मंगलवार, मई 12, 2009

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते

वक़्त की शाख़ से लम्हें नहीं तोड़ा करते



जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते



शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा
जाने वालों के लिये दिल नहीं थोड़ा करते



तूने आवाज़ नहीं दी कभी मुड़कर वरना
हम कई सदियाँ तुझे घूम के देखा करते



लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो
ऐसी दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते

दो दो हिंदुस्तान

हिंदुस्तान में दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं



एक है जिसका सर नवें बादल में है
दूसरा जिसका सर अभी दलदल में है



एक है जो सतरंगी थाम के उठता है
दूसरा पैर उठाता है तो रुकता है



फिरका-परस्ती तौहम परस्ती और गरीबी रेखा
एक है दौड़ लगाने को तय्यार खडा है



‘अग्नि’ पर रख पर पांव उड़ जाने को तय्यार खडा है
हिंदुस्तान उम्मीद से है!



आधी सदी तक उठ उठ कर हमने आकाश को पोंछा है
सूरज से गिरती गर्द को छान के धूप चुनी है



साठ साल आजादी के…हिंदुस्तान अपने इतिहास के मोड़ पर है
अगला मोड़ और ‘मार्स’ पर पांव रखा होगा!!



हिन्दोस्तान उम्मीद से है..

स्पर्श

कुरान हाथों में लेके नाबीना एक नमाज़ी

लबों पे रखता था
दोनों आँखों से चूमता था
झुकाके पेशानी यूँ अक़ीदत से छू रहा था
जो आयतं पढ़ नहीं सका
उन के लम्स महसूस कर रहा हो




मैं हैराँ-हैराँ गुज़र गया था
मैं हैराँ हैराँ ठहर गया हूँ




तुम्हारे हाथों को चूम कर
छू के अपनी आँखों से आज मैं ने
जो आयतें पड़ नहीं सका
उन के लम्स महसूस कर लिये हैं

स्केच

याद है इक दिन

मेरी मेज़ पे बैठे-बैठे

सिगरेट की डिबिया पर तुमने

एक स्केच बनाया था

आकर देखो

उस पौधे पर फूल आया है !

साँस लेना भी कैसी आदत है

साँस लेना भी कैसी आदत है
जीये जाना भी क्या रवायत है
कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आँखों में
पाँव बेहिस हैं, चलते जाते हैं
इक सफ़र है जो बहता रहता है
कितने बरसों से, कितनी सदियों से
जिये जाते हैं, जिये जाते हैं



आदतें भी अजीब होती हैं

शाम से आँख में नमी सी है

शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है



दफ़्न कर दो हमें कि साँस मिले
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है



वक़्त रहता नहीं कहीं छुपकर
इस की आदत भी आदमी सी है



कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है

वो जो शायर था चुप सा रहता था

वो जो शायर था चुप सा रहता था
बहकी-बहकी सी बातें करता था
आँखें कानों पे रख के सुनता था
गूँगी खामोशियों की आवाज़ें!
जमा करता था चाँद के साए
और गीली सी नूर की बूँदें
रूखे-रूखे से रात के पत्ते
ओक में भर के खरखराता था
वक़्त के इस घनेरे जंगल में
कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था
हाँ वही, वो अजीब सा शायर
रात को उठ के कोहनियों के बल
चाँद की ठोड़ी चूमा करता था



चाँद से गिर के मर गया है वो
लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है |

वो ख़त के पुरज़े उड़ा रहा था

वो ख़त के पुरज़े उड़ा रहा था
हवाओं का रुख़ दिखा रहा था



कुछ और भी हो गया नुमायाँ
मैं अपना लिखा मिटा रहा था



उसी का इमान बदल गया है
कभी जो मेरा ख़ुदा रहा था



वो एक दिन एक अजनबी को
मेरी कहानी सुना रहा था



वो उम्र कम कर रहा था मेरी
मैं साल अपने बढ़ा रहा था

वैन गॉग का एक ख़त

तारपीन तेल में कुछ घोली हुई धूप की डलियाँ

मैंने कैनवास में बिख़ेरी थीं मगर

क्या करूँ लोगों को उस धूप में रंग दिखते ही नहीं!


मुझसे कहता था थियो चर्च की सर्विस कर लूँ

और उस गिरजे की ख़िदमत में गुजारूँ

मैं शबोरोज जहाँ-

रात को साया समझते हैं सभी,

दिन को सराबों का सफ़र!

