सोमवार, फ़रवरी 22, 2010

दश्त-ए-शब पर दिखाई क्या देंगी

दश्त-ए-शब पर दिखाई क्या देंगी
सिलवटें रोशनी में उभरेंगी



घर की दीवारें मेरे जाने पर
अपनी तन्हाइयों को सोचेंगी



उँगलियों को तराश दूँ फिर भी
आदतन उस का नाम लिखेंगी



रंग-ओ-बू से कहीं पनाह नहीं
ख़्वाहिशें भी कहाँ अमाँ देंगी



एक ख़ुश्बू से बच भी जाऊँ अगर
दूसरी निकहतें जकड़ लेंगी



खिड़कियों पर दबीज़ पर्दे हों
बारिशें फिर भी दस्तकें देंगी

तेरी ख़ुश्बू का पता करती है

तेरी ख़ुश्बू का पता करती है
मुझ पे एहसान हवा करती है



शब की तन्हाई में अब तो अक्सर
गुफ़्तगू तुझ से रहा करती है



दिल को उस राह पे चलना ही नहीं
जो मुझे तुझ से जुदा करती है



ज़िन्दगी मेरी थी लेकिन अब तो
तेरे कहने में रहा करती है



उस ने देखा ही नहीं वर्ना ये आँख
दिल का एहवाल कहा करती है



बेनियाज़-ए-काफ़-ए-दरिया अन्गुश्त
रेत पर नाम लिखा करती है



शाम पड़ते ही किसी शख़्स की याद
कूचा-ए-जाँ में सदा करती है



मुझ से भी उस का है वैसा ही सुलूक
हाल जो तेरा अन करती है



दुख हुआ करता है कुछ और बयाँ
बात कुछ और हुआ करती है



अब्र बरसे तो इनायत उस की
शाख़ तो सिर्फ़ दुआ करती है



मसला जब भी उठा चिराग़ों का
फ़ैसला सिर्फ़ हवा करती है

तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ-साथ

तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ-साथ
ऐसी बरसातें कि बादल भीगता है साथ-साथ

बचपने का साथ, फिर एक से दोनों के दुख
रात का और मेरा आँचल भीगता है साथ-साथ

वो अज़ब दुनिया कि सब खंज़र-ब-कफ़ फिरते हैं और
काँच के प्यालों में संदल भीगता है साथ-साथ

बारिशे-संगे-मलामत में भी वो हमराह है
मैं भी भीगूँ, खुद भी पागल भीगता है साथ-साथ

लड़कियों के दुख अज़ब होते हैं, सुख उससे अज़ीब
हँस रही हैं और काजल भीगता है साथ-साथ

बारिशें जाड़े की और तन्हा बहुत मेरा किसान
ज़िस्म और इकलौता कंबल भीगता है साथ-साथ

मैं कहां पर हूं ?

तुम्हारी ज़िन्दगी में

मैं कहां पर हूं ?


हवाए-सुबह में

या शाम के पहले सितारे में

झिझकती बूंदा-बांदी में

कि बेहद तेज़ बारिश में

रुपहली चांदनी में

या कि फिर तपती दुपहरी में

बहुत गहरे ख़यालों में

कि बेहद सरसरी धुन में


तुम्हारी ज़िन्दगी में

मैं कहां पर हूं ?


हुजूमे-कार से घबरा के

साहिल के किनारे पर

किसी वीक-येण्ड का वक़्फ़ा

कि सिगरेट के तसलसुल में

तुम्हारी उंगलियों के बीच

आने वाली कोई बेइरादा रेशमी फ़ुरसत

कि जामे-सुर्ख़ में

यकसर तही

और फिर से

भर जाने का ख़ुश-आदाब लम्हा

कि इक ख़्वाबे-मुहब्बत टूटने

और दूसरा आग़ाज़ होने के

कहीं माबैन इक बेनाम लम्हे की फ़रागत ?


तुम्हारी ज़िन्दगी में

मैं कहां पर हूं ?

