पर नाम देखा और निश्चित करने के लिए पूछा, ''क्या नाम बताया साधुजी आपने!''

नारद समझे कि ऊंचा सुनता है। इसलिए ज़ोर से बोले, ''भोलाराम।''

सहसा फाइल में से आवाज़ आई, ''कौन पुकार रहा है मुझे? पोस्टमैन है क्या? पेन्शन का आर्डर आ गया क्या?''

साहब डरकर कुर्सी से लुढक़ गए। नारद भी चौंके। पर दूसरे क्षण समझ गए। बोले, ''भोलाराम, तुम क्या भोलाराम के जीव हो?''

''हां।'' आवाज़ आई।

नारद ने कहा, ''मैं नारद हूं। मैं तुम्हें लेने आया हूं। स्वर्ग में तुम्हारा इन्तजार हो रहा है।''

आवाज़ आई, ''मुझे नहीं जाना। मैं तो पेन्शन की दरखास्तों में अटका हूं। वहीं मेरा मन लगा है। मैं दरखास्तों को छोडक़र नहीं आ सकता।''

हाय मेरे नितम्ब!

कामिनी को कमनीय काया की कामना न हो, तो कामिनी ही कैसी? आप जानते ही होंगे कि आदम और हव्वा को ज़मीन पर इसीलिये ढकेला गया था कि आदम महाशय हव्वा की क़यामती काया को देखकर ऐसे बदहवास हो गये थे कि फ़रिश्ते की मुमानियत का ख़याल भूलकर उसे कौरिया लिया था। तब से आज तक हव्वा की हर बेटी को अपने को अपार खूबसूरत दिखने का शौक जुनून की हद तक रहता है। बेटियां चलने फिरने लायक हुईं कि मॉ को अपनी ड्रेसिंग टेबिल पर रखी लिप-स्टिक, बिंदी, और क्रीम पाउडर की हिफ़ाज़त करना प्रारम्भ कर देना पड़ता है। जिन दिनों बेटों में नकली बंदूक से धांय धांय करने का शौक जागता है, बेटियां कंघी से आडे-तिरछे बाल संवार कर शीशे में अपने चेहरा निहारना शुरू कर देतीं हैं। और जवानी का रंग चढ़ते चढ़ते तो कन्यायें अपनी सुंदरता पर ऐसी आत्मविभोर हो जातीं हैं जैसे सावन के अंधे को हर सिम्त हरा हरा ही सूझता है।

यह बात दीगर हैं कि अब बराबरी का ज़माना आ गया है और आदमियों को भी यह ज़नाना शौक चर्रोने लगा है। एक मेरे लड़कपन का वक्त था कि जवानी की दहलीज़ पर कदम रखने वाले मेरे एक पहलवानछाप दोस्त ने जब एक हमउम्र हव्वा को आंख मारकर उसका दिल दहला दिया था, तो हव्वा की शिकायत बड़े बूढ़ों ने यह कहकर खारिज़ कर दी थी कि 'वह /मेरा दोस्त/ ऐसा कर ही नहीं सकता है क्योंकि वह सिर घुटाकर रहता है और पतलून तो क्या कभी सुथन्ना /पाजामा/ भी नहीं पहिनता है।' उन बूढ़ों की समझ में अपनी खूबसूरती के प्रति बेख़बर सिर सफाचट रखने वाला और धोती-कुर्ता पहिनने वाला लड़का भीष्म-प्रतिज्ञ ब्रह्मचारी के अलावा और हो ही क्या सकता था? जब कि सच यह था कि मेरे दोस्त मोशाय सूरत के जितने भोले थे, सीरत के उतने ही मनचले थे, और मौका हाथ आते ही इधर उधर मुंह मार लेते थे। उन दिनों मैं भी अच्छा बच्चा समझे जाने के चक्कर में सिर पर एक लम्बी और मोटी चोटी रखता था और बेखौफ़ लुकाछिपी कर लेता था। पर आज ज़माना बदल गया है और खुला खेल फरक्काबादी खेला जाने लगा है। अब तो कल-के-छोकरे न सिर्फ बालों की लहरदार कुल्लियां रखाये घूमते हैं बल्कि हर घंटे, आध-धंटे में बडों के सामने बेझिझक उन पर कंघी भी फिराते रहते हैं। आज के लड़कों के मुंह से तोतले बोल भी डिज़ाइनर टी-शर्ट और लिवाइज़ जीन्स की फ़रमाइश के साथ ही निकलते हैं। और वे ऐसा क्यों न करें जब उनके बापों को खुले आम ब्यूटी पार्लर में नमूदार होते और वहां से होठों पर लिप-स्टिक लगवा कर और गालों पर पाउडर क्रीम चुपड़वाकर निकलते देखा जाता है? जब बाप छुलकां मूतते हैं तो बेटे चकरघिन्नी की तरह घूम - घूम कर मूतेंगे ही।

ऐसे माहौल में ब्यूटी पार्लर वालों की पांचो उंगलियां घी में हो गईं हैं। अगर आप बेकार हैं और बेकाम के आदमी /या औरत/ हैं तो एक कमरे के दरवाजे पर 'मेल ब्यूटी पार्लर' या 'लेडीज़ ब्यूटी पार्लर' या सिर्फ़ 'ब्यूटी पार्लर' का बोर्ड जड़ दीजिये और उसके दाहिने कोने पर पेंटर से शहनाज़ हुसेन का एक गहरा रंगा-पुता चित्र बनवा दीजिये। फिर चाहे वह चित्र टुनटुन जैसा ही क्यों न दिखता हो, आप पायेंगे कि उस दरवाजे क़ी शामें रोज़ ज्यादा से ज्यादा खुशनुमा हो रहीं हैं और आप की तिजोरी की सेहत दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है।

