गुरुवार, फ़रवरी 18, 2010

कौन इस राह से गुज़रता है

कौन इस राह से गुज़रता है
दिल यूँ ही इंतज़ार करता है

देख कर भी न देखने वाले
दिल तुझे देख-देख डरता है

शहर-ए-गुल में कटी है सारी रात
देखिये दिन कहाँ गुज़रता है

ध्यान की सीढ़ियों पे पिछले पहर
कोई चुपके से पाँव धरता है

दिल तो मेरा उदास है "नासिर"
शहर क्यों सायँ-सायँ करता है

कुछ यादगार-ए-शहर-ए-सितमगर ही ले चलें

कुछ यादगार-ए-शहर-ए-सितमगर ही ले चलें
आये हैं इस गली में तो पत्थर ही ले चलें



यूँ किस तरह कटेगा कड़ी धूप का सफ़र
सर पर ख़याल-ए-यार की चादर ही ले चलें



रंज-ए-सफ़र की कोई निशानी तो पास हो
थोड़ी सी ख़ाक-ए-कूचा-ए-दिलबर ही ले चलें



ये कह के छेड़ती है हमें दिलगिरफ़्तगी
घबरा गये हैं आप तो बाहर ही ले चलें



इस शहर-ए-बेचराग़ में जायेगी तू कहाँ
आ ऐ शब-ए-फ़िराक़ तुझे घर ही ले चलें

कुछ तो एहसास-ए-ज़ियाँ था पहले

कुछ तो एहसास-ए-ज़ियाँ था पहले
दिल का ये हाल कहाँ था पहले

अब तो मन्ज़िल भी है ख़ुद गर्म-ए-सफ़र
हर क़दम संग-ए-निशाँ था पहले

सफ़र-ए-शौक़ के फ़रसंग न पूछ
वक़्त बेक़ैद-ए-मकाँ था पहले

ये अलग बात कि ग़म रास है अब
इस में अंदेशा-ए-जाँ था पहले

यूँ न घबराये हुये फिरते थे
दिल अजब कुंज-ए-अमाँ था पहले

अब भी तू पास नहीं है लेकिन
इस क़दर दूर कहाँ था पहले

डेरे डाले हैं बगुलों ने जहाँ
उस तरफ़ चश्म-ए-रवाँ था पहले

अब वो दरिया न बस्ती न वो लोग
क्या ख़बर कौन कहाँ था पहले

हर ख़राबा ये सदा देता है
मैं भी आबाद मकाँ था पहले

क्या से क्या हो गई दुनिया प्यारे
तू वहीं पर है जहाँ था पहले

हम ने आबाद किया मुल्क-ए-सुख़न
कैसा सुनसान समाँ था पहले

हम ने बख़्शी है ख़मोशी को ज़ुबाँ
दर्द मजबूर-ए-फ़ुग़ाँ था पहले

हम ने रोशन किया मामूर-ए-ग़म
वरना हर सिम्त धुआँ था पहले

ग़म ने फिर दिल को जगाया "नासिर"
ख़ानाबरबाद कहाँ था पहले

किसे देखें कहाँ देखा न जाये

किसे देखें कहाँ देखा न जाये
वो देखा है जहाँ देखा न जाये

मेरी बरबादियों पर रोने वाले
तुझे महव-ए-फुगाँ देखा न जाये

सफ़र है और गुरबत का सफ़र है
गम-ए-सद-कारवाँ देखा न जाये

कहीं आग और कहीं लाशों के अंबार
बस ऐ दौर-ए-ज़मीँ देखा न जाये

दर-ओ-दीवार वीराँ, शमा मद्धम
शब-ओ-गम का सामाँ देखा न जाये

पुरानी सुहब्बतें याद आती है
चरागों का धुआँ देखा न जाये

भरी बरसात खाली जा रही है
सराबर-ए-रवाँ देखा न जाये

कहीं तुम और कहीं हम, क्या गज़ब है
फिराक-ए-जिस्म-ओ-जाँ देखा न जाये

वही जो हासिल-ए-हस्ती है नासिर
उसी को मेहरबाँ देखा न जाये

किसी कली ने भी देखा न

किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे
गुज़र गई जरस-ए-गुल उदास कर के मुझे