तुझसे तो कोई गिला नहीं है

तुझसे तो कोई गिला नहीं है
क़िस्मत में मेरी सिला नहीं है

बिछड़े तो न जाने हाल क्या हो
जो शख़्स अभी मिला नहीं है

जीने की तो आरज़ू ही कब थी
मरने का भी हौसला नहीं है

जो ज़ीस्त को मोतबर बना दे
ऎसा कोई सिलसिला नहीं है

ख़ुश्बू का हिसाब हो चुका है
और फूल अभी खिला नहीं है

सहशारिए-रहबरी में देखा
पीछे मेरा काफ़िला नहीं है

इक ठेस पे दिल का फूट बहना
छूने में तो आबला नहीं है

बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा

बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा

इस जख़्म को हमने कभी सिलते नहीं देखा




इस बार जिसे चाट गई धूप की ख्वाहिश

फिर शाख पे उस फूल को खिलते नहीं देखा




यक लख्त गिरा है तो जड़े तक निकल आईं

जिस पेड़ को आँधी में भी हिलते नहीं देखा




काँटों में घिरे फूल को चूम आयेगी तितली

तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा




किस तर्ह मेरी रूह हरी कर गया आख़िर

वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा

टूटी है मेरी नींद, मगर तुमको इससे क्या

टूटी है मेरी नींद, मगर तुमको इससे क्या

बजते रहें हवाओं से दर, तुमको इससे क्या


तुम मौज-मौज मिस्ल-ए-सबा घूमते रहो

कट जाएँ मेरी सोच के पर तुमको इससे क्या


औरों का हाथ थामो, उन्हें रास्ता दिखाओ

मैं भूल जाऊँ अपना ही घर, तुमको इससे क्या


अब्र-ए-गुरेज़-पा को बरसने से क्या ग़रज़

सीपी में बन न पाए गुहर, तुमको इससे क्या


ले जाएँ मुझको माल-ए-ग़नीमत के साथ उदू

तुमने तो डाल दी है सिपर, तुमको इससे क्या


तुमने तो थक के दश्त में ख़ेमे लगा लिए

तन्हा कटे किसी का सफ़र, तुमको इससे क्या ।

जुस्तजू खोये हुओं की उम्र भर करते रहे

जुस्तजू खोये हुओं की उम्र भर करते रहे
चाँद के हमराह हम हर शब सफ़र करते रहे



रास्तों का इल्म था हम को न सिम्तों की ख़बर
शहर-ए-नामालूम की चाहत मगर करते रहे



हम ने ख़ुद से भी छुपाया और सारे शहर से
तेरे जाने की ख़बर दर-ओ-दिवार करते रहे



वो न आयेगा हमें मालूम था उस शाम भी
इंतज़ार उस का मगर कुछ सोच कर करते रहे



आज आया है हमें भी उन उड़ानों का ख़याल
जिन को तेरे ज़ौम में बे-बाल-ओ-पर करते रहे

छोटी नज़्म

मौसम


चिड़िया पूरी तरह भीग चुकी है
और दरख़्त भी पत्ता पत्ता टपक रहा है
घोंसला कब का बिखर चुका है
चिड़िया फिर भी चहक रही है
अंग अंग से बोल रही है
इस मौसम में भीगते रहना
कितना अच्छा लगता है


फ़ोन


मैं क्यों उसको फ़ोन करूं
उसके भी तो इल्म में होगा
कल शब
मौसम की पहली बारिश थी


बारिश


बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की !
उसे बुला जिसकी चाहत में
तेरा तन-मन भीगा है
प्यार की बारिश से बढ़कर क्या बारिश होगी !
और जब इस बारिश के बाद
हिज्र की पहली धूप खिलेगी
तुझ पर रंग के इस्म खुलेंगे ।

रविवार, फ़रवरी 21, 2010

चेहरा मेरा था निगाहें उस की

चेहरा मेरा था निगाहें उस की
ख़ामुशी में भी वो बातें उस की



मेरे चेहरे पे ग़ज़ल लिखती गईं
शेर कहती हुई आँखें उस की



शोख़ लम्हों का पता देने लगीं
तेज़ होती हुई साँसें उस की



ऐसे मौसम भी गुज़ारे हम ने
सुबहें जब अपनी थीं शामें उस की



ध्यान में उस के ये आलम था कभी
आँख महताब की यादें उस की



फ़ैसला मौज-ए-हवा ने लिक्खा
आँधियाँ मेरी बहारें उस की



नीन्द इस सोच से टूटी अक्सर
किस तरह कटती हैं रातें उस की



दूर रह कर भी सदा रहती है
मुझ को थामे हुए बाहें उस की

चिड़िया

सजे-सजाये घर की तन्हा चिड़िया !

तेरी तारा-सी आँखों की वीरानी में

पच्छुम जा छिपने वाले शहज़ादों की माँ का दुख है

तुझको देख के अपनी माँ को देख रही हूँ

सोच रही हूँ

सारी माँएँ एक मुक़द्दर क्यों लाती हैं ?

गोदें फूलों वाली

आँखें फिर भी ख़ाली ।

चारासाजों की अज़ीयत

चारासाजों की अज़ीयत नहीं देखी जाती
तेरे बीमार की हालत नहीं देखी जाती

देने वाले की मशीय्यत पे है सब कुछ मौक़ूफ़
मांगने वाले की हाजत नहीं देखी जाती

दिल बहल जाता है लेकिन तेरे दीवानों की
शाम होती है तो वहशत नहीं देखी जाती

तमकनत से तुझे रुख़सत तो किया है लेकिन
हमसे उन आँखों की हसरत नहीं देखी जाती

कौन उतरा है आफ़ाक़ की पिनाहाई में
आईनेख़ाने की हैरत नहीं देखी जाती

गुमान

मैं कच्ची नींद में हूँ
और अपने नीमख़्वाबिदा तनफ़्फ़ुस में उतरती
चाँदनी की चाप सुनती हूँ
गुमाँ है
आज भी शायद
मेरे माथे पे तेरे लब
सितारे सबात करते हैं

खुलेगी इस नज़र पे चश्म-ए-तर आहिस्ता आहिस्ता

खुलेगी इस नज़र पे चश्म-ए-तर आहिस्ता आहिस्ता
किया जाता है पानी में सफ़र आहिस्ता आहिस्ता



कोई ज़ंज़ीर फिर वापस वहीं पर ले के आती है
कठिन हो राह तो छुटता है घर आहिस्ता आहिस्ता



बदल देना है रस्ता या कहीं पर बैठ जाना है
कि ठकता जा रहा है हमसफ़र आहिस्ता आहिस्ता



ख़लिश के साथ इस दिल से न मेरी जाँ निकल जाये
खिंचे तीर-ए-शनासाई मगर आहिस्ता आहिस्ता



हुआ है सरकशी में फूल का अपना ज़ियाँ, देखा
सो झुकता जा रहा है अब ये सर आहिस्ता आहिस्ता



मेरी शोलामिज़ाजी को वो जन्गल कैसे रास आये
हवा भी साँस लेती हो जिधर आहिस्ता आहिस्ता