रूप और रुपयों की यह बरसात देखकर डाक्टरों का माथा भी ठनका है और उन्होंने सोचा है कि वे भी क्यों न इस बहती गंगा में हाथ धो लें? सो उन्होंने फ़िगर सुधारने के 'भरोसेमंद' शॉर्ट कट्स निकालने शुरू कर दिये हैं। उन्हीं में एक को नाम दिया है लिपो सक्शन जिसका हिंदी तर्जुमा होता है कि अगर आप के शरीर का कोई अंग जैसे पेट, जांधें आदि हिप्पो जैसा मोटा है तो वे उसकी चर्बी को खींच कर उसे लिपा हुआ सा पतला बना देंगे। लिपो सक्शन के ईजाद होने की खबर जैसे ही धनी महिलाओं में फैली कि चारों ओर हड़बडी मच गई। कौन नहीं जानता है कि बेमुरौव्वत चर्बी को महिलाओं के पेट से बेपनाह उन्सियत होती है- जहां किसी 36.24.36 की कमनीय काया को मातृत्व की गरिमा प्राप्त हुई, तो अविलम्ब 24 की मध्य-संख्या 36 की गुरुता को प्राप्त करने को उतावली होने लगती है। हाल में रोमानिया की एक माडल के बच्चा पैदा होने पर उसके साथ भी यही हादसा हुआ और वह अपने पेट की चर्बी से काफी ग़मगीन रहनें लगी। हालांकि उसके नितम्ब एवं वक्ष पर भी कुछ चर्बी आ गई थी, परंतु देखने वालों ने उस चर्बी से उसकी सुंदरता में चार चांद लगने की बात कही थी- बस पेट की चर्बी ही चांद पर ग्रहण लगा रही थी। वह माडल एक मशहूर कौस्मेटिक सर्जन का नाम सुनकर उनके पास पेट की चर्बी कम कराने गई। मोटा ग्राहक फंसते देखकर सर्जन साहब के चेहरे पर रौनक आ गई और वह फटाफट बोले,'अरे, यह तो मिनटों का काम है।', और फिर अपनी व्यस्तता दिखाने हेतु डायरी देखते हुए लिपो सक्शन हेतु दूर की एक तारीख़ निश्चित कर दी। वह तारीख़ आते आते सर्जन साहब यह भूल गये कि लिपो सक्शन कहां का होना है, और जब आपरेशन थियेटर में एनिस्थीसिया के नशे में वह माडल अपनी कमर के पुन: पुरुष-संहारक हो जाने का स्वप्न देख रही थी तब उन्होंने सक्शन यंत्र उसके नितम्ब में लगाकर उन्हें निचोड़ दिया। जब माडल की मोहनिद्रा खुली और उसने अपने बदन को टटोला तो वह यह जानकर हतप्रभ रह गई कि उसका पेट यथापूर्व मोटा था और उसके नितम्ब निचुड़ गये थे जिससे उसका बदन ऐसा हो गया था जैसे बांस की खपाचों पर गेहूं से भरा बोरा रख दिया गया हो।

यह देखकर विषादपूर्ण आश्चर्य से उसके मुख से बस तीन शब्द निकले, ''हाय मेरे नितम्ब!''

विलासिता का दुख

जब कभी भी किसी विकसित देश में उपलब्ध आम जनसुविधओं के बारे में सुनता या पढ़ता हूं तो हृदय से हूक उठ जाती है। अब इसका अर्थ आप यह कदापि ग्रहण न करें कि मैं उनकी सुविधा-सम्पन्नता से जल उठता हूं। बिना किसी आत्म प्रवंचना के कहूं तो मुझे यह उनकी विपन्नता ही नजर आती है। सुख-सुविधाओं का जो मायाजाल अपने देश में निहित है वह कहीं ओर कहां हो सकता है। अब आप ही बताइए वो सुविधा किस काम की जो आप को बांध कर ही रख दे। सुना है अमेरिका में बिजली कटौती न के बराबर है। यदि ऐसा है तो वहां के घरों में रहने वाले लोग इक्का-दुक्का मौकों पर ही एक-साथ घर से बाहर निकलते होंगे। अब अपने यहां देखिए दिन में दसियों घंटों तक तो बिजली गुल रहती है, बिजली होती भी है तो जल देवता नदारद मिलते हैं। इन दोनों ही अवसरों पर जमावड़ा चौक पर होता है। दिन में 24 घंटों में से 16 घंटे तक रौनक घर के बाहर ही होती है और ऐसे अवसरों पर जो मुख और श्रवण सुख मनुष्येन्द्रियों को प्राप्त होता है, वह भला उन पाश्चात्य देशों में रहने वाले लोगों को कहा मिलता होगा। अपने यहां की महिलाएं एवं पुरुष दोनों ही इस अवसर का लाभ अपने दिल की भड़ास निकालने के लिए बखूबी करते हैं। दूसरों की बुराइयां करने में जो सुख मिलता है वो भला 5 सितारा होटलों में अब बताइएं यह किस काम की विकसिता। ट्रेफिक नियमों के संबंध में भी वहां फैली विषयता झलकती है। बी.एम.डब्ल्यू, मर्सिडीज आदि जैसी अनेक हाई क्लास भारी-भरकम गाड़ियां भी अदनी-सी रेड लाइट के इशारे पर नाचती हैं, अपने यहां तो लखटकिया वाली छकड़ा गाड़ी भी काले धुंए का गुबार उड़ाती हुई फर्राटे से ट्रैफिक नियमों को धत्ता बताकर रख देती है। बड़ी-बड़ी गाड़ीवालों का तो कहना ही क्या! वो तो जब तक जी चाहा रोड पर, नहीं तो फुटपाथ पर दौड़ पड़ती हैं विदेशों में मॉडर्न ऑर्ट की मांग बहुत हो, परन्तु वहां पर इस कार्य के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाता। अपने यहां तो लोग मुंह में कूची लेकर घूमते रहते हैं। जहां दिल किया पच्च... पिचकारी मारी और दीवार पर मॉडर्न ऑर्ट तैयार। जबकि विदेशों में तो सड़क पर थूकने पर ही जुर्माने का प्रावधान है। अब आप ही बताइए यह कहा का इंसाफ है कि मनुश्य को सोने के पिंजरे में कैद करके रखा जाए। संभवत: यह सारी कमियां वहां के प्रशासन की देन है। हम अपने विकास के पाषाणयुग को भी नहीं भूलते बल्कि उसका यदा-कदा प्रदर्शन सांसद में कर उसका सीध प्रसारण देश भर में करवा देते हैं ताकि हमारी वास्तविक पहचान छोटे-छोटे बच्चों तक के हृदय में स्थायी बनी रहे। हम अपनी शारीरिक क्षमता एवं धाराप्रवाह बोलने की दक्षता का सटीक अवलोकन संसद में माइक, कुर्सी, मेज तोड़कर तथा धरने के दौरान चीख-पुकार कर दर्शा देते हैं। हमारे मन में जब भी भड़ास उत्पन्न होती है, तो उसे सरकारी वस्तुओं यथा बस, ट्रेन के शीशे, खंभे, ग्रिलों आदि पर इत्मीनान से निकाल देते हैं। अब आप ही कहें, ऐसा क्या वहां संभव है। वहां के लोग घरों के अंदर दुबक कर सोते हैं। अपने यहां तो आम आदमी रात को चने चबाकर पानी का घूंट मारकर तसल्ली से ग्रहों से विचार-विमर्श कर सोता है। वहां पर लोग विकेंड सिस्टम से चलते हैं परन्तु अपने सरकारी कर्मचारी तो कार्यालय में रहकर भी विकेंड मनाते हैं। ऐसी विसंगतियों के चलते यदि वह यह भ्रम मन में पाल कर बैठें हैं कि वह विकसित है, तो मैं इस पर सिर्फ खिसयानी हंसी ही हंस सकता हूं।

