गुरुवार, फ़रवरी 18, 2010

पहले मन फिर वचन बिक गया

पहले मन फिर वचन बिक गया

व्यक्ति का मूलधन बिक गया


देह के गर्म बाज़ार में

हर कली, हर सुमन बिक गया


रक्षकों को खबर ही नहीं

और चुपके से वन बिक गया


'द्रौपदी' नग्न होने को है

इस सदी का किशन बिक गया


उसका बस एक ही स्वपन था

अंतत: वो स्वपन बिक गया


डगमगाने लगी है तुला

न्याय का संतुलन बिक गया


'सैटेलाइट' के आदेश पर—

इस धरा का गगन बिक गया

अनावश्यक से मुझको प्यार कम है

अनावश्यक से मुझको प्यार कम है

मेरे खेतों में 'खरपतवार' कम है


अभी तुम कल्पना में उड़ रहे हो

तुम्हारा सत्य से व्यवहार कम है


मैं यूँ तो सारी धरती नाप आया

मगर, मेरे लिए संसार कम है


जो ये जोखिम उठाना चाहता है

वो जोखिम के लिए तैयार कम है


सुखी हो तुम इसी कारण सुखी हो

तुम्हारे मन में हाहाकार कम है


वो प्रतिभावान है, ये तो सही है

मगर, ये भी सही है— धार कम है


बहुत ऊँची इमारत मत उठाओ

अभी उसके लिए आधार कम है

कभी जो आया था पल भर को

कभी जो आया था पल भर को 'उड़न—छू' बनकर

आजतक मन में चमकता है वो जुगनू बनकर


कंठ रुँधते ही, बदल जाता है भाषा का स्वरूप

शब्द तब फूटते देखे गए आँसू बनकर


ये प्रजातन्त्र की कुर्सी है उतारो उसको

वो जो आ बैठा है कुर्सी पे स्वयं—भू बनकर


जो भी आता है, भँवर में ही फँसा जाता है

ज़िन्दगी में कोई आता नहीं चप्पू बनकर


ये तो सच है कि किया पिंजरे से आज़ाद मुझे

किंतु 'पर' काट लिए उसने ही ,चाकू बनकर


मैं कोई बैल नहीं हूँ कि जो जोता जाऊँ

मेरी गर्दन पे न लद पाओगे कोल्हू बनकर


आज तक जिअने भी आशीष दिए हैं माँ ने

तन गए सिर पे सुरक्षाओं के तंबू बनकर

अपनी फुलवारी की सीमा

अपनी फुलवारी की सीमा पार करने के लिए

लोग हैं बेताब खुशबू—से बिखरने के लिए


जो हुआ निर्भय , उसे फिर डर भला किस बात का

वरना साया ही बहुत होता है डरने के लिए


आप 'हरसिंगार' की शाखें हिलाना छोड़िए,

आपकी बातें बहुत हैं फूल झरने के लिए


आजकल महसूस करती है अमन की 'उर्वशी'

एक भी दर्पन नहीं बनने संवरने के लिए


कैमरे में ही ठहर पाता है पल—दो—पल समय

वक्त को फुरसत कहाँ वर्ना ठहरने के लिए

अथक प्रयास के उजले विचार से निकली

अथक प्रयास के उजले विचार से निकली

हमारी जीत, निरंतर जुझार से निकली


हरेक युद्ध किसी संधि पर समाप्त हुआ

अमन की राह हमेशा प्यार से निकली


जो मन का मैल है, उसको तो व्यक्त होना है

हमारी कुण्ठा हजारों प्रकार से निकली


ये अर्थ—शास्त्र भी कहता है, अपनी भाषा में—

नकद की राह हमेशा उधार से निकली


नजर में आने की उद्दंड युक्ति अपनाकर ,

वो चलते—चलते अचानक कतार से निकली


हमारी चादरें छोटी, शरीर लंबे है

हमारे खर्च की सीमा पगार से निकली


ये सोच कर ही तुम्हें रात से गुजरना है

सुहानी भोर सदा अंधकार से निकली

मीठी—मीठी आग से परिचित हुए

मीठी—मीठी आग से परिचित हुए

हम दहन की राग से परिचित हुए


तन से कुछ ज्यादा ही भीगा मन का छोर

तन से मन तक फाग से परिचित हुए


उम्र भर, यायावरी के बाद भी

कितने कम भू—भाग से परिचित हुए


लोग डँस लेते हैं अवसर देखकर

जो स्वयं के नाग से परिचित हए !