खुली आँखों में सपना जागता है

खुली आँखों में सपना जागता है
वो सोया है के कुछ कुछ जागता है



तेरी चाहत के भीगे जंगलों में
मेरा तन मोर बन के नाचता है



मुझे हर कैफ़ियत में क्यों न समझे
वो मेरे सब हवाले जानता है



किसी के ध्यान में डूबा हुआ दिल
बहाने से मुझे भी टालता है



सड़क को छोड़ कर चलना पड़ेगा
के मेरे घर का कच्चा रास्ता है

ख़ुश्बू है वो तो छू के बदन को गुज़र न जाये

ख़ुश्बू है वो तो छू के बदन को गुज़र न जाये
जब तक मेरे वजूद के अंदर उतर न जाये



ख़ुद फूल ने भी होंठ किये अपने नीम-वा
चोरी तमाम रंग की तितली के सर न जाये



इस ख़ौफ़ से वो साथ निभाने के हक़ में है
खोकर मुझे ये लड़की कहीं दुख से मर न जाये



पलकों को उसकी अपने दुपट्टे से पोंछ दूँ
कल के सफ़र में आज की गर्द-ए-सफ़र न जाये



मैं किस के हाथ भेजूँ उसे आज की दुआ
क़ासिद हवा सितारा कोई उस के घर न जाये

कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की

कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की
उस ने ख़ुश्बू की तरह मेरी पज़ीराई की



कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की



वो कहीं भी गया लौटा तो मेरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मेरे हरजाई की



तेरा पहलू तेरे दिल की तरह आबाद रहे
तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की



उस ने जलती हुई पेशानी पे जो हाथ रखा
रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की

कुछ फ़ैसला तो हो कि किधर जाना चाहिये

कुछ फ़ैसला तो हो कि किधर जाना चाहिये
पानी को अब तो सर से गुज़र जाना चाहिये



हर बार एड़ियों पे गिरा है मेरा लहू
मक़्तल में अब ब-तर्ज़-ए-दिगर जाना चाहिये



क्या चल सकेंगे जिन का फ़क़त मसला ये है
जाने से पहले रख़्त-ए-सफ़र जाना चाहिये



सारा ज्वार-भाटा मेरे दिल में है मगर
इल्ज़ाम ये भी चांद के सर जाना चाहिये



जब भी गये अज़ाब-ए-दर-ओ-बाम था वही
आख़िर को कितनी देर से घर जाना चाहिये



तोहमत लगा के माँ पे जो दुश्मन से दाद ले
ऐसे सुख़नफ़रोश को मर जाना चाहिये

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तेरा ख़याल भी

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तेरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी



बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की
चाँद भी ऐन चेत का उस पे तेरा जमाल भी



सब से नज़र बचा के वो मुझ को ऐसे देखते
एक दफ़ा तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी



दिल तो चमक सकेगा क्या फिर भी तराश के देख लो
शीशागरान-ए-शहर के हाथ का ये कमाल भी



उस को न पा सके थे जब दिल का अजीब हाल था
अब जो पलट के देखिये बात थी कुछ मुहाल भी



मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर
हाथ दुआ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी



शाम की नासमझ हवा पूछ रही है इक पता
मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मेरा ख़याल भी



उस के ही बाज़ूओं में और उस को ही सोचते रहे
जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी

कुछ ख़बर लायी तो है बादे-बहारी उसकी

कुछ ख़बर लायी तो है बादे-बहारी उसकी
शायद इस राह से गुज़रेगी सवारी उसकी

मेरा चेहरा है फ़क़त उसकी नज़र से रौशन
और बाक़ी जो है मज़मून-निगारी उसकी

आंख उठा कर जो रवादार न था देखने का
वही दिल करता है अब मिन्नतो-ज़ारी उसकी

रात में आंख में हैं हल्के गुलाबी डोरे
नींद से पलकें हुई जाती हैं भारी उसकी

उसके दरबार में हाज़िर हुआ यह दिल और फिर
देखने वाली थी कुछ कारगुज़ारी उसकी

आज तो उस पे ठहरती ही न थी आंख ज़रा
उसके जाते ही नज़र मैंने उतारी उसकी

अर्सा-ए-ख़्वाब में रहना है कि लौट आना है
फ़ैसला करने की इस बार है बारी उसकी

कायनात के ख़ालिक़ !

कायनात के ख़ालिक़ !

देख तो मेरा चेहरा

आज मेरे होठों पर

कैसी मुस्कुराहट है

आज मेरी आँखों में

कैसी जगमगाहट है

मेरी मुस्कुराहट से

तुझको याद क्या आया

मेरी भीगी आँखों में

तुझको कुछ नज़र आया

इस हसीन लम्हे को

तू तो जानता होगा

इस समय की अज़मत को

तू तो मानता होगा

हाँ, तेरा गुमाँ सच्चा है

हाँ, कि आज मैंने भी

ज़िन्दगी जनम दी है !

करिया-ए-जाँ में कोई फूल खिलाने आये

करिया-ए-जाँ में कोई फूल खिलाने आये
वो मेरे दिल पे नया ज़ख़्म लगाने आये



मेरे वीरान दरीचों में भी ख़ुश्बू जागे
वो मेरे घर के दर-ओ-बाम सजाने आये



उससे इक बार तो रूठूँ मैं उसी की मानिन्द
और मेरी तरह से वो मुझ को मनाने आये



इसी कूचे में कई उस के शनासा भी तो हैं
वो किसी और से मिलने के बहाने आये



अब न पूछूँगी मैं खोये हुए ख़्वाबों का पता
वो अगर आये तो कुछ भी न बताने आये



ज़ब्त की शहर-पनाहों की मेरे मालिक ख़ैर
ग़म का सैलाब अगर मुझ को बहाने आये

कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी

कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी
मैं अपने हाथ से उस की दुल्हन सजाऊँगी