उर्वशी : पुरुष अध्यात्म का रूमान

उर्वशी की भूमिका में दिनकर ने मनु, इड़ा और पुरुरवा, उर्वशी के मिथक की तुलना करते हुए कहा है− ÷÷मनु और इड़ा तथा पुरुरवा और उर्वशी, ये दोनों ही कथाएं एक ही विषय को व्यंजित करती हैं। सृष्टि विकास की जिस प्रक्रिया के कर्त्तव्य पक्ष का प्रतीक मनु और इड़ा का आख्यान है, उसी प्रक्रिया का भावना पक्ष पुरुरवा और उर्वशी की कथा में कहा गया है।'' एक काव्यनाटक के रूप में उर्वशी का उद्देश्य क्या रहा होगा, इसे समझने में यह कथन मदद करता है। ÷आधुनिकता' की भारतीय परियोजना उन पश्चिमी उपकरणों की मोहताज रही जो तर्कबुद्धि की महत्ता से आक्रांत थे। इनके द्वारा मांजी गयी हमारी ÷आधुनिक' चेतना मानुष्यिक संघटन के भावनात्मक पक्ष को नजरअंदाज करती गयी। यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि हमारा ध्येय यह नहीं होना चाहिए कि तर्कबुद्धिवाद की दार्शनिक उपलब्धियों को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए। बात सिर्फ इतनी है कि तर्कबुद्धि पर अंधी आस्था यांत्रिाकता और स्थूलता की प्रवृत्ति को जन्म देती है, जो स्वयं तार्किकता की दार्शनिक जड़ों में मठ्ठा डालने का काम करती है। कला और साहित्य के क्षेत्र में जब यह प्रवृत्ति आलोचनात्मक व्यसन बन जाती है तब किसी रचना की शक्ति और कमजोरी का सही आकलन करना असम्भव हो जाता है। हिन्दी में यह प्रवृत्ति हमेशा विद्यमान रही है और कई रचनाकार इसके शिकार हुए। दिनकर इन्हीं रचनाकारों में से एक हैं। यह बात अलग है कि वह ताकतवर नहीं, बल्कि कमजोर शिकार हैं क्योंकि वह नशे के नहीं, खुमार के कवि हैं।
दिनकर को छायावादी ÷हैंगओवर', खुमार का कवि माना जाता है। खुमार सिर्फ उस नशे को ही व्यंजित नहीं करता जो कभी सर चढ़ कर बोला था। वह उस नशे की ढलान, उसके खत्म होते असर को भी व्यंजित करता है। खुद दिनकर के काव्य के भीतर छायावाद की यह ढलान, उसका खत्म होता असर विद्यमान है। दिनकर की रचनाओं के साथ समस्या यह रही कि वे छायावाद के प्रेमियों और विरोधियों के बीच नूराकुश्ती का सबब बनी। प्रेमियों ने जहां जम कर सराहा, वहीं विरोधियों ने बुरी तरह कोसा। यानि संज्ञा तो दी गयी खुमार, मगर बर्ताव ऐसे किया गया मानो साक्षात नशा हो।
÷उर्वशी' का प्रकाशन हिन्दी आलोचना के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। जिसे आज ÷उर्वशी विवाद' के नाम से जाना जाता है, वह आलोचना में लोकतांत्रिाकता की बड़ी मिसाल बना। आजादी के बाद पहली बार बड़े स्तर पर विभिन्न पीढ़ियों और विचारों के लेखकों की भागीदारी और टकराव देखने को मिला। निःसंदेह इस विवाद ने हिन्दी आलोचना को एक नयी धार दी,उसे सकारात्मक दिशा में प्रवृत्त किया, और काव्य के बदलते मूल्यों एवं प्रतिमानों को परखने की नयी दृष्टि प्रदान की। आज ÷उर्वशी विवाद' साहित्येतिहास के पन्नों में दफ्न हो चुका है। लगभग पचास वर्ष बाद इस विवाद से फूटी आलोचना की प्रखर किरण का हश्र क्या हुआ, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
÷उर्वशी' का नायक पुरुरवा है− रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द से मिलने वाले सुखों से उद्वेलित मनुष्य। उर्वशी चक्षु, रसना, घ्राण, त्वक तथा श्रोत्र की कामनाओं का प्रतीक है। इस प्रकार ÷उर्वशी' का नायक ऐन्द्रीय सुख पर निसार होने वाला मनुष्य है। वह देह का तिरस्कार नहीं करता। ÷उर्वशी' की विषयवस्तु का केन्द्रीय तत्व काम है। देवत्व और मनुष्यत्व को काम के निकष पर जिस साहस के साथ यहां कसा गया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है :
भू को जो आनंद सुलभ है, नहीं प्राप्त अम्बर को।
हम भी कितने विवश! गंध पीकर ही रह जाते हैं,
स्वाद व्यंजनों का न कभी रसना से ले पाते हैं।
हो जाते हैं तृप्त पान कर स्वर−माधुरी श्रवण से,
रूप भोगते हैं मन से या तृष्णा भरे नयन से।
पर, जब कोई ज्वार रूप को देख उमड़ आता है,
किसी अनिर्वचनीय क्षुधा में जीवन पड़ जाता है,

उस पीड़ा से बचने की तब राह नहीं मिलती है,
उठती जो वेदना यहां, खुल कर न कभी खिलती है।
किन्तु, मर्त्य जीवन पर ऐसा कोई बंध नहीं है,
रुके गंध तक, वहां प्रेम पर यह प्रतिबंध नहीं है॥

देवत्व ÷गंध' की सीमा में कैद है। इस कैद से मुक्त होना ही मनुष्य होना है :
पर, सोचो तो, मर्त्य मनुज कितना मधु रस पीता है।
दो दिन ही हो, पर, कैसे वह धधक धधक जीता है।
इन ज्वलंत वेगों के आगे मलिन शांति सारी है,
क्षण भर की उन्मद तरंग पर चिरता बलिहारी है।

