आप भी हो एक इंसान
जो करते हो शिक्षा दान
आपके प्रयासों से बनते हैं हम महान
अंधेरे जीवन में
आप प्रकाश भर देते हो
तभी तो, अपना
भाई, शिष्य, मित्र भी बनाते हो
जब भी निराश होता हूं जीवन से
उस मझधार से निकलने की राह बताते हो
सही और ग़लत का भेद समझाते हो
क्योंकि
हम हैं आज जहां पर
कल था कोई और
कल होगा भी कोई और
जिसे आप
सही मार्ग दिखाओगे
मंजिल तक पहुंचाओगे
तभी तो
भगवान से भी ऊंची पदवी पाकर
आप गुरू कहलाओगे...
बुधवार, अप्रैल 15, 2009
यह तो एक सिलसिला है.... सौरभ कुणाल
प्यार की मन:स्थिति - सौरभ कुणाल
प्यारी सी सुबह की ग़रम-ग़रम चाय
लगने लगी है अब फीकी
रात की चैन भरी नींद
अब लगती है हल्की।।
चाहत है आपसे जुड़ने की
आपके नाम को पाने की
मन की भांति मिटाकर
रिश्तों को जीतने की।।
चाहता हूं विश्वास दिलाना
ख़ुद से एक नाम को जोड़ना
प्रीत को बढ़ाकर
आपको अपनी ओर मोड़ना।।
लक्ष्य तो निश्चित कर चुका
कर्म की है चाहत
मंजिल तक पहुंचकर ही
मुझे मिलेगी राहत।।
न है मेरी आदत
चांदी के जूते मारना
और न ही चाहता हूं
किसी के तलवे चाटना।।
खुद ही पर है विश्वास
सफलता की रखता हूं आस
आज निराश हूं तो क्या
शीघ्र फैलाऊंगा मन में सुहास।।
सुंदरता कोई चीज नहीं
दिल को पढ़ा है मैने
आंतरिक सुंदरता को
हृदय से परखा है मैने।।
देखे बिना अब रह नहीं पाता
आंखों से सब ओझल नज़र आता
मानसिक भ्रम से
ख़ुद को निकाल भी नहीं पाता।।
भ्रम में जीने की आदत सी हो गई है
निराशा की झड़ी लग गई है
हर शर्त है मंज़ूर
बस एक खुशी की चाहत रह गई है।।
दिल को कहीं लगा दिया है
उसने रोना सिखा दिया है
लाख कोशिश से भी
भ्रम का आवरण न हटा पाया है।।
हमें तो सिर्फ तलाश है आपकी
दिल को बस आस है आपकी
रूह के हर कंपन के स्वर में
नि:स्वार्थ चर्चा है आपकी।।
लगता है कि जी रहा हूं
पर मौत को पी रहा हूं
ज़िंदगी की मेरी ये चादर
रोज फट रही है, मैं सिल रहा हूं।।
लक्ष्य से दूर खड़ा हूं
बाधाओं की दहलीज पे पड़ा हूं
ज़िंदगी से लड़कर जैसे
हारकर गिरा पड़ा हूं।।
प्यार में उबाल था
दिल में कुछ सवाल था
देखा नहीं उसे जी भर के
बस इसी का तो मलाल था।।
दिल में कमी सी रह गई है
सांस थम सी गई है
हासिल करूं आपको हर हाल में
मुलाक़ात की आदत सी हो गई है।।
बात बहुत होती है आपसे
पर बताने की हिम्मत नहीं
सब पे रहम करता हूं
अपने दिल पे रहमत नहीं।।
आपमें अपनी ज़िंदगी देखता हूं
ग़म में बोतल खुल जाती है
आपकी एक झलक से
सारा नशा सरेआम उतर जाता है।।
ग़म में करता हूं नशा
दे सकती हो इसकी सज़ा
पर वादा करो मुलाक़ात का
मेरी रूह-आफ़ज़ा ।।
अपने हाल का जिक्र नहीं चाहता
चाहकर भी व्यक्त नहीं कर सकता
आपकी नज़र में मैं कुछ नहीं
ये भी तो आप कह सकतीं नहीं।।
अट्टास की चाह नहीं
मुस्कान पे मरता हूं
विष को पीकर भी