सुपुर्द कर के उसे चांदनी के हाथों
मैं अपने घर के अंधेरों को लौट आऊँगी

बदन के कर्ब को वो भी समझ न पायेगा
मैं दिल में रोऊँगी आँखों में मुस्कुराऊँगी

वो क्या गया के रफ़ाक़त के सारे लुत्फ़ गये
मैं किस से रूठ सकूँगी किसे मनाऊँगी

वो इक रिश्ता-ए-बेनाम भी नहीं लेकिन
मैं अब भी उस के इशारों पे सर झुकाऊँगी

बिछा दिया था गुलाबों के साथ अपना वजूद
वो सो के उठे तो ख़्वाबों की राख उठाऊँगी

अब उस का फ़न तो किसी और से मनसूब हुआ
मैं किस की नज़्म अकेले में गुन्गुनाऊँगी

जवज़ ढूंढ रहा था नई मुहब्बत का
वो कह रहा था के मैं उस को भूल जाऊँगी

सम'अतों में घने जंगलों की साँसें हैं
मैं अब कभी तेरी आवाज़ सुन न पाऊँगी

कच्चा-सा इक मकां, कहीं आबादियों से दूर

कच्चा-सा इक मकां, कहीं आबादियों से दूर

छोटा-सा इक हुजरा, फ़राज़े-मकान पर

सब्ज़े से झांकती हुई खपरैल वाली छत

दीवारे-चोब पर कोई मौसम की सब्ज़ बेल

उतरी हुई पहाड़ पर बरसात की वह रात

कमरे में लालटेन की हल्की-सी रौशनी

वादी में घूमता हुआ इक चश्मे-शरीर

खिड़की को चूमता हुआ बारिश का जलतरंग

सांसों में गूंजता हुआ इक अनकही का भेद !

एक पैग़ाम

वही मौसम है

बारिश की हंसी

पेड़ों में छन छन गूंजती है

हरी शाख़ें

सुनहरे फूल के ज़ेवर पहन कर

तसव्वुर में किसी के मुस्कराती हैं

हवा की ओढ़नी का रंग फिर हल्का गुलाबी है

शनासा बाग़ को जाता हुआ ख़ुश्बू भरा रस्ता

हमारी राह तकता है

तुलूए-माह की साअत

हमारी मुंतज़िर है

एक दफ़नाई हुई आवाज़

फूलों और किताबों से आरास्ता घर है

तन की हर आसाइश देने वाला साथी

आंखों को ठंडक पहुंचाने वाला बच्चा

लेकिन उस आसाइश, उस ठंडक के रंगमहल में

जहां कहीं जाती हूं

बुनियादों में बेहद गहरे चुनी हुई

एक आवाज़ बराबर गिरय: करती है

मुझे निकालो !

मुझे निकालो !

उसी तरह से हर इक ज़ख़्म खुशनुमा देखे

उसी तरह से हर इक ज़ख़्म खुशनुमा देखे
वो आये तो मुझे अब भी हरा-भरा देखे

गुज़र गये हैं बहुत दिन रिफ़ाक़ते-शब में
इक उम्र हो गयी चेहरा वो चांद-सा देखे

मेरे सुकूत से जिसको गिले रहे क्या-क्या
बिछड़ते वक़्त उन आंखों का बोलना देखे

तेरे सिवा भी कई रंग ख़ुशनज़र थे मगर
जो तुझको देख चुका हो वो और क्या देखे

बस एक रेत का ज़र्रा बचा था आंखों में
अभी तलक जो मुसाफ़िर का रास्ता देखे

उसी से पूछे कोई दश्त की रफ़ाकत जो
जब आंख खोले पहाड़ों का सिलसिला देखे

तुझे अज़ीज़ था और मैंने उसको जीत लिया
मेरी तरफ़ भी तो इक पल ख़ुदा देखे

उस वक़्त

जब आंख में शाम उतरे

पलकों पे शफ़क फूले

काजल की तरह मेरी

आंखों को धनक छू ले

उस वक़्त कोई उसको

आंखों से मेरी देखे

पलकों से मेरी चूमे

उसने फूल भेजे हैं

उसने फूल भेजे हैं

फिर मेरी अयादत को

एक-एक पत्ती में

उन लबों की नरमी है

उन जमील हाथों की

ख़ुशगवार हिद्दत है

उन लतीफ़ सांसों की

दिलनवाज़ ख़ुशबू है


दिल में फूल खिलते हैं

रुह में चिराग़ां है

ज़िन्दगी मुअत्तर है


फिर भी दिल यह कहता है

बात कुछ बना लेना

वक़्त के खज़ाने से

एक पल चुरा लेना

काश! वो खुद आ जाता

अजनबी!

अजनबी!

कभी ज़िन्दगी में अगर तू अकेला हो

और दर्द हद से गुज़र जाए

आंखें तेरी

बात-बेबात रो रो पड़ें

तब कोई अजनबी

तेरी तन्हाई के चांद का नर्म हाला बने

तेरी क़ामत का साया बने

तेरे ज़्ख़्मों पे मरहम रखे

तेरी पलकों से शबनम चुने

तेरे दुख का मसीहा बने

रात भी तन्हाई की पहली दहलीज़ पे है

रात भी तन्हाई की पहली दहलीज़ पे है

और मेरी जानिब अपने हाथ बढ़ाती है

सोच रही हूं

उनको थामूं

ज़ीना-ज़ीना सन्नाटों के तहख़ानों में उतरूं

या अपने कमरे में ठहरूं

चांद मेरी खिड़की पर दस्तक देता है

इसी में ख़ुश हूँ मेरा दुख कोई तो सहता है

इसी में ख़ुश हूँ मेरा दुख कोई तो सहता है
चली चलूँ कि जहाँ तक ये साथ रहता है



ज़मीन-ए-दिल यूँ ही शादाब तो नहीं ऐ दोस्त
क़रीब में कोई दरिया ज़रूर बहता है



न जाने कौन सा फ़िक़्रा कहाँ रक़्म हो जाये
दिलों का हाल भी अब कौन किस से कहता है



मेरे बदन को नमी खा गई अश्कों की
भरी बहार में जैसे मकान ढहता है

अब कौन से मौसम से कोई आस लगाए

अब कौन से मौसम से कोई आस लगाए
बरसात में भी याद जब न उनको हम आए

मिटटी की महक साँस की ख़ुश्बू में उतर कर
भीगे हुए सब्जे की तराई में बुलाए

दरिया की तरह मौज में आई हुई बरखा
ज़रदाई हुई रुत को हरा रंग पिलाए

बूँदों की छमाछम से बदन काँप रहा है
और मस्त हवा रक़्स की लय तेज़ कर जाए

शाखें हैं तो वो रक़्स में, पत्ते हैं तो रम में
पानी का नशा है कि दरख्तों को चढ़ जाए