काम का यह निकष देवों को हीन और मनुष्यों को श्रेष्ठ साबित करता है। प्रतिबंध रहित प्रेम नश्वरता का वरदान है। इसी वरदान को प्राप्त करने के लिए उर्वशी अमरत्व की ऊंचाई से उतर कर नश्वरता के धरातल पर कदम रखती है। उसकी यह यात्रा एक ढलान है-स्वर्ग से धरती की ओर, शिखर से धरातल की ओर, ऊंचाई से नीचे की ओर। ऊपर से नीचे की ओर आना हमेशा पतन की व्यंजना नहीं करता। ढलान में एक किस्म की गरिमा हो सकती है, यह संदेश उर्वशी देती है। छायावाद के प्रभुत्व वाले दौर में ढलान की इस गरिमा को पहचानना असम्भव था। छायावाद की महत्वपूर्ण रचनाएं (कहने की जरूरत नहीं कि निराला की रचनाएं अपवाद हैं) धरती से स्वर्ग की ओर, धरातल से शिखर की ओर और नीचे से ऊपर की ओर मनुष्य की उठान को महिमामंडित करती हैं। जिस हद तक दिनकर ढलान की गरिमा को अभिव्यक्त करने में सफल होते हैं, उस हद तक ÷उर्वशी' नयी चेतना का काव्य बन कर उभरता है।
किन्तु दिनकर की भाषा में छायावादी सौन्दर्यबोध की धारा प्रत्यक्षतः प्रवाहित होती है। ÷उर्वशी' के प्रकृति चित्रण में यह सौन्दर्य दृष्टि सर्वाधिक प्रखर है :
मही सुप्त, निश्चेत गगन है,
आलिंगन में मौन, मगन है।
ऐसे में नभ से अशंक अवनी पर आओ जाओ री।
यह रात रुपहली आयी।
मुदित चांद की अलकें चूमो,
तारों की गलियों में घूमो,
झूलो गगन हिंडोरे पर, किरणों के तार बढ़ाओ री!
यह रात रुपहली आयी।

÷उर्वशी' की कथा जैसे जैसे आगे बढ़ती है, नयी चेतना का आवेग गहराता जाता है। मगर उसकी छायावादी सौन्दर्य दृष्टि जब धरती को स्वर्ग से बड़ा दर्जा देने वाली नयी चेतना के इस गहराते आवेग से टकराती है, उससे उलझती है तो अपनी धार खो बैठती है। परिणाम यह होता है कि कविता जिस नयी चेतना का वाहक बनना चाहती है, उसकी भाषा लगातार उससे दूर भागती है। नयी चेतना, नयी भाषा की मांग करती है। कवि इस नयी भाषा को कविता की परम्परागत भाषा में तोड़फोड़ करके प्राप्त करते हैं। मगर दिनकर को यह तोड़फोड़ मंजूर नहीं। हां, वह भाषा में कुछ ठोंकपीट अवश्य करते हैं, उसे विषयानुकूल बनाने के लिए। यह ठोंकपीट कहीं कहीं सफल भी हो जाती है। रानी औशीनरी की व्यथा को अभिव्यक्त करने वाली भाषा इसका उदाहरण है :
कितना विलक्षण न्याय है!
कोई न पास उपाय है!
अवलम्ब है सबको, मगर, नारी बहुत असहाय है।

दुख दर्द जतलाओ नहीं,
मन की व्यथा गाओ नहीं,
नारी! उठे जो हूक मन में, जीभ पर लाओ नहीं।
मगर इस ठोंकठाक से काम ज्यादा चल नहीं पाता। काव्य की संरचनागत समग्रता खंडित हो जाती है। ÷उर्वशी' की भाषा और उसकी अंतर्वस्तु के बीच फांक पड़ जाती है। इस फांक को छिपाने के लिए कविता चमत्कारपूर्ण उक्तियों, वाग्जाल और शब्दाडम्बर का सहारा लेती है, जो अंततः उसे और कमजोर करते हैं। ÷उर्वशी' के तीसरे अंक को उसका सार भाग माना जाता है। मगर इस अंक की आरम्भिक पंक्तियां ही चमत्कारिक उक्ति और शब्दाडम्बर से ग्रस्त हैं :
जब से हम तुम मिले, न जानें, कितने अभिसारों में
रजनी कर श्रृंगार सितासित नभ में घूम चुकी है;
जाने कितनी बार चंद्रमा को, बारी बारी से,
अमा चुरा ले गयी और फिर ज्योत्सना ले आयी है।

÷उर्वशी' में धरती और स्वर्ग, देह और आत्मा, मही और आकाश, देव और मनुज, मातृ सुख से वंचित अप्सरा नारी और मातृ सुख को भोगने वाली साधारण नारी के द्वंद्व को उकेरा गया है। मूलतः यह द्वंद्व काम और योग का द्वंद्व है। तमाम शब्दाडम्बर के बावजूद यह द्वंद्व तीसरे अंक में सर्वाधिक तीक्ष्ण है। पुरुरवा की इन पंक्तियों में यह द्वंद्व साकार रूप ग्रहण करता है :
मैं मनुष्य, कामना वायु मेरे भीतर बहती है
कभी मंद गति से प्राणों में सिहरन पुलक जगा कर;
कभी डालियों को मरोड़ झंझा की दारुण गति से
मन का दीपक बुझा, बना कर तिमिराच्छन्न हृदय को।
किन्तु पुरुष क्या कभी मानता है तम के शासन को?
फिर होता संघर्ष, तिमिर में दीपक फिर जलते हैं।

नहीं इतर इच्छाओं तक ही अनासक्ति सीमित है,
उसका किंचित स्पर्श प्रणय को भी पवित्र करता है।

इस पर आश्चर्यग्रस्त उर्वशी प्रश्न करती है :
यह मैं क्या सुन रही? देवताओं के जग से चल कर
फिर मैं क्या फंस गयी किसी सुर के बाहु वलय में?
अंधकार की मैं प्रतिमा हूं? जब तक हृदय तुम्हारा
तिमिरग्रस्त है, तब तक ही मैं उस पर राज करूंगी?
और जलाओगे जिस दिन बुझे हुए दीपक को,
मुझे त्याग दोगे प्रभात में रजनी की माला सी?

उर्वशी स्वर्ग की अप्सरा है, मगर इन प्रश्नों में धरती का नारीत्व गूंज रहा है। धरती और नारी जननी हैं। उर्वशी अपनी कसी हुई देहयष्टि का त्याग कर माता बनने को तैयार है। मां बनने पर उसका सौन्दर्य ढल जाएगा। मगर वह जानती है कि यह ढलान गरिमामय है। उर्वशी के मुख से फूटे इन प्रश्नों में नारीत्व की गरिमा छिपी है। ये प्रश्न पुरुरवा को देह के अधिकारों के प्रति सचेत करते हैं :
÷÷पर, न जानें, बात क्या है!
इन्द्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है,
सिंह से बाहें मिला कर खेल सकता है,
फूल के आगे वही असहाय हो जाता,
शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता।

मैं तुम्हारे हाथ का लीला कमल हूं,
प्राण के सर में उतरना चाहता हूं।
कौन कहता है,
तुम्हें मैं छोड़ कर आकाश में विचरण करूंगा?''