भोर होते ही किया चिड़ियों ने शोर

दिन की भागम—भाग से परिचित हुए


हमने गाँधी की तरह पढ़ा जीवन—चरित्र

इस तरह भी त्याग से परिचित हुए


घर के अंदर बैठकर वन में रहे

मानसिक बैराग से परिचित हुए

लिंग निर्धारण समस्या हो गई

‘लिंग निर्धारण’ समस्या हो गई

कोख में ही कत्ल कन्या हो गई


लोग कर पाए नहीं खुल कर विरोध

सिर्फ अखबारों में निन्दा हो गई


चल रहा है माफिया —गुंडों का राज

इस कदर कमजोर सत्ता हो गई !


क्या पता किस वक्त अणुबम फट पड़े

ये हमारे युग की चिन्ता हो गई


साधु—संतों ने मचाया इतना शोर

भंग भक्तों की तपस्या हो गई


राज करने के लिए नेता हुए

वोट देने भर को जनता हो गई


मन में मिसरी की तरह घुलती नही

सिर्फ भाषा—जाल कविता हो गई

हम भी उड़ने लगे हवाओं में

डूबते ही परी— कथाओं में

हम भी उड़ने लगे हवाओं में


अपने तन— मन को बेच देने की

होड़ है, इन दिनों, कलाओं में


आज भी द्रौपदी का चीर —हरण

हो रहा है भरी सभाओं में


जो गुफा में भटक गए थे कहीं

फिर न झाँके कभी गुफाओं में


ढाई आखर के अर्थ मत ढूँढो

चार आखर की कामनाओं में


सिर्फ रोमांच के मजे के लिए

लोग फँसते हैं वर्जनाओं में


मंत्र जैसा प्रभाव होता है

दिल से निकली हुई दुआओं में

वो जब लुट—पिट गया तो ज्ञान आया

वो जब लुट—पिट गया तो ज्ञान आया

निकट संबंधियों का ध्यान आया


उसे मरने से पहले थी ज़रूरत

मरण के बाद लाखों दान आया


पुलिस के सामने मुँह कैसे खोलूँ

मैं अपने ‘दोस्त’ को पहचान आया


वो सबके सामने नंगी खड़ी थी

हुआ ‘शो’ खत्म तो परिधान आया


मेरे भीतर उठा है ज्वार —भाटा

कभी मन में अगर तूफान आया


पचहत्तर फीसदी वे खा गए, तब—

हमारे हाथ में अनुदान आया


तो दोनों को ही इसका लाभ होगा

कला के घर अगर विज्ञान आया

नदी के मस्त धारे जानते हैं

नदी के मस्त धारे जानते हैं

समंदर के इशारे जानते हैं


सहारा कौन दे सकता है उनको

ये अक्सर बेसहारे जानते हैं


धरा से उनकी बेहद दूरियाँ हैं

गगन के चाँद—तारे जानते हैं


किसी बिरहन ने कितनी बार खोले

ये उसके घर के द्वारे जानते हैं


हमारी ख़ूबियों और ख़ामियों को

हमारे दोस्त सारे जानते हैं


चला समवेत स्वर में उनका जादू

ये हर दल—बल के नारे जानते हैं


धरम का अर्थ ‘गुरू’ के बाद केवल

निकटतम ‘पंच—प्यारे’ जानते हैं

अपने कद की लड़ाई लड़ी

अपने कद की लड़ाई लड़ी

एक पर्वत से राई लड़ी


ताड़ बौना बनाया गया

इसलिए बौनसाई लड़ी


डिग्रियों से लड़ी योग्यता

अनुभवों से पढ़ाई लड़ी


स्वस्थ करने के आवेश में

रोग से खुद दवाई लड़ी


जब्त करने की सीमा तलक

आँसुओं से रुलाई लड़ी


चोट जब भी पड़ी स्वार्थ पर

एक ही माँ की जाई लड़ी


सबसे पहले तो दुश्मन से खुद

दुर्ग की एक खाई लड़ी

तुम पर अगर सितारों जड़ा आसमान है

तुम पर अगर सितारों जड़ा आसमान है

अपनी धरा के पास भी हीरों की खान है


ये देखना है— कैसे चलाते हो तीर तुम

हाथों में इस समय तो हमारे कमान है


कड़वा रहा अतीत, अनिश्चित मिला भविष्य

अपना तो मूलधन भी यही वर्तमान है


वे कैसे दौड़ पाएँगे आकाश—मार्ग पर

जिनके ‘परों’ में आज ही कल की थकान है


मेरे ‘बयान’ तुम नहीं जारी करोगे अब

मेरा ‘बयान’ आज से मेरा बयान है


संघर्ष खत्म करने का दो दुश्मनों के पास

क्या संधि के अलावा भी कोई निदान है ?