अमर बना रहता हूं।।
मन में भावनाएं भरी हैं
हलक से निकलते नहीं हैं
प्रश्न तो उठते हैं मन में
पर वो सुलझते नहीं हैं।।
खुद से बता सकता नहीं
प्यार का इज़हार कर सकता नहीं
आप भी तो मुझे
मेरे हाल पर छोड़ सकतीं नहीं।।
मुश्किलों को गले लगाया है
अपने उसूलों को पहचाना है
हर तरफ से मेरा
आपके पास ही ठिकाना है।।
खामोशियां मेरा दर्द-ए-दिल बयां करती हैं
मुस्कान में भी ग़म झलक जाती है
चेहरे को पढ़ने की ज़रूरत नहीं
पलकों से दबी आंखें मेरा हाल बताती हैं।।
मोहब्बत की आग में झुलसता हूं
बिना लक्ष्य के भटकता हूं
निर्विघ्न विचरण करके भी
हर सवालों में उलझता हूं।।
शर्तों को जानता नहीं
उम्मीद पर जीता हूं
सुबह को देखकर भी
शाम की तलाश करता हूं।।
रात कैसे बीत जाए
स्वप्न की दुनिया टूट जाए
देख लूं एक झलक आपकी
कि सारा दर्द हवा हो जाए।।
पता है कि प्यार धोखा है
ये जुल्म अनदेखा है
पर दिल को रोकूं कैसे
जालिम ! इसने तो किसी को परखा है।।
मनोदशा बदल सी गई है
दिल का फूल कली बन गई है
भ्रमर की तरह बंद हूं उसमें
बस सुबह की देर रह गई है।।
दर्द से सामना करना सीखा है
ग़म में भी मुस्कुराना सीखा है
अब भी लोग देखते हैं खुशी में
पर मेरा क्या कुछ नहीं लुटा है।।
आह से जब भी सामना होता है
हर सख्श तब परेशां होता है
फर्क अह पड़ता नहीं मुझे
दिल उनके दर्दों से जुड़ा होता है।।
हर शर्त पर चाहता हूं जीना
भूल कर भी नहीं चाहता मरना
कैसे कुर्बान करता है कोई जान
मरकर मिलती है पहचान !!
अपनी जान गंवा सकता नहीं
आन से हट सकता नहीं
कोई झांके मन की अंतर्गहराईयों में
दर्द-ए-जुदाई सह सकता नहीं।।
दिल में बसी है उनकी सूरत
बनकर रह गया हूं मूरत
ज़िंदा हूं मैं उनके प्राण से
कह सकता हूं मैं शान से।।
हाल-ए-दिल बयां कर सकता नहीं
आप नज़र तो पढ़ सकतीं हैं
पता है दर्द के मरीज हैं हम
आप मरहम तो दे सकतीं हैं।।
बेचैन दिल को समझा सकता नहीं
आप विचार तो कीजिए
जुदाई का है डर
ऐतबार तो कीजिए।।
प्यार में डूब सा गया हूं
खुद ही को भूल सा गया हूं
दुनिया की परवाह नहीं
बस सोचता हूं अपने प्यार की।।
तनहाई से डरता हूं
बस आपका साथ हो
आपसे मिलकर लगा है
मेरी खुशी-ग़म में सिर्फ आपका हाथ हो।।
रहम तो करना पड़ेगा
विश्वास को जानना पड़ेगा
मन की किताब को
आपको पढ़ना ही पड़ेगा।।
निर्णय हो आपके अंतर्मन का
जैसे वक्त हो किसी इम्तिहान का
दिल की गहराईयों से सोचो
ताकि इतिहास हो अमन-चैन का।।
अंतत: बता रहा हूं दिल की बात
इसे भी समझो खुद आप
दिल की अंतर्गहराईयों से
चाहत में है बस आपका साथ।।
हम करते हैं आपसे प्यार
बस इजाज़त तो दीजिए
हमें रहेगा जीवन भर इंतज़ार
आप इशारा तो कीजिए।।
भावनाओं को व्यक्त कर चुका
जवाब की इच्छा है
इसमें भी हर तरफ से
आप ही की स्वेच्छा है।।
आशा है कि आप पिघल गई गोंगी