उर्वशी मानवीय भावना के उद्दाम आवेगों का प्रतिनिधित्व करती है। वह दृढ़ है कि ÷रक्त बुद्धि से अधिक बली है और अधिक ज्ञानी भी' क्योंकि ÷निरी बुद्धि की निर्मितियां निष्प्राण हुआ करती हैं।' पुरुरवा का पुरुष भी ÷रक्त' को ÷बुद्धि' से अधिक बलशाली मानता है, मगर एकदम विपरीत
अर्थ में :
रक्त बुद्धि से अधिक बली है, अधिक समर्थ, तभी तो
निज उद्गम की ओर सहज हम लौट नही पाते हैं।
यह भावना नहीं, बल्कि अनासक्ति का तर्क है। पुरुरवा काम के आवेग में डूबना चाहता है, मगर अनासक्ति का तर्क उसे बार बार ऊपर खींच लाता है। पुरुरवा उर्वशी के प्रणय सम्वाद से निर्मित तृतीय अंक ÷उर्वशी' का सबसे लम्बा भाग है। मूल द्वंद्व शुरू के सात आठ पृष्ठों में ही मुखर हो उठता है। आगे इस द्वंद्व का दोहराव भर है, हालांकि शब्द बदले हुए हैं। यहां द्वंद्व का विस्तार नहीं, बल्कि पर्यायवाची आशय है जो इस अंक को बोझिल और निस्सार बना देता है। अनावश्यक स्फीति उर्वशी पुरुरवा सम्वाद की मार्मिकता और ताजगी को नष्ट कर देती है। फिर भी अंत की ओर बढ़ने पर ये पंक्तियां ताजा हवा के झोंके की तरह आती हैं :

कुसुम और कामिनी, बहुत सुंदर दोनों होते हैं,
पर, तब भी नारियां श्रेष्ठ हैं कहीं कांत कुसुमों से,
क्योंकि पुष्प हैं मूक और रूपसी बोल सकती है।
सुमन मूल सौन्दर्य और नारियां सवाक सुमन हैं।

÷उर्वशी' की भूमिका में दिनकर लिखते हैं : ÷÷भावना और तर्क, हृदय और मस्तिष्क, कला और विज्ञान अथवा निरुद्देश्य आनंद और सोद्देश्य साधना, मानवीय गुणों के ये जोड़े नवीन मनुष्य को भी दिखायी देते हैं और वे प्राचीन मानव को भी दिखाई पड़े थे। मनु और इड़ा का आख्यान तर्क, मस्तिष्क, विज्ञान और जीवन की सोद्देश्य साधना का आख्यान है; वह पुरुषार्थ के अर्थ पक्ष को महत्व देता है। किन्तु पुरुरवा उर्वशी का आख्यान भावना, हृदय, कला और निरुद्देश्य आनंद की महिमा का आख्यान है; वह पुरुषार्थ के काम पक्ष का माहात्म्य बताता है।'' ÷उर्वशी' में पुरुषार्थ के काम पक्ष के माहात्म्य का बोध किस तरह किया गया है इसका गवाह तृतीय अंक का यह संदेश है :
चिन्तन की लहरों के समान सौन्दर्य लहर में भी है बल,
सातों अम्बर तक उड़ता है रूपसी नारि का स्वर्णांचल।

÷उर्वशी' यह संदेश देती है, मगर आगे बढ़ कर नहीं, बल्कि पीछे हटकर। उर्वशी आरम्भ में धरती और देह के अधिकारों का प्रतिनिधित्व करती है। मगर अब वह ÷सौन्दर्य लहर' के बल द्वारा पुरुरवा को दीक्षित करने के क्रम में देह को भ्रम के रूप में निरूपित करने लगती है :
÷÷मैं अदेह कल्पना, मुझे तुम देह मान बैठे हो :
मैं अदृश्य, तुम दृश्य देख कर मुझको समझ रहे हो
सागर की आत्मजा, मानसिक तनया नारायण की।''

यहां दिनकर के साहित्य बोध पर दृष्टिपात करना तस्वीर को कुछ और साफ करने में सहायक होगा। संयोग से इसके लिए ज्यादा दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, भूमिका के कुछ अंश को एक बार फिर उद्वृत करना होगा : ÷÷कला, साहित्य और विशेषतः काव्य में भौतिक सौन्दर्य की महिमा अखंड है। फिर भी, श्रेष्ठ कविता, बराबर, भौतिक से परे भौतिकोत्तर सौन्दर्य का संकेत देती है, ÷फिजिकल' को लांघ कर ÷मेटा फिजिकल' हो जाती है।'' इस तरह दिनकर की काव्य चेतना जिसे महत्वपूर्ण मानती है, वह ÷फिजिकल' नहीं, बल्कि ÷मेटा फिजिकल' है। अतः दिनकर की सौन्दर्य लहर, जिसकी श्रेष्ठता का बखान उर्वशी करती है, पाठक को बहा कर वहीं ले जाती है, जहां पुरुष अध्यात्म की चिन्तन लहर पहुंचती है। ये वेदांत से निःसृत पुरातन मूल्य हैं, जिन्हें आजादी के बाद सत्ता की बागडोर संभालने वाले भारत के तथाकथित नीति निर्माताओं ने परम्परा की संज्ञा दी और उन पर उदारता का मुलम्मा चढ़ाया। दिनकर भारतीय परम्परा की इसी शासकीय व्याख्या के अलम्बरदार थे। ÷उर्वशी' की रचनात्मक गत्वरता को जो शक्ति नियंत्रिात कर रही है, उसे ÷संस्कृति के चार अध्याय' में बिना किसी लागलपेट के देखा जा सकता है। दिनकर का वेदांती मन रामकृष्ण परमहंस के संदर्भ में भारतीय महापुरुष की व्याख्या इस तरह करता है : ÷÷किन्तु रामकृष्ण ने नारी की ऐसी निन्दा कभी नहीं की। अपनी पत्नी की तो उन्होंने प्रशंसा ही की है। हां, काम भोग को साधना की बाधा वे भी मानते थे और उनका भी उपदेश यही था कि नर नारी एक दूसरे से अलग रह कर ही अध्यात्म के मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं। अपना उदाहरण देते हुए उन्होंने एक बार कहा था, ÷उन दिनों मुझे स्त्रिायों से डर लगता था। ... अब वह अवस्था नहीं रही। अब मैंने मन को बहुत कुछ सिखा पढ़ा कर इतना कर लिया है कि स्त्रिायों की ओर आनंदमयी माता के भिन्न भिन्न रूप जान कर देखा करता हूं। तो भी, यद्यपि, स्त्रिायां जगदम्बा के ही अंश हैं, तथापि साधु साधक के लिए वे त्याज्य ही हैं।'' (संस्कृति के चार अध्याय, पृ. 494)। इस पर आगे दिनकर टिप्पणी करते हैं : ÷÷कामिनी और कांचन के विषय में किसकी क्या दृष्टि है तथा इनके आकर्षण से कौन कहां तक बचता है, यही वह कसौटी है जिस पर भारतीय महापुरुषों की जांच होती आयी है। रामकृष्ण इस कसौटी पर खरे उतरे।'' (वही)। स्पष्ट है कि किसी महापुरुष की भारतीयता का निकष यही है कि वह कामिनी और कांचन का परित्याग करे। इसी तरह दिनकर के वेदांती मन की गांठ का पता वहां भी चलता है जब ÷संस्कृति के चार अध्याय' में भारतीय सभ्यता पर इस्लामी प्रभाव के बारे में वह अनर्गल टिप्पणी करते हैं।
यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि ÷निरुद्देश्य आनंद की महिमा' का गुणगान करने वाला पुरुरवा उर्वशी का मिथक, ÷उर्वशी' में निरुद्देश्य नहीं है। उसका एक स्पष्ट उद्देश्य है − सनातन समझे जाने वाले वेदांती मूल्यों की पुनर्प्रतिष्ठा। सारी ढलान अंततः गरिमा खो देती है। उर्वशी का सौन्दर्य पुरुरवा की अनुभूति में घुल कर विसरित हो जाता है − नीचे से ऊपर की ओर, धरती से स्वर्ग की ओर, मही से आकाश की ओर, मूर्तन से अमूर्तन की ओर :
अशरीरी कल्पना, देह धरने पर भी, आंखों से
रही झांकती सदा, सदा मुझको यह भान हुआ है,
बांहों में जिसको समेट कर उर से लगा रहा हूं,
रक्त मांस की मूर्ति नहीं, वह सपना है, छाया है।