उनको माद्दे की हक़ीकत तो नज़र आती नहीं

मेरी तस्वीरों को कहते हैं, तख़य्युल है

ये सब वाहमा हैं!




मेरे कैनवास पे बने पेड़ की तफ़सील तो देखो

मेरी तख़लीक ख़ुदाबंद के उस पेड़ से

कुछ कम तो नहीं है!

उसने तो बीज को एक हुक्म दिया था शायद,

पेड़ उस बीज की ही कोख में था,

और नुमायाँ भी हुआ

जब कोई टहनी झुकी, पत्ता गिरा, रंग अगर ज़र्द हुआ

उस मुसव्विर ने कहीं दख़ल दिया था,

जो हुआ, सो हुआ-


मैंने हर शाख़ पे, पत्तों के रंग-रूप पे मेहनत की है,

उस हक़ीकत को बयाँ करने में

जो हुस्ने हक़ीकत है असल में


उन दरख़्तों का ये संभला हुआ क़द तो देखो

कैसे ख़ुद्दार हैं ये पेड़, मगर कोई भी मग़रूर नहीं

इनको शेरों की तरह किया मैंने किया है मौजूँ!

देखो तांबे की तरह कैसे दहकते हैं ख़िजां के पत्ते,


कोयला खदानों में झौंके हुए मज़दूरों की शक्लें

लालटेनें हैं, जो शब देर तलक जलतीं रहीं

आलुओं पर जो गुज़र करते हैं कुछ लोग-पोटेटो ईटर्स

एक बत्ती के तले, एक ही हाले में बंधे लगते हैं सारे!


मैंने देखा था हवा खेतों से जब भाग रही थी

अपने कैनवास पे उसे रोक लिया-

रोलां वह चिट्ठीरसां

और वो स्कूल में पढ़ता लड़का

ज़र्द खातून पड़ोसन थी मेरी-

फ़ानी लोगों को तगय्यर से बचा कर उन्हें

कैनवास पे तवारीख़ की उम्रें दी हैं!


सालहा साल ये तस्वीरें बनाई मैंने

मेरे नक्काद मगर बोल नहीं-

उनकी ख़ामोशी खटकती थी मेरे कानों में,

उस पे तस्वीर बनाते हुए इक कव्वे की वह चीख़-पुकार

कव्वा खिड़की पे नहीं, सीधा मेरे कान पे आ बैठता था,

कान ही काट दिया है मैंने!


मेरे पैलेट पे रखी धूप तो अब सूख चुकी है,

तारपीन तेल में जो घोला था सूरज मैंने,

आसमाँ उसका बिछाने के लिए-

चंद बालिश्त का कैनवास भी मेरे पास नहीं है!


मैं यहाँ रेमी में हूं

सेंटरेमी के दवाख़ाने में थोड़ी-सी

मरम्मत के लिए भर्ती हुआ हूँ!

उनका कहना है कई पुर्जे मेरे जहन के अब ठीक नहीं हैं-

मुझे लगता है वो पहले से सवातेज हैं अब!

वक़्त को आते न जाते न गुजरते देखा

वक़्त को आते न जाते न गुजरते देखा
न उतरते हुए देखा कभी इलहाम की सूरत
जमा होते हुए एक जगह मगर देखा है

शायद आया था वो ख़्वाब से दबे पांव ही
और जब आया ख़्यालों को एहसास न था
आँख का रंग तुलु होते हुए देखा जिस दिन
मैंने चूमा था मगर वक़्त को पहचाना न था

चंद तुतलाते हुए बोलों में आहट सुनी
दूध का दांत गिरा था तो भी वहां देखा
बोस्की बेटी मेरी ,चिकनी-सी रेशम की डली
लिपटी लिपटाई हुई रेशम के तागों में पड़ी थी
मुझे एहसास ही नहीं था कि वहां वक़्त पड़ा है
पालना खोल के जब मैंने उतारा था उसे बिस्तर पर
लोरी के बोलों से एक बार छुआ था उसको
बढ़ते नाखूनों में हर बार तराशा भी था

चूड़ियाँ चढ़ती-उतरती थीं कलाई पे मुसलसल
और हाथों से उतरती कभी चढ़ती थी किताबें
मुझको मालूम नहीं था कि वहां वक़्त लिखा है

वक़्त को आते न जाते न गुज़रते देखा
जमा होते हुए देखा मगर उसको मैंने
इस बरस बोस्की अठारह बरस की होगी

लैंडस्केप-1

दूर सुनसान-से साहिल के क़रीब

एक जवाँ पेड़ के पास

उम्र के दर्द लिए वक़्त मटियाला दोशाला ओढ़े

बूढ़ा-सा पाम का इक पेड़, खड़ा है कब से

सैकड़ों सालों की तन्हाई के बद

झुक के कहता है जवाँ पेड़ से... ’यार!