हाल-ए-दिल को समझ गई होंगी
अब कहने को कुछ बचा नहीं
आप भी पसीज गई होंगी।।
दर्द के आंसू ही ऐसे होते हैं
जो हर किसी को मजबूर करते हैं
पर उस लम्हे में भी
सभी अपने दिल की ही सुनते हैं।।
आप भी सुनना मेरे दिल की
मिर्णय लेना अपने मन की
हर हाल में सोंचकर
जिज्ञासा रखना मिलन की।।
मेरी भी तमन्ना है
हाल से बदहाल तक
बस आपको ही पाने की।।
"स्वनिर्मित्त" - सौरभ कुणाल
मत जी ऐसी ज़िंदगी
जिसके सारे फैसले कोई और करे
तू विरोध कर
ज़रूरत पड़ी तो विद्रोह भी करना
अपनी मर्ज़ी की ज़िंदगी के लिए
अपने राह के चयन के लिए
फ़ैसला सही हो या ग़लत
पर हो तो तेरा
तेरे आस-पास के यथार्थ से
उपजा हुआ
तेरे दिल और दिमाग से
गुजरा हुआ
उम्र के इक्कीसवें साल में हो
फिर भी कोई समझता हो
तुम चीजों को समझ नहीं सकते
तो ये भूल है उसकी
तेरी नहीं
बाकी बची ज़िंदगी के लिए
तू अभी इस वक़्त
अपने यथार्थ को
छोड़ने की कोशिश मत कर
ये केवल खोखला आदर्श नहीं
तेरा हथियार है
जिससे तुम केवल दूसरों से ही नहीं
ख़ुद से भी लड़ सकते हो
मत बन उन फूलों की तरह
जो है किसी माली का मोहताज
स्वच्छंद रह जंगली झाड़ी की तरह
जो ख़ुद का है सरताज....
मंगलवार, अप्रैल 14, 2009
तेरी बातें ही सुनाने आये / फ़राज़
तेरी बातें ही सुनाने आये
दोस्त भी दिल ही दुखाने आये
फूल खिलते हैं तो हम सोचते हैं
तेरे आने के ज़माने आये
ऐसी कुछ चुप सी लगी है जैसे
हम तुझे हाल सुनाने आये
इश्क़ तन्हा है सर-ए-मंज़िल-ए-ग़म
कौन ये बोझ उठाने आये
अजनबी दोस्त हमें देख के हम
कुछ तुझे याद दिलाने आये
दिल धड़कता है सफ़र के हंगाम
काश फिर कोई बुलाने आये
अब तो रोने से भी दिल दुखता है
शायद अब होश ठिकाने आये
क्या कहीं फिर कोई बस्ती उजड़ी
लोग क्यूँ जश्न मनाने आये
सो रहो मौत के पहलू में "फ़राज़"
नींद किस वक़्त न जाने आये
तुम भी ख़फ़ा हो लोग भी बेरहम हैं दोस्तो / फ़राज़
तुम भी ख़फ़ा हो लोग भी बेरहम हैं दोस्तो
अब हो चला यक़ीं के बुरे हम हैं दोस्तो
किस को हमारे हाल से निस्बत है क्या करें
आँखें तो दुश्मनों की भी पुरनम हैं दोस्तो
अपने सिवा हमारे न होने का ग़म किसे
अपनी तलाश में तो हम ही हम हैं दोस्तो
कुछ आज शाम ही से है दिल भी बुझा-बुझा
कुछ शहर के चिराग़ भी मद्धम हैं दोस्तो
इस शहर-ए-आरज़ू से भी बाहर निकल चलो
अब दिल की रौनक़ें भी कोई दम हैं दोस्तो
सब कुछ सही "फ़राज़" पर इतना ज़रूर है
दुनिया में ऐसे लोग बहुत कम हैं दोस्तो
तुझसे बिछड़ के हम भी मुकद्दर के हो गये / फ़राज़
तुझसे बिछड़ के हम भी मुकद्दर के हो गये
फिर जो भी दर मिला है उसी दर के हो गये
फिर यूँ हुआ के गैर को दिल से लगा लिया
अंदर वो नफरतें थीं के बाहर के हो गये
क्या लोग थे के जान से बढ़ कर अजीज थे
अब दिल से मेह नाम भी अक्सर के हो गये