मैं सो रहा था किसी याद के शबिस्ताँ में
जगा के छोड़ गये क़ाफ़िले सहर के मुझे

मैं रो रहा था मुक़द्दर की सख़्त राहों में
उड़ा के ले गया जादू तेरी नज़र का मुझे

मैं तेरी दर्द की तुग़ियानियों में डूब गया
पुकारते रहे तारे उभर-उभर के मुझे

तेरे फ़िराक़ की रातें कभी न भूलेंगी
मज़े मिले इन्हीं रातों में उम्र भर के मुझे

ज़रा सी देर ठहरने दे ऐ ग़म-ए-दुनिया
बुला रहा है कोई बाम से उतर के मुझे

फिर आज आई थी इक मौज-ए-हवा-ए-तरब
सुना गई है फ़साने इधर-उधर के मुझे

कितना काम करेंगे

कितना काम करेंगे
अब आराम करेंगे



तेरे दिये हुए दुख
तेरे नाम करेंगे



अहल-ए-दर्द ही आख़िर
ख़ुशियाँ आम करेंगे



कौन बचा है जिसे वो
ज़ेर-ए-दाम करेंगे



नौकरी छोड़ के "नासिर"
अपना काम करेंगे

करता उसे बेकरार कुछ देर

करता उसे बेकरार कुछ देर
होता अगर इख्तियार कुछ देर



क्या रोयें फ़रेब-ए-आसमाँ को
अपना नहीं ऐतबार कुछ देर



आँखों में कटी पहाड़ सी रात
सो जा दिल-ए-बेक़रार कुछ देर



ऐ शहर-ए-तरब को जाने वालों
करना मेरा इंतजार कुछ देर



बेकैफी-ए-रोज़-ओ-शब मुसलसल
सरमस्ती-ए-इंतज़ार कुछ देर



तकलीफ-ए-गम-ए-फिराक दायम
तकरीब-ए-विसाल-ए-यार कुछ देर



ये गुंचा-ओ-गुल हैं सब मुसाफिर
है काफिला-ए-बहार कुछ देर



दुनिया तो सदा रहेगी नासिर
हम लोग हैं यादगार कुछ देर

आराइश-ए-ख़याल भी हो

आराइश-ए-ख़याल भी हो दिलकुशा भी हो
वो दर्द अब कहाँ जिसे जी चाहता भी हो



ये क्या के रोज़ एक सा ग़म एक सी उम्मीद
इस रंज-ए-बेख़ुमार की अब इंतहा भी हो



ये क्या के एक तौर से गुज़रे तमाम उम्र
जी चाहता है अब कोई तेरे सिवा भी हो



टूटे कभी तो ख़्वाब-ए-शब-ओ-रोज़ का तिलिस्म
इतने हुजूम में कोई चेहरा नया भी हो



दीवानगी-ए-शौक़ को ये धुन है इन दिनों
घर भी हो और बे-दर-ओ-दीवार सा भी हो



जुज़ दिल कोई मकान नहीं दहर में जहाँ
रहज़न का ख़ौफ़ भी न रहे दर खुला भी हो



हर ज़र्रा एक महमील-ए-इब्रत है दश्त का
लेकिन किसे दिखाऊँ कोई देखता भी हो



हर शय पुकारती है पस-ए-पर्दा-ए-सुकूत
लेकिन किसे सुनाऊँ कोई हमनवा भी हो



फ़ुर्सत में सुन शगुफ़्तगी-ए-ग़ुंचा की सदा
ये वो सुख़न नहीं जो किसी ने कहा भी हो



बैठा है एक शख़्स मेरे पास देर से
कोई भला-सा हो तो हमें देखता भी हो



बज़्म-ए-सुख़न भी हो सुख़न-ए-गर्म के लिये
ताऊस बोलता हो तो जंगल हरा भी हो

आज तो बेसबब उदास है जी

आज तो बेसबब उदास है जी
इश्क़ होता तो कोई बात भी थी



जलता फिरता हूँ क्यूँ दो-पहरों में
जाने क्या चीज़ खो गई मेरी



वहीं फिरता हूँ मैं भी ख़ाक बसर
इस भरे शहर में है एक गली



छुपता फिरता है इश्क़ दुनिया से
फैलती जा रही है रुसवाई



हमनशीं क्या कहूँ के वो क्या है
छोड़ ये बात नींद उड़ने लगी



आज तो वो भी कुछ ख़ामोश सा था
मैं ने भी उस से कोई बात न की



एक दम उस के हाथ चूम लिये
ये मुझे बैठे-बैठे क्या सूझी



तू जो इतना उदास है "नासिर"
तुझे क्या हो गया बता तो सही

अपनी धुन में रहता हूँ

अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ



ओ पिछली रुत के साथी
अब के बरस मैं तन्हा हूँ



तेरी गली में सारा दिन
दुख के कंकर चुनता हूँ



मुझ से आँख मिलाये कौन
मैं तेरा आईना हूँ



मेरा दिया जलाये कौन
मैं तेरा ख़ाली कमरा हूँ



तू जीवन की भरी गली
मैं जंगल का रस्ता हूँ



अपनी लहर है अपना रोग
दरिया हूँ और प्यासा हूँ



आती रुत मुझे रोयेगी
जाती रुत का झोंका हूँ

रौनकें थीं जहाँ में क्या-क्या कुछ

रौनकें थीं जहाँ में क्या-क्या कुछ
लोग थे रफ़्तगाँ में क्या-क्या कुछ



अबकी फ़स्ल-ए-बहार से पहले
रंग थे गुलसिताँ में क्या-क्या कुछ



क्या कहूँ अब तुम्हें खिज़ाँ वालो