छिपा नहीं देवत्व, रंच भर भी, इस मर्त्य वसन में,
देह ग्रहण करने पर भी तुम रहीं अदेह विभा सी।

यह ÷अदेह विभा' भारतीय पुरुष अध्यात्म का ध्येय रही है। ÷उर्वशी' इसी पुरुष अध्यात्म का रूमान है क्योंकि यहां देह में डूब कर, उसकी तरंगों के आवेग में बह कर ÷अदेह' तक पहुंचा गया है। ÷अदेह विभा' की चमक बिखेरने के लिए देह का तिरस्कार नहीं, बल्कि स्वीकार है। छायावादी सौन्दर्यबोध और राष्ट्र व परम्परा की शासकीय धारणाओं का अनुभागी होने के चलते दिनकर को इस ÷अदेह' के पुंसत्व ने बंधक बना रखा है। इस बंधन के बावजूद उन्होंने देह को साधने की कोशिश की है। दिनकर को जिस सांस्कृतिक काव्यधारा का कवि माना जाता है वह नयी कविता आंदोलन के समानांतर प्रवाहित हुई थी। नयी कविता का नया भावबोध देह की महत्ता को नये सिरे से परिभाषित कर रहा था। दिनकर नयी कविता के बाहर के कवि हैं, फिर भी नये भावबोध के असर को उन्होंने शिद्धत से महसूस किया। अतः यह उचित ही कहा गया है कि नयी कविता के बिना ÷उर्वशी' की कल्पना कठिन थी। विडम्बना यह है कि दिनकर के पिछड़े संस्कार नयी चेतना के साथ ज्यादा दूर तक नहीं जा पाये। देह धारण करने के बावजूद उनकी उर्वशी ÷अदेह' का ही गुणगान करती रही। दिनकर की काव्य भाषा भी देह के साथ उतनी सहज नहीं, जितनी कि ÷अदेह' के साथ। सबसे ध्यान देने योग्य यह है कि ÷उर्वशी' का काव्य देह से ÷अदेह' में संक्रमित हो जाता है, महज भावोच्छवास द्वारा। अतः ÷उर्वशी' वास्तविकता के किसी धरातल को तोड़ने के बजाए हवाई किले बनाने लगती है। ÷उर्वशी' का आरम्भ नारी सौन्दर्य के सम्बंध में जिस नयी संवेदना की उम्मीद जगाता है, उसका अंत नारीत्व की पिटी पिटायी सनातनी अवधारणा का साक्ष्य बनता है :
नारी क्रिया नहीं, वह केवल क्षमा, क्षांति, करुणा है।
इसीलिए, इतिहास पहुंचता जभी निकट नारी के,
हो रहता वह अचल या कि फिर कविता बन जाता है।

चलते चलते कुछ बातें दिनकर की उस टिप्पणी पर जो उन्होंने पुरुरवा उर्वशी के पुत्र आयु के सम्बंध में की है। वह ÷उर्वशी' की भूमिका में लिखते हैं :÷÷जब देवी सुकन्या यह सोचती है कि नर नारी के बीच संतुलन कैसे लाया जाए, तब उनके मुंह से यह बात निकल पड़ती है कि यह सृष्टि, वास्तव में, पुरुष की रचना है। इसलिए रयचिता ने पुरुषों के साथ पक्षपात किया, उन्हें स्वत्व हरण की प्रवृत्तियों से पूर्ण कर दिया। किन्तु, पुरुषों की रचना आदि नारियां करने लगें, तो पुरुष की कठोरता जाती रहेगी और वह अधिक भावप्रवण एवं मृदुलता से युक्त हो जाएगा।
÷÷इस पर आयु यह दावा करता है कि मैं ही तो वह पुरुष हूं, जिसका निर्माण नारियों ने कियाहै।
÷÷आयु का कहना ठीक था और वह प्रसिद्ध राजा भी हुआ, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में आया है। किन्तु उल्लेख इस बात का भी है कि युवक राजा सुश्रवा ने आयु को जीतकर उसे अपने अधीन कर लिया था।
÷÷फिर वही बात!
÷÷पुरुष की रचना पुरुष करे तो वह त्रासक होता है; और पुरुष की रचना नारी करे तो लड़ाई में वह हार जाता है।''
यह लम्बा उद्धरण दिनकर की पुरुष दृष्टि का परिचायक है। यह दृष्टि भूल जाती है आयु लड़ाई में इसलिए नहीं हारा, क्योंकि उसका निर्माण नारियों ने किया है। उसकी हार का कारण यह है कि अब तक की सृष्टि, वास्तव में, पुरुष की रचना है। पुरुषों की रचना यदि नारियां करने लगें तो धरती पर शायद युद्ध कभी हो ही नहीं। और अगर हो भी तो! कौन जाने वह जीतने के बजाए हारने के लिए ही लड़ा जाए! जीतना अप्रासंगिक हो जाए!