ऐ याद-ए-यार तुझ से करें क्या शिकायतें
ऐ दर्द-ए-हिज्र हम भी तो पत्थर के हो गये
समझा रहे थे मुझ को सभी नसेहान-ए-शहर
फिर रफ्ता रफ्ता ख़ुद उसी काफिर के हो गये
अब के ना इंतेज़ार करें चारगर का हम
अब के गये तो कू-ए-सितमगर के हो गये
रोते हो एक जजीरा-ए-जाँ को "फ़राज़" तुम
देखो तो कितने शहर समंदर के हो गये
तुझ पर भी न हो गुमान मेरा / फ़राज़
तुझ पर भी न हो गुमान मेरा
इतना भी कहा न मान मेरा
मैं दुखते हुये दिलों का ईशा
और जिस्म लहुलुहान मेरा
कुछ रौशनी शहर को मिली तो
जलता है जले मकान मेरा
ये जात ये कायनात क्या है
तू जान मेरी जहान मेरा
जो कुछ भी हुआ यही बहुत है
तुझको भी रहा है ध्यान मेरा
तड़प उठूँ भी तो ज़ालिम तेरी दुहाई न दूँ / फ़राज़
तड़प उठूँ भी तो ज़ालिम तेरी दुहाई न दूँ
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी तुझे दिखाई न दूँ
तेरे बदन में धड़कने लगा हूँ दिल की तरह
ये और बात के अब भी तुझे सुनाई न दूँ
ख़ुद अपने आपको परखा तो ये नदामत है
के अब कभी उसे इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई न दूँ
मुझे भी ढूँढ कभी मह्व-ए-आईनादारी
मैं तेरा अक़्स हूँ लेकिन तुझे दिखाई न दूँ
जो भी दुख याद न था याद आया / फ़राज़
जो भी दुख याद न था याद आया
आज क्या जानिए क्या याद आया।
याद आया था बिछड़ना तेरा
फिर नहीं याद कि क्या याद आया।
हाथ उठाए था कि दिल बैठ गया
जाने क्या वक़्त-ए-दुआ याद आया।
जिस तरह धुंध में लिपटे हुए फूल
इक इक नक़्श तेरा याद आया।
ये मोहब्बत भी है क्या रोग ‘फ़राज़’
जिसको भूले वो सदा याद आया।
जिस सिम्त भी देखूँ नज़र आता है के तुम हो / फ़राज़
जिस सिम्त भी देखूँ नज़र आता है के तुम हो
ऐ जान-ए-जहाँ ये कोई तुम सा है के तुम हो
ये ख़्वाब है ख़ुश्बू है के झोंका है के पल है
ये धुंध है बादल है के साया है के तुम हो
इस दीद की सआत में कई रन्ग हैं लरज़ाँ
मैं हूँ के कोई और है दुनिया है के तुम हो
देखो ये किसी और की आँखें हैं के मेरी
देखूँ ये किसी और का चेहरा है के तुम हो
ये उम्र-ए-गुरेज़ाँ कहीं ठहरे तो ये जानूँ
हर साँस में मुझको ये लगता है के तुम हो
हर बज़्म में मौज़ू-ए-सुख़न दिल ज़दगाँ का
अब कौन है शीरीं है के लैला है के तुम हो
इक दर्द का फैला हुआ सहरा है के मैं हूँ
इक मौज में आया हुआ दरिया है के तुम हो
वो वक़्त न आये के दिल-ए-ज़ार भी सोचे
इस शहर में तन्हा कोई हम सा है के तुम हो
आबाद हम आशुफ़्ता सरों से नहीं मक़्तल
ये रस्म अभी शहर में ज़िन्दा है के तुम हो
ऐ जान-ए-"फ़राज़" इतनी भी तौफ़ीक़ किसे थी
हमको ग़म-ए-हस्ती भी गवारा है के तुम हो
ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे / फ़राज़
ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे
हमसफ़र चाहिये हूज़ूम नहीं
