सोमवार, मई 11, 2009

मन बैराग

मन बैरागी, तन अनुरागी, कदम-कदम दुशवारी है
जीवन जीना सहल न जानो बहुत बड़ी फनकारी है



औरों जैसे होकर भी हम बा-इज़्ज़त हैं बस्ती में
कुछ लोगों का सीधापन है, कुछ अपनी अय्यारी है



जब-जब मौसम झूमा हम ने कपड़े फाड़े शोर किया
हर मौसम शाइस्ता रहना कोरी दुनियादारी है



ऐब नहीं है उसमें कोई, लाल परी न फूल गली
यह मत पूछो, वह अच्छा है या अच्छी नादारी



जो चेहरा देखा वह तोड़ा, नगर-नगर वीरान किए
पहले औरों से नाखुश थे अब खुद से बेज़ारी है।

एक लुटी हुई बस्ती की कहानी

बजी घंटियाँ
ऊँचे मीनार गूँजे
सुन्हेरी सदाओं ने
उजली हवाओं की पेशानियों की



रहमत के
बरकत के
पैग़ाम लिक्खे—
वुजू करती तुम्हें
खुली कोहनियों तक
मुनव्वर हुईं—
झिलमिलाए अँधेरे
--भजन गाते आँचल ने
पूजा की थाली से
बाँटे सवेरे
खुले द्वार !
बच्चों ने बस्ता उठाया
बुजुर्गों ने—
पेड़ों को पानी पिलाया
--नये हादिसों की खबर ले के
बस्ती की गलियों में
अख़बार आया
खुदा की हिफाज़त की ख़ातिर
पुलिस ने
पुजारी के मन्दिर में
मुल्ला की मस्जिद में
पहरा लगाया।



खुद इन मकानों में लेकिन कहाँ था
सुलगते मुहल्लों के दीवारों दर में
वही जल रहा था जहाँ तक धुवाँ था

बैसाखियाँ

(एक वियतनामी जोड़े की तस्वीर देखकर)
आओ हम-तुम
इस सुलगती खामुशी में
रास्ते की
सहमी-सहमी तीरगी में
अपने बाजू, अपनी सीने, अपनी आँखें
फड़फड़ाते होंठ
चलती-फिरती टाँगें
चाँद के अन्धे गढ़े में छोड़ जाएँ



कल
इन्हीं बैसाखियों पर बोझ साधे
सैकड़ों जख़्मों से चकनाचूर सूरज
लड़खड़ाता,
टूटता
मजबूर सूरज
रात की घाटी से बाहर आ सकेगा
उजली किरणों से नई दुनिया रचेगा
आओ
हम !
तुम !

बूढ़ा मलबा

हर माँ
अपनी कोख से
अपने शौहर को जन्मा करती है
मैं भी अब
अपने कन्धों से
बूढ़े मलवे को ढो-ढो कर
थक जाऊँगा
अपनी महबूबा के
कुँवारे गर्भ में
छुप कर सो जाऊँगा।

देखा गया हूँ

देखा गया हूँ मैं कभी सोचा गया हूँ मैं
अपनी नज़र में आप तमाशा रहा हूँ मैं



मुझसे मुझे निकाल के पत्थर बना दिया
जब मैं नहीं रहा हूँ तो पूजा गया हूँ मैं



मैं मौसमों के जाल में जकड़ा हुआ दरख़्त
उगने के साथ-साथ बिखरता रहा हूँ मैं



ऊपर के चेहरे-मोहरे से धोखा न खाइए
मेरी तलाश कीजिए, गुम हो गया हूँ मैं

मौत की नहर

प्यार, नफ़रत, दया, वफ़ा एहसान
क़ौम, भाषा, वतन, धरम, ईमान
उम्र गोया...
चट्टान है कोई
जिस पर इन्सान कोहकन की तरह
मौत की नहर....
खोदने के लिए,
सैकड़ों तेशे
आज़माता है
हाथ-पाँव चलाये जाता है

सिखा देती है चलना

सिखा देती है चलना ठोकरें भी राहगीरों को
कोई रास्ता सदा दुशवार हो ऐसा नहीं होता



कहीं तो कोई होगा जिसको अपनी भी ज़रूरत हो
हरेक बाज़ी में दिल की हार हो ऐसा नहीं होता

ऐसा नहीं होता

जो हो इक बार, वह हर बार हो ऐसा नहीं होता
हमेशा एक ही से प्यार हो ऐसा नहीं होता



हरेक कश्ती का अपना तज्रिबा होता है दरिया में
सफर में रोज़ ही मंझदार हो ऐसा नहीं होता



कहानी में तो किरदारों को जो चाहे बना दीजे
हक़ीक़त भी कहानी कार हो ऐसा नहीं होता

सोचने बैठे जब भी उसको

सोचने बैठे जब भी उसको
अपनी ही तस्वीर बना दी



ढूँढ़ के तुझ में, तुझको हमने
दुनिया तेरी शान बढ़ा दी

जब भी दिल ने दिल को सदा दी

जब भी दिल ने दिल को सदा दी
सन्नाटों में आग लगा दी...