अब तुम पहँच गए हो शिखर पर, ये सत्य है,

लेकिन शिखर के आगे तो केवल ढलान है

कीट—पतंगे, पशु—पक्षी, आदम

कीट—पतंगे,पशु—पक्षी, आदम भी शामिल रहते हैं

अपनी इस दुनिया में जड़—जंगम भी शामिल रहते हैं


सिर्फ उजालों से धरती का काम नहीं चलने वाला

इसीलिए जगमग जीवन में तम भी शामिल रहते हैं


पहले जिसको कभी नहीं देखा , उसके ही बारे में

चिंतन करते समय अनेकों भ्रम भी शामिल रहते हैं


कई बार, गिरते—गिरते हम गिरने से बच जाते हैं

उस बचाव में, बरसों के संयम भी शामिल रहते हैं


पहले केवल याददाश्त का संबल था, लेकिन, अब तो,

यादें ताजा करने में अलबम भी शामिल रहते हैं

पहले उनके डर समझ में आ गए

पहले उनके डर समझ में आ गए

और फिर कायर समझ में आ गए


लोग जितने भी समझ आए न थे

रोज़ मिल—मिलकर समझ में आ गए


‘ढाई आखर’ तीन होते ही हमें

वासना के स्वर समझ में आ गए


फूल के घर जा रही हैं तितलियाँ

तितलियों के ‘ पर ’ समझ में आ गए


पीठ पीछे से चले थे इसलिए

दोस्तों के शर समझ में आ गए


कैसे नागिन हाथ आएगी नहीं

रूप के मन्तर समझ में आ गए


असली हीरा तो न मिल पाया, मगर

काँच के पत्थर समझ में आ गए

अंतस में दुबकाकर रखना

अंतस में दुबकाकर रखना

लेकिन, आग बचाकर रखना


बीती बातों का क्या रोना

आँसू को भी गाकर रखना


खुद से अनबन मत कर लेना

खुद को दोस्त बनाकर रखना


बस्ती के पागल कुत्तों को

पहले ही हड़का कर रखना


लाख अहसमतियाँ हों, लेकिन

उनसे भी चर्चा कर रखना


मीठी मुस्कानों की खातिर

मन में फूल खिलाकर रखना


जीवन के व्यवहार —मार्ग पर

कुछ सिद्धांत बनाकर रखना

हमेशा द्वंद्व का ठंडा बुखार ठीक नहीं

हमेशा द्वंद्व का ठंडा बुखार ठीक नहीं

मैं सोचता हूँ कि मन में गुबार ठीक नहीं


शिकार करने को जंगल भी कम नहीं होते

खुद अपने घर में ही छिप कर शिकार ठीक नहीं


कभी कुठार को खुद पे चला के देख जरा

हमेशा वृक्षों के तन पर कुठार ठीक नहीं


वे रोज़ रात को सो कर भी सो नहीं पाते

ये स्वप्न नींद के अंदर जगार ठीक नहीं


मैं जूझता हूँ सदा एकमुश्त आँधी से

अनेक किश्तों में आँधी पे वार ठीक नहीं


तुम्हारे बारे में, हम भी तो सोचते होंगे

स्वयं के मुँह से स्वयं का प्रचार ठीक नहीं