हर लहर के पावों से लिपटने लगे घूँघरू
बारिश की हँसी ताल पे पाज़ेब जो छंकाए

अंगूर की बेलों पे उतर आए सितारे
रुकती हुई बारिश ने भी क्या रंग दिखाए

अपनी रुसवाई तेरे नाम का चर्चा देखूँ

अपनी रुसवाई तेरे नाम का चर्चा देखूँ
एक ज़रा शेर कहूँ और मैं क्या-क्या देखूँ

नींद आ जाये तो क्या महफ़िलें बरपा देखूँ
आँख खुल जाये तो तन्हाई की सहरा देखूँ

शाम भी हो गई धुँधला गई आँखें भी मेरी
भूलनेवाले मैं कब तक तेरा रस्ता देखूँ

सब ज़िदें उस की मैं पूरी करूँ हर बात सुनूँ
एक बच्चे की तरह से उसे हँसता देखूँ

मुझ पे छा जाये वो बरसात की ख़ुश्बू की तरह
अंग-अंग अपना उसी रुत में महकता देखूँ

तू मेरी तरह से यक्ता है मगर मेरे हबीब
जी में आता है कोई और भी तुझ सा देखूँ

मैं ने जिस लम्हे को पूजा है उसे बस एक बार
ख़्वाब बन कर तेरी आँखों में उतरता देखूँ

तू मेरा कुछ नहीं लगता है मगर जान-ए-हयात
जाने क्यों तेरे लिये दिल को धड़कता देखूँ

अजीब तर्ज़-ए-मुलाक़ात अब के बार रही

अजीब तर्ज़-ए-मुलाक़ात अब के बार रही
तुम्हीं थे बदले हुए या मेरी निगाहें थीं
तुम्हारी नज़रों से लगता था जैसे मेरे बजाए
तुम्हारे ओहदे की देनें तुम्हें मुबारक थीं

सो तुमने मेरा स्वागत उसी तरह से किया
जो अफ़सराने-ए-हुकूमत के ऐतक़ाद में है
तक़ल्लुफ़न मेरे नज़दीक आ के बैठ गए
फिर एहतराम से मौसम का ज़िक्र छेड़ दिया


कुछ उस के बाद सियासत की बात भी निकली
अदब पर भी दो चार तबसरे फ़रमाए
मगर तुमने न हमेशा कि तरह ये पूछा
कि वक्त कैसा गुज़रता है तेरा जान-ए-हयात ?

पहर दिन की अज़ीयत में कितनी शिद्दत है
उजाड़ रात की तन्हाई क्या क़यामत है
शबों की सुस्त-रवी का तुझे भी शिकवा है
ग़म-ए-फ़िराक़ के क़िस्से निशात-ए-वस्ल का ज़िक्र
रवायतें ही सही कोई बात तो करते

अक़्स-ए-ख़ुशबू हूँ, बिखरने से न रोके कोई

अक़्स-ए-ख़ुशबू हूँ, बिखरने से न रोके कोई
और बिखर जाऊँ तो, मुझ को न समेटे कोई

काँप उठती हूँ मैं सोच कर तन्हाई में
मेरे चेहरे पर तेरा नाम न पढ़ ले कोई

जिस तरह ख़्वाब हो गए मेरे रेज़ा-रेज़ा
इस तरह से, कभी टूट कर, बिखरे कोई

अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं
अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई

कोई आहट, कोई आवाज़, कोई छाप नहीं
दिल की गलियाँ बड़ी सुनसान है आए कोई

कैसा सबात है कि रवानी भी साथ है

कैसा सबात है कि रवानी भी साथ है
वापस हैं और नाव में पानी भी साथ है

आसेब कौन सा है तआकुब में शहर के
घर बन रहे हैं नक्ल ए मकानी भी साथ है

यूँ ही नहीं बहार का झोंका भला लगा
ताज़ा हवा के याद पुरानी भी साथ है

हर किस्सागो ने दीदा-ए-बेख्वाब से कहा
इक नींद लाने वाली कहानी भी साथ है

हिज़्रत का एतबार कहाँ हो सके कि जब
छोड़ी हुई जगह की निशानी भी साथ है

मौजें बहम हुई तो किनारा नहीं रहा

मौजें बहम हुई तो किनारा नहीं रहा
आँखों में कोई ख़्वाब दुबारा नहीं रहा

घर बच गया की दूर थे साइका-मिज़ाज
कुछ आसमान का भी इशारा नहीं रहा

भूला है कौन एड़ लगाकर हयात को
रुकना ही रख्श ए जाँ को गंवारा नहीं रहा

जब तक वो बेनिशान रहा दस्तरस में था
खुशनाम हो गया तो हमारा नहीं रहा

गुमगश्ता ए सफ़र को जब अपनी ख़बर मिली
रस्ता दिखाने वाला सितारा नहीं रहा

कैसी घड़ी में तर्क ए सफ़र का ख़्याल है
जब हम में लौट आने का यारा नहीं रहा

शाख़-ए-बदन को ताज़ा फूल निशानी दे

शाख़-ए-बदन को ताज़ा फूल निशानी दे
कोई तो हो जो मेरी जड़ों को पानी दे

अपने सारे मंज़र मुझसे ले ले और
मालिक मेरी आँखों को हैरानी दे

उसकी सरगोशी में भीगती जाए रात
क़तरा-क़तरा तन को नई कहानी दे

उसके नाम पे खुले दरीचे के नीचे
कैसी प्यारी ख़ुशबू रात की रानी दे

बात तो तब है मेरे हर्फ़ में गूँज के साथ
कोई उस लहजे को बात पुरानी दे

शाख़-ए-बदन को ताज़ा फूल निशानी दे

शाख़-ए-बदन को ताज़ा फूल निशानी दे
कोई तो हो जो मेरी जड़ों को पानी दे

अपने सारे मंज़र मुझसे ले ले और
मालिक मेरी आँखों को हैरानी दे

उसकी सरगोशी में भीगती जाए रात
क़तरा-क़तरा तन को नई कहानी दे

उसके नाम पे खुले दरीचे के नीचे
कैसी प्यारी ख़ुशबू रात की रानी दे

बात तो तब है मेरे हर्फ़ में गूँज के साथ
कोई उस लहजे को बात पुरानी दे

चारागर हार गया हो जैसे

चारागर हार गया हो जैसे
अब तो मरना ही दवा हो जैसे

मुझसे बिछड़ा था वो पहले भी मगर
अब के ये ज़ख्म नया हो जैसे

मेरे माथे पे तेरे प्यार का हाथ
रूह पर दस्त ए सबा हो जैसे

यूँ बहुत हंस के मिला था लेकिन
दिल ही दिल में वो ख़फ़ा हो जैसे

सर छुपाएँ तो बदन खुलता है
ज़ीस्त मुफ़लिस की रिदा हो जैसे

पा-ब-गिल सब हैं रिहाई की करे तदबीर कौन

पा-ब-गिल सब हैं रिहाई की करे तदबीर कौन
दस्त-बस्ता शहर में खोले मेरी ज़ंजीर कौन

मेरा सर हाज़िर है लेकिन मेरा मुंसिफ़ देख ले
कर रहा है मेरी फ़र्द-ए-जुर्म को तहरीर कौन

आज दरवाज़ों पे दस्तक जानी-पहचानी-सी है
आज मेरे नाम लेता है मिरी ताज़ीर कौन

कोई मक़तल को गया था मुद्दतों पहले मगर
है दरे-ख़ेमा पे अब तक सूरते-तस्वीर कौन

मेरी चादर तो छिनी थी शाम की तन्हाई में
बे-रिदाई को मिरी फिर दे गया तशहीर कौन

बादबाँ खुलने से पहले का इशारा देखना

बादबाँ खुलने से पहले का इशारा देखना
मैं समुन्दर देखती हूँ तुम किनारा देखना

यूँ बिछड़ना भी बहुत आसाँ न था उससे मगर
जाते जाते उसका वो मुड़कर दुबारा देखना

किस शबाहत को लिए आया है दरवाज़े पे चाँद
ए शब्-ए-हिज्राँ ज़रा अपना सितारा देखना

क्या क़यामत है कि जिनके नाम पर पसपा हुए
उन ही लोगों को मुक़ाबिल में सफ़आरा देखना

क़दमों में भी थकान थी घर भी करीब था

क़दमों में भी थकान थी घर भी करीब था
पर क्या करें कि अब के सफ़र ही अजीब था

निकले अगर तो चाँद दरीचे में रुक भी जाए
इस शहर-ए-बे-चिराग़ में किसका नसीब था

आंधी ने उन रुतों को भी बेताज कर दिया
जिनका कभी हुमा-सा परिंदा नसीब था

कुछ अपने आप से ही उसे कशमकश न था
मुझमें भी कोई शख्स उसी का रक़ीब था

पूछा किसी ने मोल तो हैरान रह गया
अपनी निगाह में कोई कितना गरीब था

मक़तल से आनेवाली हवा को भी कब मिला
ऐसा कोई दरीचा कि जो बेसलीब था

राग-ओ-पै में कोई लज़्ज़त अज़ब थी

गज़ाल-ए-शौक़ की वहशत अज़ब थी
किसी खुशचश्म से निस्बत अज़ब थी

हुजूम-ए-चश्म-ओ-रुखसार-ओ-दहन में
जो तन्हा कर गई सूरत अज़ब थी

वो तरदीद-ए-वफ़ा तो कर रहा था
मगर उस शख्स की हालत अज़ब थी

मिरी तक़दीर की नैरागियों में
मिरी तदबीर की शिरकत अज़ब थी

सर-ए-मक़तल किसी के पैरहन में
गुलाबी रंग की हिद्दत अज़ब थी

बदन का पहले-पहले आज चखना
राग-ओ-पै में कोई लज़्ज़त अज़ब थी

घर की याद है और दरपेश सफ़र भी है

घर की याद है और दरपेश सफ़र भी है
चौथी सिम्त निकल जाने का डर भी है

लम्हा ए रुखसत के गूंगे सन्नाटे की
एक गवाह तो उसकी चश्म-ए-तर भी है

इश्क को खुद दरयुजागरी मंज़ूर नहीं
माँगने पर आये तो कासा-ए-सर भी है

नए सफ़र पे चलते हुए ये ध्यान रहे
रस्ते में दीवार से पहले दर भी है

बहुत से नामों को अपने सीने में छुपाए
जली हुई बस्ती में एक शज़र भी है

आँखों में थकन धनक बदन पर

आँखों में थकन धनक बदन पर
जैसे शब-ए-अव्वली दुल्हन पर

दस्तक है हवा-ए-शब के तन पर
खुलता है नया दरीचा फ़न पर

रंगों की जमील बारिशों में
उतरी है बहार फूल-बन पर

थामे हुए हाथ रोशनी का
रख आई क़दम ज़मीं गगन पर

शबनम के लबों पे नाचती है
छाया है अजब नशा किरनपर

खुलती नहीं बर्ग-ओ-गुल की आँखें
जादू कोई कर गया चमन पर

ख़ामोशी कलाम कर रही है
जज़्बात की मुहर है सुख़न पर

क़ैद में गुज़रेगी जो उम्र बड़े काम की थी

क़ैद में गुज़रेगी जो उम्र बड़े काम की थी
पर मैं क्या करती कि ज़ंजीर तिरे नाम की थी