तन्हाई है ! कुछ बात करो !’

लैंडस्केप-2

कोई मेला लगा है परबत पर

सब्ज़ाज़ारों पर चढ़ रहे हैं लोग

टोलियाँ कुछ रुकी हुईं ढलानों पर

दाग़ लगते हैं इक पके फल पर

दूर सीवन उधेड़ती-चढ़ती,

एक पगडंडी बढ़ रही है सब्ज़े पर !


चूंटियाँ लग गई हैं इस पहाड़ी को

जैसे अमरूद सड़ रहा है कोई !

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं
कुछ इक पल के
कुछ दो पल के

कुछ परों से हल्के होते हैं
बरसों के तले चलते-चलते
भारी-भरकम हो जाते हैं

कुछ भारी-भरकम बर्फ़ के-से
बरसों के तले गलते-गलते
हलके-फुलके हो जाते हैं

नाम होते हैं रिश्तों के
कुछ रिश्ते नाम के होते हैं
रिश्ता वह अगर मर जाये भी
बस नाम से जीना होता है

बस नाम से जीना होता है
रिश्ते बस रिश्ते होते हैं

रात भर सर्द हवा चलती रही

रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने अलाव तापा
मैंने माजी से कई खुश्क सी शाखें काटीं
तुमने भी गुजरे हुये लम्हों के पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखीं नज़्में
तुमने भी हाथों से मुरझाये हुये खत खोलें
अपनी इन आंखों से मैंने कई मांजे तोड़े
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकी
तुमने पलकों पे नामी सूख गयी थी, सो गिरा दी |



रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको
काट के दाल दिया जलाते अलावों मसं उसे
रात भर फून्कों से हर लोऊ को जगाये रखा
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाए रखा
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने |

मौत तू एक कविता है

मौत तू एक कविता है,
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको



डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुचे
दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब
ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन



जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आऐ
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको




(इस कविता को हिन्दी फ़िल्म "आनंद" में डा. भास्कर बैनर्जी
नामक चरित्र के लिये लिखा गया था। इस चरित्र को फ़िल्म में
अमिताभ बच्चन ने निभाया था)

अपने घर में ही अजनबी हो गया हूँ

मैं अपने घर में ही अजनबी हो गया हूँ आ कर
मुझे यहाँ देखकर मेरी रूह डर गई है
सहम के सब आरज़ुएँ कोनों में जा छुपी हैं
लवें बुझा दी हैंअपने चेहरों की, हसरतों ने
कि शौक़ पहचनता ही नहीं
मुरादें दहलीज़ ही पे सर रख के मर गई हैं



मैं किस वतन की तलाश में यूँ चला था घर से
कि अपने घर में भी अजनबी हो गया हूँ आ कर

मुझको भी तरकीब सिखा

अकसर तुझको देखा है कि ताना बुनते

जब कोई तागा टूट गया या खत्म हुआ

फिर से बांध के

और सिरा कोई जोड़ के उसमे

आगे बुनने लगते हो

तेरे इस ताने में लेकिन

इक भी गांठ गिरह बुन्तर की

देख नहीं सकता कोई

मैनें तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता

लेकिन उसकी सारी गिराहें

साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे

पेंटिंग-1

रात कल गहरी नींद में थी जब

एक ताज़ा-सफ़ेद कैनवस पर

आतिशीं, लाल -सुर्ख रंगों से

मैं ने रौशन किया था इक सूरज-

सुबह तक जल गया था वह कैनवस

राख बिखरी हुई थी कमरे में

पेंटिंग-2

’जोरहट’ में एक दफ़ा
दूर उफ़क के हलके-हलके कुहरे में
’हमीन बरुआ’ के चाय बाग़ान के पीछे
चांद कुछ ऎसे दिखा था
जैसे चीनी की चमकीली कैटल रखी हो!

पेंटिंग-3

खड़खड़ाता हुआ निकला है उफ़क से सूरज

जैसे कीचड़ में फँसा पहिया ढकेला किसी ने

चब्बे-टब्बे-से किनारों पर नज़र आते हैं

रोज़-सा गोल नहीं

उधड़े-उधड़े-से उजाले हैं बदन पर

और चेहरे पर खरोंचे के निशान हैं