मिट्टी तेरी, पानी तेरा
जैसी चाही शक्ल बना दी



छोटा लगता था अफ्साना
मैंने तेरी बात बढ़ा दी

यह बात तो गलत है

कोई किसी से खुश हो और वो भी बारहा हो
यह बात तो गलत है
रिश्ता लिबास बन कर मैला नहीं हुआ हो
यह बात तो गलत है



वो चाँद रहगुज़र का, साथी जो था सफर का
था मोजिज़ा नज़र का
हर बार की नज़र से रौशन वह मोजिज़ हो
यह बात तो गलत है



है बात उसकी अच्छी, लगती है दिल को सच्ची
फिर भी है थोड़ी कच्ची
जो उसका हादिसा है मेरा भी तजरुबा हो
यह बात तो गलत है



दरिया है बहता पानी, हर मौज है रवानी
रुकती नहीं कहानी
जितना लिखा गया है उतना ही वाकिआ हो
यह बात तो ग़लत है



वे युग है कारोबरी, हर शय है इशतहारी
राजा हो या भिखारी
शोहरत है जिसकी जितनी, उतना ही मर्तवा हो
यह बात तो गलत है

गुरुवार, मई 07, 2009

'भंवर में ज़िंदगी !' - सौरभ कुणाल

हम गुनगुनाते हैं आजकल
बस तेरी ही बातें
तेरी याद मे कटती है
अक्सर हमारी रातें।
क्या करूं मैं
समझ नहीं आता
आंखों से तेरा चेहरा
हटा नहीं पाता।
याद आती है रह-रह के
तेरी वो मुलाकातें
मेरे हाथों में तेरा हाथ
वो खामोश रातें।
तेरी हस्ती दिल से
मिटा नहीं पाता
अपनी आंखें ज़माने को
दिखा नहीं पाता।
चंद सांसों की मोहलत दो
तेरी यादों से दूर जाऊं
ऐ वख्त ! ले चल वहां
जहां खुद को मैं भूल जाऊं।
अब आ जा ऐ रात !
जीवन की शाम ढल चुकी
मेरी खामोश ज़िंदगी की
दीप अब बुझ चुकी।
कि खो गए हैं हम
सहमी हुई नज़र में
डूबा है मन
अनजान भंवर में।

'बर्बादी का हक' - सौरभ कुणाल

हक रखता हूं
तुझे बर्बाद करने का
प्यार भी तो तुझसे
हमीं ने किया था।
ज़माने से जब तुम्हें
मिली थी ठोकरें
स्वीकार भी तो तुझे
हमीं ने किया था।
ये क्या फलसफा है
मेरी ज़िंदगी का
ये क्या आरजू है
मेरी दोस्ती का !
कहां से चला था
कहां आ गया हूं
तेरी ज़िंदगी से
चला जा रहा हूं।
मेरी सांसों में कोई
सिमट सी गई
मेरी आंखों में कोई
नमी भी नहीं।
भूली सी बातें
उलझ सी गई हैं
सहमी हुई सांसें
खामोश हो गई हैं।
खोए से दिल में
कसक सी जगी है
यादों की चिनगारी
आग बन गई है।
भरी महफिल में
बदनाम हो गया हूं
नाम रखकर भी
गुमनाम हो गया हूं।

'शुक्रिया' - सौरभ कुणाल

शुक्रिया तेरी बात को
उस रात को शुक्रिया
उलझी हुई सांसों के
हालात को शुक्रिया।
खोया हूं मैं
तेरे रूप प्रकाश में
कुछ खोई हुई सी
मेरी सांस है।
वादियों में फैले
तेरे मधुर संगीत में
कुछ खोई हुई सी
मेरी आवाज़ है।
जिनकी खातिर जहां में
मैं हूं आज ज़िंदा
तनहाई से पल में
उनके साथ को शुक्रिया।
शुक्रिया तेरी बात को
उस हालात को शुक्रिया।

'मेरी ज़िंदगी की दीप' - सौरभ कुणाल

एक दीप जल रही
मेरी ज़िंदगी की
कभी मद्धम, कभी तेज़
रह रह के भभक रही
कभी दम तोड़ के उठ रही
मेरी ज़िंदगी की दीप जल रही।
दम तोड़ती
दिल के अपेक्षाओं से
कभी बुझती
सांसों की लहरों से
ये दीप ।
आशाओं के भंवर में
अनजानों के शहर में
कभी दबी चाहतों के तेल में
ये दीप धीमे से जल रही
मेरी ज़िंदगी की दीप जल रही।

'मैने सांस लेना छोड़ दिया' - सौरभ कुणाल

हुई है जबसे ये हालत मेरी
मैने विश्वास करना छोड़ दिया
लौटा हूं जबसे हर दर से तनहा
मैने आस लगाना छोड़ दिया।

जलाता हूं विश्वास का आज भी दिया
मगर दिल में मेरे रोशनी नहीं होती
बढ़ाता हूं राहों पे आज भी कदम
मगर सफर है कि मेरी पूरी नहीं होती।