जिसके माथे पे मिरे बख्त का तारा चमका
चाँद के डूबने की बात उसी शाम की थी

मैंने हाथों को ही पतवार बनाई वर्ना
एक टूटी हुई कश्ती मेरे किस काम की थी

वो कहानी कि सभी सुईयां निकली भी न थीं
फ़िक्र हर शख़्स को शहजादी के अंजाम की थी

ये हवा कैसे उड़ा ले गई आँचल मेरा
यूँ सताने की तो आदत मेरे घनश्याम की थी

बोझ उठाये हुए फिरती है हमारा अब तक
ए ज़मीं माँ तेरी ये उम्र तो आराम की थी

टूटी है मेरी नींद मगर तुमको इससे क्या

टूटी है मेरी नींद मगर तुमको इससे क्या
बजते रहें हवाओं से दर, तुमको इससे क्या

तुम मौज-मौज मिसल-ए-सबा घूमते फिरो
कट जाएँ मेरी सोच के पर, तुमको इससे क्या

औरों के हाथ थामो उन्हें रास्ता दिखाओ
मैं भूल जाऊँ अपना ही घर, तुमको इससे क्या

अब्र-ए-गुरेज़-पा को बरसने से क्या गरज़
सीपी में बन न पाए गुहर , तुमको इससे क्या

तुमने तो थक के दश्त में ख़ेमे लगा दिए
तन्हा कटे किसी का सफ़र, तुमको इससे क्या

जाने कब तक रहे ये तरतीब

जाने कब तक रहे ये तरतीब
दो सितारे खिले क़रीब क़रीब

चाँद की रोशनी से उसने लिखी
मेरे माथे पे एक बात अजीब

मैं हमेशा से उसके सामने थी
उसने देखा नहीं तो मेरा नसीब

रूह तक जिसकी आँच आती है
कौन ये शोला-रु है दिल के क़रीब

चाँद के पास क्या खिला तारा
बन गया सारा आसमान रक़ीब

सभी गुनाह धुल गए सज़ा ही और हो गई

सभी गुनाह धुल गए सज़ा ही और हो गई
मिरे वजूद पर तिरी गवाही और हो गई

रफुगरान ए शहर भी कमाल लोग थे मगर
सितारा साज़ हाथ में क़बा ही और हो गई

बहुत से लोग शाम तक किवाड़ खोलकर रहे
फ़कीर-ए-शहर की मगर सदा ही और हो गई

अँधेरे में थे जब तलक ज़माना साज़गार था
चिराग क्या जला दिया हवा ही और हो गई

बहुत संभल के चलने वाली थी पर अब के बार तो
वो गुल खिले कि शोखी-ए-सबा ही और हो गई

न जाने दुश्मनों की कौन बात याद आ गई
लबों तक आते-आते बद्दुआ ही और हो गई

ये मेरे हाथ की लकीरें खिल रहीं थीं या कि खुद
शगुन की रात खुशबु-ए-हिना ही और हो गई

ज़रा सी कर्गसों को आब-ओ-दाना की जो शह मिली
उक़ाब से ख़िताब की अदा ही और हो गई

बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गए

बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गए
मौसम के हाथ भीग के सफ्फाक़ हो गए

बादल को क्या ख़बर है कि बारिश की चाह में
कितने बलंद-ओ-बाला शजर ख़ाक हो गए

जुगनू को दिन के वक़्त परखने की जिद करें
बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गए