जल गया आशियाँ में क्या-क्या कुछ



दिल तिरे बाद सो गया वरना
शोर था इस मकाँ में क्या-क्या कुछ

क़हर से देख न हर आन मुझे

क़हर से देख न हर आन मुझे
आँख रखता है तो पहचान मुझे



यकबयक आके दिखा दो झमकी
क्यों फिराते हो परेशान मुझे



एक से एक नयी मंजिल में
लिए फिरता है तिरा ध्यान मुझे



सुन के आवाज-ए-गुल कुछ न सुना
बस उसी दिन से हुए कान मुझे



जी ठिकाने नहीं जब से ‘नासिर’
शहर लगता है बयाबान मुझे

ख़त्म हुआ तारों का राग

ख़त्म हुआ तारों का राग
जाग मुसाफ़िर अब तो जाग



धूप की जलती तानों से
दश्त-ए-फ़लक1 में लग गई आग



दिन का सुनहरा नग्मा सुनकर
अबलक़-ए-शब2 ने मोड़ी बाग



कलियाँ झुलसी जाती हैं
सूरज फेंक रहा है आग



ये नगरी अँधियारी है
इस नगरी से जल्दी भाग

रंग बरसात ने भरे कुछ तो

रंग बरसात ने भरे कुछ तो
ज़ख़्म दिल के हुए हरे कुछ तो



फुर्सत-ए-बेखुदी1 ग़नीमत है
गर्दिशें हो गयीं परे कुछ तो



कितने शोरीदा-सर2 थे परवाने
शाम होते ही जल मरे कुछ तो



ऐसा मुश्किल नहीं तिरा मिलना
दिल मगर जुस्तजू करे कुछ तो



आओ ‘नासिर’ कोई ग़ज़ल छेड़ें
जी बहल जाएगा अरे कुछ तो

पहुँचे गोर किनारे हम

पहुँचे गोर किनारे हम
बस ग़म-ए-दौराँ हारे हम



सब कुछ हार के रस्ते में
बैठ गए दुखियारे हम



हर मंजिल से गुज़रे हैं
तेरे ग़म के सहारे हम



देख ख़याल-ए-ख़ातिर-ए-दोस्त
बाज़ी जीत के हारे हम



आँख का तारा आँख में है
अब न गिनेंगे तारे हम

आँखों में हैं दुख भरे फ़साने

आँखों में हैं दुख भरे फ़साने
रोने के फिर आ गये ज़माने



फिर दर्द ने आज राग छेड़ा
लौट आये वही समय पुराने



फिर चाँद को ले गयीं हवाएँ
फिर बाँसुरी छेड़ दी सबा ने



रस्तों में उदास खुशबुओं के
फूलों ने लुटा दिये ख़जाने

कौन इस राह से गुज़रता है

कौन इस राह से गुज़रता है
दिल यूँ ही इंतज़ार करता है

देख कर भी न देखने वाले
दिल तुझे देख-देख डरता है

शहर-ए-गुल में कटी है सारी रात
देखिये दिन कहाँ गुज़रता है

ध्यान की सीढ़ियों पे पिछले पहर
कोई चुपके से पाँव धरता है

दिल तो मेरा उदास है "नासिर"
शहर क्यों सायँ-सायँ करता है

जब से देखा है तिरे हाथ का चांद

जब से देखा है तिरे हाथ का चांद
मैंने देखा ही नहीं रात का चांद



जुल्फ़-ए-शबरंग के सद राहों में
मैंने देखा है तिलिस्मात का चांद



रस कहीं, रूप कहीं, रंग कहीं
एक जादू है ख़यालात का चांद

इश्क़ में जीत हुई या मात

इश्क़ में जीत हुई या मात
आज की रात न छेड़ ये बात



यूँ आया वो जान-ए-बहार
जैसे जग में फैले बात



रंग, खुले सहरा2 की धूप
ज़ुल्फ़ घने जंगल की रात



कुछ न सुना और कुछ न कहा
दिल में रह गयी दिल की बात



यार की नगरी कोसों दूर
कैसे कटेगी भारी रात



बस्ती वालों से छुपकर
रो लेते हैं पिछली रात



सन्नाटों में सुनते हैं
सुनी-सुनाई कोई बात

होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी

होती है तेरे नाम से वहशत कभी-कभी
बरहम हुई है यूँ भी तबीयत कभी-कभी

ऐ दिल किसे नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िन्दगी में ये राहत कभी-कभी

तेरे करम से ऐ अलम-ए-हुस्न-ए-आफ़रीन
दिल बन गया है दोस्त की ख़िल्वत कभी-कभी

दिल को कहाँ नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िन्दगी में ये राहत कभी-कभी

जोश-ए-जुनूँ में दर्द की तुग़यानियों के साथ
अश्कों में ढल गई तेरी सूरत कभी-कभी

तेरे क़रीब रह के भी दिल मुतमईन न था
गुज़री है मुझ पे भी ये क़यामत कभी-कभी

कुछ अपना होश था न तुम्हारा ख़याल था
यूँ भी गुज़र गई शब-ए-फ़ुर्क़त कभी-कभी

ऐ दोस्त हम ने तर्क-ए-मुहब्बत के बावजूद
महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी-कभी