इक मुसाफ़िर भी काफ़िला है मुझे
तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे
लब कुशां हूं तो इस यकीन के साथ
कत्ल होने का हौसला है मुझे
दिल धडकता नहीं सुलगता है
वो जो ख्वाहिश थी, आबला है मुझे
कौन जाने कि चाहतो में फ़राज़
क्या गंवाया है क्या मिला है मुझे
ज़ख़्म को फूल तो सर को सबा कहते हैं/ फ़राज़
ज़ख़्म को फूल तो सर सर को सबा कहते हैं
जाने क्या दौर है क्या लोग हैं क्या कहते हैं
क्या क़यामत है के जिन के लिये रुक रुक के चले
अब वही लोग हमें आबलापा कहते हैं
कोई बतलाओ के इक उम्र का बिछड़ा महबूब
इत्तेफ़ाक़न कहीं मिल जाये तो क्या कहते हैं
ये भी अन्दाज़-ए-सुख़न है के जफ़ा को तेरी
ग़म्ज़ा-ओ-इश्वा-ओ-अन्दाज़-ओ-अदा कहते हैं
जब तलक दूर है तू तेरी परस्तिश कर लें
हम जिसे छू न सकें उस को ख़ुदा कहते हैं
क्या त'अज्जुब है के हम अह्ल-ए-तमन्ना को "फ़राज़"
वो जो महरूम-ए-तमन्ना हैं बुरा कहते हैं
ख़्वाब मरते नहीं / फ़राज़
ख़्वाब मरते नहीं
ख़्वाब दिल हैं न आँखें न साँसें के जो
रेज़ा-रेज़ा हुए तो बिखर जायेंगे
जिस्म की मौत से ये भी मर जायेंगे
ख़्वाब मरते नहीं
ख़्वाब तो रौशनी हैं, नवा हैं, हवा हैं
जो काले पहाड़ों से रुकते नहीं
ज़ुल्म के दोज़ख़ों से भी फुँकते नहीं
रौशनी और नवा और हवा के आलम
मक़्तलों में पहुँच कर भी झुकते नहीं
ख़्वाब तो हर्फ़ हैं
ख़्वाब तो नूर हैं
ख़्वाब तो सुक़्रात हैं
ख़्वाब मंसूर हैं
क्यूँ तबीअत कहीं ठहरती नहीं / फ़राज़
क्यूँ तबीअत कहीं ठहरती नहीं
दोस्ती तो उदास करती नहीं
हम हमेशा के सैर-चश्म सही
तुझ को देखें तो आँख भरती नहीं
शब-ए-हिज्राँ भी रोज़-ए-बद की तरह
कट तो जाती है पर गुज़रती नहीं
ये मोहब्बत है, सुन, ज़माने, सुन!
इतनी आसानियों से मरती नहीं
जिस तरह तुम गुजारते हो फ़राज़
जिंदगी उस तरह गुज़रती नहीं
कुछ शेर / फ़राज़
1.
अब किस का जश्न मनाते हो उस देस का जो तक़्सीम हुआ
अब किस के गीत सुनाते हो उस तन-मन का जो दो-नीम हुआ
2.
उस ख़्वाब का जो रेज़ा रेज़ा उन आँखों की तक़दीर हुआ
उस नाम का जो टुकड़ा टुकड़ा गलियों में बे-तौक़ीर हुआ
3.
उस परचम का जिस की हुर्मत बाज़ारों में नीलाम हुई
उस मिट्टी का जिस की हुर्मत मन्सूब उदू के नाम हुई
4.
उस जंग का जो तुम हार चुके उस रस्म का जो जारी भी नहीं
उस ज़ख़्म का जो सीने पे न था उस जान का जो वारी भी नहीं
5.
उस ख़ून का जो बदक़िस्मत था राहों में बहाया तन में रहा
उस फूल का जो बेक़ीमत था आँगन में खिला या बन में रहा
6.
उस मश्रिक़ का जिस को तुम ने नेज़े की अनी मर्हम समझा
उस मग़रिब का जिस को तुम ने जितना भी लूटा कम समझा
7.
उन मासूमों का जिन के लहू से तुम ने फ़रोज़ाँ रातें कीं
या उन मज़लूमों का जिस से ख़ंज़र की ज़ुबाँ में बातें कीं
8.