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अजब दुनिया है नाशायर यहाँ पर सर उठाते हैं
जो शायर हैं वो महफ़िल में दरी-
चादर उठाते हैं
तुम्हारे शहर में मय्यत को सब काँधा नहीं देते
हमारे गाँव में छप्पर भी सब मिल कर उठाते हैं
इन्हें फ़िरक़ापरस्ती मत सिखा देना कि ये बच्चे
ज़मीं से चूमकर तितली के टूटे पर उठाते हैं
समुन्दर के सफ़र से वापसी का क्या भरोसा है
तो ऐ साहिल, ख़ुदा हाफ़िज़ कि हम लंगर उठाते हैं

मुनव्वर राना की कविता की ये पंक्तियाँ मैंने स्याह-ब्लॉग पोस्ट पर पढ़ी। गूगल पर कुछ और सर्च करते करते मैं अचानक इस ब्लॉग पोस्ट तक पहुँच गई।
स्याह- यानी काला... बड़ा ही अजीब सा नाम है इस ब्लॉग पोस्ट का... शायद इसे यह नाम अपनी काली, लेकिन सुंदर पृष्ठभूमि की वजह से दिया है जिस पर सभी अक्षर स्पष्ट और सुंदर नज़र आते हैं।
खैर.. नाम में क्या रखा है। मैं आपको इस ब्लॉग पोस्ट के बारे में इसलिए बता रही हूँ क्योंकि मैंने यहाँ उर्दू और हिन्दी के कई नामचीन कवियों जैसे अली सरदार जाफ़री, गुलज़ार, गोपाल दास "नीरज", जावेद अख़्तर, नज़ीर अकबराबादी, निदा फ़ाज़ली, निदा फ़ाज़ली, फ़िराक़ गोरखपुरी, शहरयार आदि की बेहतरीन शायरी और कविताओं
को पाया।
अगर आप भी इन बेहतरीन शायरी और कविताओं को पढ़ना चाहतें हैं तो बस http://syaah.blogspot.com/ को इंटरनेट एक्सप्लोरर में कॉपी और पेस्ट करें और शायरी और कविताओं की एक नई दुनिया में कदम रखें।

रविवार, अगस्त 02, 2009

सुन सका कोई न जिस को वो सदा मेरी थी

सुन सका कोई न जिस को, वो सदा मेरी थी

मुन्फ़इल जिससे मैं रहता था, नवा मेरी थी


आख़िरे-शब के ठिठुरते हुए सन्नाटों से

नग़्मा बन कर जो उभरती थी, दुआ मेरी थी


खिलखिलाती हुई सुबहों का समाँ था उन का

ख़ून रोती हुई शामों की फ़िज़ा मेरी थी


मुद्दआ मेरा, इन अल्फ़ाज़ के दफ़्तर में न ढूँढ़

वही एक बात जो मैं कह न सका मेरी थी


मुंसिफे-शहर के दरबार में क्यूँ चलते हो

साहिबो मान गया मैं कि ख़ता मेरी थी


मुझ से बचकर वही चुपचाप सिधारा 'मख़्मूर'

हर तरफ़ जिस के तआक़ुब में सदा मेरी थी


शब्दार्थ :

मुन्फ़इल=लज्जित; नवा=आवाज़; आख़िरे-शब=रात का अन्तिम पहर; मुद्दआ=मंतव्य; मुंसिफ़े-शहर=नगर के न्यायाधीश; तआक़ुब=पीछा करना।

सामने ग़म की रहगुज़र आई

सामने ग़म की रहगुज़र आई

दूर तक रोशनी नज़र आई


परबतों पर रुके रहे बादल

वादियों में नदी उतर आई


दूरियों की कसक बढ़ाने को

साअते-क़ुर्ब मख़्तसर आई


दिन मुझे क़त्ल करके लौट गया

शाम मेरे लहू में तर आई


मुझ को कब शौक़े-शहरगर्दी थी

ख़ुद गली चल के मेरे घर आई


आज क्यूँ आईने में शक्ल अपनी

अजनबी-अजनबी नज़र आई


हम की 'मख़्मूर' सुबह तक जागे

एक आहट की रात भर आई


शब्दार्थ :

साअते-क़ुर्ब=सामीप्य का लक्षण; मुख़्तसर=संक्षिप्त; शौक़े-शहरगर्दी=नगर में घूमने का शौक़।

सर पर जो सायबाँ थे पिघलते हैं धूप में

सर पर जो सायबाँ थे पिघलते हैं धूप में

सब दम-ब-ख़ुद खड़े हुए जलते हैं धूप में


पहचानना किसी का किसी को, कठिन हुआ

चेहरे हज़ार रंग बदलते हैं धूप में


बादल जो हमसफ़र थे कहाँ खो गए कि हम

तन्हा सुलगती रेत प' जलते हैं धूप में


सूरज का क़हर टूट पड़ा है ज़मीन पर

मंज़र जो आसपास थे जलते हैं धूप में


पत्ते हिलें तो शाखों से चिंगारियाँ उड़ें

सर सब्ज़ पेड़ आग उगलते हैं धूप में


'मख़्मूर' हम को साए-ए-अब्रे-रवाँ से क्या

सूरजमुखी के फूल हैं, पलते हैं धूप में


शब्दार्थ :

सायबाँ=छाया करने वाले; दम-ब-ख़ुद=मौन; क़हर=प्रकोप; सब्ज़=हरे-भरे; साए-ए-अब्रे-रवाँ=गतिशील बादल की छाया।

वो हमसे ख़फ़ा था मगर इतना भी नहीं था

वो हमसे ख़फ़ा था मगर इतना भी नहीं था

यूँ मिल के बिछड़ जाएँ, कुछ ऎसा भी नहीं था


क्या दिल से मिटे अब ख़लिशे-तर्के-ताल्लुक़

कर गुज़रे वो हम जो कभी सोचा भी नहीं था


रस्ते से पलट आए हैं हम किसलिए आख़िर

उससे न मिलेंगे ये इरादा भी नहीं था


कुछ, हम भी अब इस दर्द से मानूस बहुत हैं

कुछ, दर्दे-जुदाई का मदावा भी नहीं था


सर फोड़ के मर जाएँ, यही राहे-मफ़र थी

दीवार में दर क्या कि दरीचा भी नहीं था


दिल ख़ून हुआ और ये आँखें न हुईं नम

सच है, हमे रोने का सलीक़ा भी नहीं था


इक शख़्स की आँखों में बसा रहता है 'मख़्मूर'

बरसों से जिसे मैंने तो देखा भी नहीं था


शब्दार्थ :

ख़लिशे-तर्के-ताल्लुक़=सम्बन्ध-विच्छेद होने की कसक; मानूस=परिचित; दर्दे-जुदाई=वियोग का दुख; मदावा=इलाज; राहे-मफ़र=भागने का रास्ता; दर= दरवाज़ा; दरीचा=खिड़की