लोग अपनी बात के पक्के नहीं रहे

आपस में इसलिए ही भरोसे नहीं रहे

अब लोग अपनी बात के पक्के नहीं रहे


जबसे जुड़ा है शहर से गाँवों का आदमी

गाँवों में रहने वाले भी भोले नहीं रहे


कुछ इस तरह से घास के जंगल हुए सपाट

अब घोंसले बनाने को तिनके नहीं रहे


जिस दिन से राजनीति ने अपना लिया उन्हें

उस दिन से वे भी चोर—उचक्के नहीं रहे


हम एक माँ के जाए थे, लेकिन, ये सत्य है—

जो स्वप्न थे हमारे, वो उनके नहीं रहे


जो लोग आमजन से निकल कर बने थे ‘खास’

अब वे भी आम लोगों के अपने नहीं रहे


कैसे समझ सकोगे समंदर का तुम सुभाव

तुम से किसी समुद्र के रिश्ते नहीं रहे

कुछ इरादे सफल न हो पाए

कुछ इरादे सफल न हो पाए

झोंपड़ी से महल न हो पाए


पाप के पंक में धँसे ऐसे—

चाहकर भी कमल न हो पाए


ऐसे— ऐसे कठिन सवाल मिले

हल किए किन्तु हल न हो पाए


बंद मुठ्ठी में कैद है जुगनू

कैद मुठ्ठी मे पल न हो पाए


मुस्कुराने में फँस गए इतने—

फूल के बाद फल न हो पाए


हमको पत्थर बना के छोड़ दिया

और पत्थर, तरल न हो पाए


जितने चाहे थे अपने जीवन में

उतने रद्दो—बदल न हो पाए

हमारी आपकी यारी से निकले

हमारी आपकी यारी से निकले

कई रस्ते समझदारी से निकले


बहुत कम थे, जो यूँ ही चल पड़े थे,

सफर पर लोग तैयारी से निकले


उन्हीं फूलों को मिल पाती है इज्जत

जो हिम्मत करके फुलवारी से निकले


अजब थे खेल आतिश—बाजियों के

अगन के पेड़ चिंगारी से निकले


जो स्पर्धाओं में पीछे रह गए थे

वो आगे ही ‘कलाकारी’ से निकले


तुम्हारे इस महल के सामने से

बहुत कम लोग खुद्दारी से निकले


जो सच्चे रंग हैं ‘सद्भावना’ के

सदा होली की पिचकारी से निकले

जो अपने डर की सीमा जानते हैं

जो अपने डर की सीमा जानते हैं

वो अपने ‘स्वर’ की सीमा जानते हैं


तुम्हारे पास अवसर है, ये सच है

हम हर अवसर की सीमा जानते हैं


हथौड़े—छैनियों से लैस शिल्पी

अघढ़ पत्थर की सीमा जानते हैं


जिन्हें मालूम है जादू जगाना,

वो हर मन्तर की सीमा जानते हैं


नई पीढ़ी के धीरज के मुताबिक

पिता आदर की सीमा जानते हैं


वो लाँघेंगे नहीं देहरी पराई

जो अपने घर की सीमा जानते हैं


हमें प्रश्नों की हद में सोचना है

हम हर उत्तर की सीमा जानते हैं