उस मरियम का जिस की इफ़्फ़त लुटती है भरे बाज़ारों में
उस ईसा का जो क़ातिल है और शामिल है ग़मख़्वारों में
9.
इन नौहागरों का जिन ने हमें ख़ुद क़त्ल किया ख़ुद रोते हैं
ऐसे भी कहीं दमसाज़ हुए ऐसे जल्लाद भी होते हैं
10.
उन भूखे नंगे ढाँचों का जो रक़्स सर-ए-बाज़ार करें
या उन ज़ालिम क़ज़्ज़ाक़ों का जो भेस बदल कर वार करें
11.
या उन झूठे इक़रारों का जो आज तलक ऐफ़ा न हुए
या उन बेबस लाचारों का जो और भी दुख का निशाना हुए
12.
इस शाही का जो दस्त-ब-दस्त आई है तुम्हारे हिस्से में
क्यों नन्ग-ए-वतन की बात करो क्या रखा है इस क़िस्से में
13.
आँखों में छुपाये अश्कों को होंठों में वफ़ा के बोल लिये
इस जश्न में भी शामिल हूँ नौहों से भरा कश्कोल लिये
कुछ न किसी से बोलेंगे / फ़राज़
कुछ न किसी से बोलेंगे
तन्हाई में रो लेंगे
हम बेरहबरों का क्या
साथ किसी के हो लेंगे
ख़ुद तो हुए रुसवा लेकिन
तेरे भेद न खोलेंगे
जीवन ज़हर भरा साग़र
कब तक अमृत घोलेंगे
नींद तो क्या आयेगी "फ़राज़"
मौत आई तो सो लेंगे
करूँ न याद अगर किस तरह भुलाऊँ उसे
ग़ज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे
वो ख़ार-ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिन्द
मैं ज़ख़्म-ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे
ये लोग तज़करे करते हैं अपने लोगों से
मैं कैसे बात करूँ और कहाँ से लाऊँ उसे
मगर वो ज़ूदफ़रामोश ज़ूद रंज भी है
के रूठ जाये अगर याद कुछ दिलाऊँ उसे
वही जो दौलत-ए-दिल है वही जो राहत-ए-जाँ
तुम्हारी बात पे ऐ नासिहो गँवाऊँ उसे
जो हमसफ़र सर-ए-मंज़िल बिछड़ रहा है "फ़राज़"
अजब नहीं कि अगर याद भी न आऊँ उसे
कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो / फ़राज़
कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो
बहुत बड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चालो
तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है
मैं जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो
नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो
ये एक शब की मुलाक़ात भी ग़निमत है
किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो
अभी तो जाग रहे हैं चिराग़ राहों के
अभी है दूर सहर थोड़ी दूर साथ चलो
तवाफ़-ए-मन्ज़िल-ए-जानाँ हमें भी करना है
तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो
ऐसे चुप हैं के ये मंज़िल भी ख़ड़ी हो जैसे / फ़राज़
ऐसे चुप हैं के ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे
तेरा मिलना भी जुदाई कि घड़ी हो जैसे
अपने ही साये से हर गाम लरज़ जाता हूँ
रास्ते में कोई दीवार खड़ी हो जैसे
मंज़िलें दूर भी हैं मंज़िलें नज़दीक भी हैं
अपने ही पावों में ज़ंजीर पड़ी हो जैसे
कितने नादान हैं तेरे भूलने वाले के तुझे
याद करने के लिये उम्र पड़ी हो जैसे
आज दिल खोल के रोये हैं तो यूँ ख़ुश हैं "फ़राज़"
चंद लम्हों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे
इस से पहले कि बेवफा हो जाएँ / फ़राज़
इस से पहले कि बेवफा हो जाएँ
क्यूँ न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ
तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ
हम भी मजबूरियों का उज़्र करें
फिर कहीं और मुब्तिला हो जाएँ
अब के गर तू मिले तो हम तुझसे
ऐसे लिपटें तेरी क़बा हो जाएँ
(क़बा=ड्रेस)
बंदगी हमने छोड़ दी फ़राज़
क्या करें लोग जब खुदा हो जाएँ