भीड़ में है मगर अकेला है

भीड़ में है मगर अकेला है

उस का क़द दूसरों से ऊँचा है


अपने-अपने दुखों की दुनिया में

मैं भी तन्हा हूँ वो भी तन्हा है


मंज़िलें ग़म की तय नहीं होतीं

रास्ता साथ-साथ चलता है


साथ ले लो सिपर मौहब्बत की

उस की नफ़रत का वार सहना है


तुझ से टूटा जो इक तअल्लुक़ था

अब तो सारे जहाँ से रिश्ता है


ख़ुद से मिलकर बहुत उदास था आज

वो जो हँस-हँस के सबसे मिलता है


उस की यादें भी साथ छोड़ गईं

इन दिनों दिल बहुत अकेला है


शब्दार्थ :

तन्हा=अकेला; सिपर=ढाल।

बिखरते टूटते लम्हों को अपना समसफ़र जाना

बिखरते टूटते लम्हों को अपना समसफ़र जाना|
था इस राह में आख़िर हमें ख़ुद भी बिखर जाना|

हवा के दोश पर बादल के टुकड़े की तरह हम हैं,
किसी झोंके से पूछेंगे कि है हम को किधर जाना|

[दोश=कंधे]

मेरे जलते हुए घर की निशानी बस यही होगी,
जहाँ इस शहर में रौशनी देखो ठहर जाना|

पस-ए-ज़ुल्मत कोई सूरज हमारा मुन्तज़िर होगा,
इसी एक वहम को हम ने चिराग़-ए-रह्गुज़र जाना|

[पस-ए-ज़ुल्मत= अन्धेरे के आगे; मुन्तज़िर=इंतज़ार करता हुआ]

दयार-ए-ख़ामोशी से कोई रह-रह कर बुलाता है,
हमें "मख्मूर" एक दिन है इसी आवाज़ पर जाना|

[दयार-ए-ख़ामोशी=मौत का घर]

पार करना है नदी को तो उतर पानी में

पार करना है नदी को तो उतर पानी में

बनती जाएगी ख़ुद एक राहगुज़र पानी में


ज़ौक़े-तामीर था हम ख़ानाख़राबों का अजब

चाहते थे कि बने रेत का घर पानी में


सैले-ग़म आँखों से सब-कुछ न बहा ले जाए

डूब जाए न ये ख़्वाबों का नगर पानी में


कश्तियाँ डूबने वालों के तजस्सुस में न जाएँ

रह गया कौन, ख़ुदा जाने किधर पानी में


अब जहाँ पाँव पड़ेगा यही दलदल होगी

जुस्तजू ख़ुश्क ज़मीनों की न कर पानी में


मौज-दर-मौज, यही शोर है तुग़यानी का

साहिलों की किसे मिलती है ख़बर पानी में


ख़ुद भी बिखरा वो, बिखरती हुई हर लहर के साथ

अक्स अपना उसे आता था नज़र पानी में


शब्दार्थ :

राहगुज़र=रास्ता; ज़ौक़े-तामीर=निर्माण की रुचि, ख़ानाख़राब=बेघरबार; सैले-ग़म=दुख की बाढ़; तजस्सुस=खोज; जुस्तजू=तलाश; ख़ुश्क=शुष्क; मौज-दर-मौज=लहर पर लहर; तुग़यानी=तूफ़ान; साहिल=किनारा; अक्स=बिम्ब।

न रास्ता न कोई डगर है यहाँ

न रास्ता न कोई डगर है यहाँ|
मगर सब की क़िस्मत सफ़र है यहाँ|

सुनाई न देगी दिलों की सदा,
दिमाग़ों में वो शोर-ओ-शर है यहाँ|

हवाओं की उँगली पकड़ कर चलो,
वसिला इक यही मोतबर है यहाँ|

न इस शहर-ए-बेहिस को सेहरा कहो,
सुनो इक हमारा भी घर है यहाँ|

पलक भी झपकते हो "मख्मूर" क्यूँ,
तमाशा बहुत मुख़्तसर है यहाँ|

जहाँ मैं जाऊँ हवा का यही इशारा हो

जहाँ मैं जाऊँ हवा का यही इशारा हो|
कोई नहीं जो यहाँ मुन्तज़िर तुम्हारा हो|

मेरी बुझती हुई आँखों को रौशनी बख़्शे,
वो फूल जो तेरे चेहरे का इस्त'अरा हो|

चला हूँ अपनी ही आवाज़-ए-बाज़्गश्त पे यूँ,
किसी ने दूर से जैसे मुझे पुकारा हो|

गँवा चुके कई उम्रें उम्मीद्वार तेरे,
कहाँ तक और तेरी बेरुख़ी गवारा हो|

तू पास आते हुये मुझ से दूर हो जाये,
अजब नहीं कि यही हादसा दोबारा हो|

नज़र फ़रेबी-ए-रंग-ए-चमन से बच 'मख्मूर',
जिसे तू फूल समझ ले कहीं शरारा हो|

अपना यही है सहन यही सायबान है

अपना यही है सहन यही सायबान है

फैली हुई ज़मीन खुला आस्मान है


चारो तरफ़ हवा की लचकती कमान है

ये शाख से परिन्द की पहली उड़ान है


जो चल पड़े हैं कश्ती-ए-मौजे-रवाँ लिए

चादर हवा की उनके लिए बादबान है


क़ुर्बत की साअतों में भी कुछ दूरियाँ-सी हैं

साया किसी का उन के मिरे दर्मियान है


आँखों में तिरे ख़्वाब न दिल में तिरा ख़याल

अब मेरी ज़िन्दगी कोई ख़ाली मकान है


'मख़्मूर' इस सफ़र में न साया तलाश कर

इन रास्तों पे धूप बहुत मेहरबान है


शब्दार्थ :

सहन=आँगन; सायबान=छप्पर; कश्ती-ए-मौजे-रवाँ=बहते हुए पानी की लहर की नाव; बादबान=पाल; क़ुर्बत=सामीप्य; साअतों=क्षणों।

चल पड़े हैं तो कहीं जाकर ठहरना होगा

चल पड़े हैं तो कहीं जा के ठहरना होगा

ये तमाशा भी किसी दिन हमें करना होगा


रेत का ढेर थे हम, सोच लिया था हम ने

जब हवा तज़ चलेगी तो बिखरना होगा


हर नए मोड़ प' ये सोच क़दम रोकेगी

जाने अब कौन सी राहों से गुज़रना होगा


ले के उस पार न जाएगी जुदा राह कोई

भीड़ के साथ ही दलदल में उतरना होगा


ज़िन्दगी ख़ुद ही इक आज़ार है जिस्मो-जाँ का

जीने वालों को इसी रोग में मरना होगा


क़ातिले-शहर के मुख़बिर दरो-दीवार भी हैं

अब सितमगर उसे कहते हुए डरना होगा


आए हो उसकी अदालत में तो 'मख़्मूर' तुम्हें

अब किसी जुर्म का इक़रार तो करना होगा