लगाया है जब से फरेब को दिल से
मैने दोस्त बनाना छोड़ दिया
खाया है जबसे नज़र का धोखा
मैने प्यार जताना छोड़ दिया।

करता हूं लोगों से आजमी बातें, पर
निगाहों की खामोशी मिटा नहीं सकता
छुपाता हूं आज भी दिल का दर्द
मगर आंखों के आंसू छुपा नहीं सकता।

टूटा है जबसे मेरा हर ख्वाब
मैने उम्मीद लगाना छोड़ दिया
जब से उठा भगवान से विश्वास
मैने पूजा करना छोड़ दिया।

अब अंधेरा ही दिन है
अंधेरी है रातें
अब अंधेरों से ही करता हूं
दिल की बातें।

अब है न कोई रास्ता
न मेरी कोई मंज़िल
मुझमें है खामोशी
मैं खामोशी में शामिल।

छोड़ा है जबसे किसी ने मेरा साथ
मैने हाथ बढ़ाना छोड़ दिया
उठा है जबसे इंसां से निश्वास
मैने सांस लेना छोड़ दिया।

'मेरी गलियों में आज तुम आओगे' - सौरभ कुणाल

आज जलाया है चिराग हमने
कि मेरी गलियों में आज तुम आओगे
आज धोया है अश्क हमने
कि मेरी गलियों में आज तुम आओगे।

तेरे इंतज़ार में
सुबह से शाम हुई
राह तकती मेरी निगाहें
आज फिर बदनाम हुई।

मिटाई है मैने दिल की खामोशी
कि मेरी गलियों में आज तुम आओगे
आज छुपाई है मन की बेबसी
कि मेरी गलियों में आज तुम आओगे।

गलियों में फिर आज
हर आहट तेरी लगी है
वक्त भी न जाने
क्यों सहमा हुआ है।

आज भुलाई है हर बात हमने
कि मेरी गलियों में आज तुम आओगे
आज दबाया है हर जज्बात हमने
कि मेरी गलियों में आज तुम आओगे।

'मेरी प्रेयसी' - सौरभ कुणाल

ग़र चाहूं तेरे पास आना
तुम दूर चले जाना
ग़र चाहूं तुम्हें बुलाना
तुम पास कभी न आना।

मेरे लिए तुम हो कोई
दीवानों की ख्वाब सी
खामोश मन से निकली हुई
कविताओं की मेरी प्रेयसी।

ग़र गुजरूं कभी तेरी गलियों से
और सुन ले मेरे कदमों की आहट
मिल जाए जो निगाहें मुझसे
ठुकराकर मेरी निगाहों की चाहत।

मेरी बेकरार सी आंखों से
तुम निगाहें चुरा लेना
याद भी करूं ग़र तुम्हें
तुम मुझे भूल जाना।

मेरे लिए तुम हो कोई
आसमां की चांद सी
यादों में विचरती हुई
मेरे स्वप्नलोक की रूपसी।।

'मुझे कुछ हो सा गया है' - सौरभ कुणाल

बहुत परेशां हूं मैं आज
मेरा कुछ खो सा गया है
कदम भी लड़खड़ा रहे हैं
मुझे कुछ हो सा गया है।

होठों से निकले शब्द
हैं अटपटे से
राहों पे बढ़ते कदम
कुछ अनमने से।

बहुत हैरान हूं मैं आज
दिल भी सो सा गया है
बहुत परेशां हूं मैं आज
मुझे कुछ हो सा गया है।

हलक से शब्द भी न निकल रहे
निगाहें भी कुछ बातें नहीं करती
दिल में दर्द का गुबार तो है
मगर आंखों से आंसू नहीं बहते।

निगाहों में बसी तस्वीर
ओझल सी हो गई है
खामोश काली रातें
अब लंबी हो गई हैं।

खामोश धड़कनों ने एक बात कही
उसे मैं सुन नहीं सकता
क्या करूं उसे छूने की कोशिश
जिसे मैं देख नहीं सकता।

क्या करूं देखकर आइना
अक्स भी गुम सा गया है
बहुत परेशां हूं मैं आज
मुझे कुछ हो सा गया है।

बुधवार, मई 06, 2009

'जीवन' - सौरभ कुणाल

जीवन - एक प्रयोग
एक सफर
एक विश्वास, एक उम्मीद
कुछ रंग
कोई साज, कोई गीत
ज़िंदगी - एक संगीत।

जीवन - एक सफर
एक उमंग
मन के उठते विचारों की तरंग।

जीवन - एक पहेली
कुछ अनसुलझी बात
कभी प्रकाशतीत
कभी अंधेरी रात।

सिर्फ आगे बढ़ते जाना
नाम नहीं ज़िंदगी का
हर रंगों में रंगते जाना
मुकाम है ज़िंदगी का।

जीवन कोई मुकाम नहीं
एक अनजान रंग है
एक अलग आयाम है
विचारों का मंच है।

जीवन विचारों की सुनियोजित श्रृंखला
विचारों का आदान-प्रदान
जीवन विचारों का अतिक्रमण नहीं
विचारों का खुला संसार।।