लहरा रही है बर्फ़ की चादर हटा के घास
सूरज की शह पे तिनके भी बेबाक हो गए

साहिल पे जितने आब गज़ीदा थे सब के सब
दरिया का रुख बदलते ही तैराक हो गए

सूरज दिमाग लोग भी इब्लाग-ए-फ़िक्र में
ज़ुल्फ़-ए-शब्-ए-फिराक के पेचाक हो गए

जब भी गरीब-ए-शहर से कुछ गुफ़्तगू हुई
लहज़े हवा-ए-शाम के नमनाक हो गए

पानियों पानियों जब चाँद का हाला उतरा

पानियों पानियों जब चाँद का हाला उतरा
नींद की झील पे एक ख़्वाब पुराना उतरा

आज़माइश में कहाँ इश्क भी पूरा उतरा
हुस्न के आगे तो तक़दीर का लिक्खा उतरा

धूप ढलने लगी दीवार से साया उतरा
सतह हमवार हुई प्यार का दरिया उतरा

याद से नाम मिटा ज़ेहन से चेहरा उतरा
चाँद लम्हों में नज़र से तिरी क्या क्या उतरा

आज की शब् मैं परीशां हूँ तो यूँ लगता है
आज माहताब का चेहरा भी है उतरा उतरा

मेरी वहशत रम-ए-आहू से कहीं बढ़कर थी
जब मेरी ज़ात में तन्हाई का सहरा उतरा

इक शब्-ए-गम के अँधेरे पे नहीं है मौकूफ
तूने जो ज़ख्म लगाया है वो गहरा उतरा

ज़मीन से रह गया दूर आसमान कितना

ज़मीन से रह गया दूर आसमान कितना
सितारा अपने सफ़र में है खुश गुमान कितना

परिंदा पैकाँ ब दोश परवाज़ कर रहा है
रहा है उसको ख़्याल ए सय्यादगान कितना

हवा का रुख देख कर समंदर से पूछना है
उठायें अब कश्तियों पे हम बादबान कितना

बहार में खुशबुओं का नाम ओ नसब था जिससे
वही शजर आज हो गया बेनिशान कितना

गिरे अगर आइना तो इक ख़ास ज़ाविये से
वर्ना हर अक्स को रहे खुद पे मान कितना

बिना किसी आस के उसी तरह जी रहा है
बिछड़ने वालों में था कोई सख्तजान कितना

वो लोग क्या चल सकेंगे जो उँगलियों पे सोचें
सफ़र में है धूप किस क़दर सायबान कितना

उसी तरह से हर इक ज़ख्म खुशनुमा देखे

उसी तरह से हर इक ज़ख्म खुशनुमा देखे
वो आये तो मुझे अब भी हरा भरा देखे

गुज़र गए हैं बहुत दिन रफ़ाक़त-ए-शब में
इक उम्र हो गई चेहरा वो चाँद सा देखे

मिरे सुकूत से जिसको गिले रहे क्या क्या
बिछड़ते वक़्त उन आँखों का बोलना देखे

तिरे सिवा भी कई रंग खुश नज़र थे मगर
जो तुझको देख चुका हो वो और क्या देखे

बस एक रेत का ज़र्रा बचा था आँखों में
अभी तलक जो मुसाफ़िर का रास्ता देखे

उसी से पूछे कोई दश्त की रफ़ाक़त जो
जब आँखें खोले पहाड़ों का सिलसिला देखे

तुझे अज़ीज़ था और मैंने उसको जीत लिया
मिरी तरफ भी तो इक पल तिरा खुदा देखे

खुली आँखों में सपना झाँकता है

खुली आँखों में सपना झाँकता है
वो सोया है कि कुछ कुछ जागता है

तिरी चाहत के भीगे जंगलों में
मिरा तन मोर बन के नाचता है

मुझे हर कैफ़ियत में क्यों न समझे
वो मेरे सब हवाले जानता है

मैं उसकी दस्तरस में हूँ मगर वो
मुझे तेरी रिज़ा से माँगता है

किसी के ध्यान में डूबा हुआ दिल
बहाने से मुझे भी टालता है

किसी की खोज में फिर खो गया कौन

किसी की खोज में फिर खो गया कौन
गली में रोते-रोते सो गया कौन

बड़ी मुद्दत से तन्हा थे मिरे दुःख
ख़ुदाया मेरे आँसू रो गया कौन

जला आई थी मैं तो आस्तीं तक
लहू से मेरा दामन धो गया कौन

जिधर देखूँ खड़ी है फ़स्ल-ए-गिरिया
मिरे शहरों में आँसू बो गया कौन

अभी तक भाईयों में दुश्मनी थी
ये माँ के ख़ूँ का प्यासा हो गया कौन

शनिवार, फ़रवरी 20, 2010

वे शायरों की कलम बेज़ुबान कर देंगे

वे शायरों की कलम बेज़ुबान कर देंगे

जो मुँह से बोलेगा उसका ‘निदान’ कर देंगे




वे आस्था के सवालों को यूं उठायेंगे

खुदा के नाम तुम्हारा मकान कर देंगे




तुम्हारी ‘चुप’ को समर्थन का नाम दे देंगे

बयान अपना, तुम्हारा बयान कर देंगे




तुम उन पे रोक लगाओगे किस तरीके से

वे अपने ‘बाज’ की ‘बुलबुल’ में जान कर देंगे




कई मुखौटों में मिलते है उनके शुभचिंतक

तुम्हारे दोस्त, उन्हें सावधान कर देंगे




वे शेखचिल्ली की शैली में, एक ही पल में

निरस्त अच्छा-भला ‘संविधान’ कर देंगे




तुम्हें पिलायेंगे कुछ इस तरह धरम-घुट्टी

वे चार दिन में तुम्हें ‘बुद्धिमान’ कर देंगे

फूल के बाद फलना ज़रूरी लगा

फूल के बाद फलना ज़रूरी लगा,
भूमिकाएँ बदलना ज़रूरी लगा।


दर्द ढलता रहा आँसुओं में मगर

दर्द शब्दों में ढलना ज़रूरी लगा।

'कूपमंडूक' छवि को नमस्कार कर,
घर से बाहर निकलना ज़रूरी लगा।


अपने द्वंद्वों से दो-चार होते हुए,

हिम की भट्टी में जलना ज़रूरी लगा।

मोमबत्ती से उजियारे की चाह में,
मोम बन कर पिघलना ज़रूरी लगा।


उनके पैरों से चलकर न मंज़िल मिली,

अपने पाँवों पे चलना ज़रूरी लगा।

आदमीयत की रक्षा के परिप्रेक्ष्य में
विश्व-युद्धों का टलना ज़रूरी लगा।

मुस्कुराना भी एक चुम्बक है

मुस्कुराना भी एक चुम्बक है,
मुस्कुराओ, अगर तुम्हें शक है!


उसको छू कर कभी नहीं देखा,

उससे सम्बन्ध बोलने तक है।

डाक्टर की सलाह से लेना,
ये दवा भी ज़हर-सी घातक है।


दिन में सौ बार खनखनाती है

एक बच्चे की बंद गुल्लक है।

उससे उड़ने की बात मत करना,
वो जो पिंजरे में अज बंधक है।


हक्का-बक्का है बेवफ़ा पत्नी,

पति का घर लौटना अचानक है!

'स्वाद' को पूछना है 'बंदर' से,
जिसके हाथ और मुँह में अदरक है।

गगन तक मार करना आ गया है

गगन तक मार करना आ गया है,
समय पर वार करना आ गया है ।



उन्हें......कविता में बौनी वेदना को,
कुतुब-मीनार करना आ गया है !



धुएँ की स्याह चादर चीरते ही,
घुटन को पार करना आ गया है ।



अनैतिक व्यक्ति के अन्याय का अब,
हमें प्रतिकार करना आ गया है ।



खुले बाजार में विष बेचने को,
कपट व्यवहार करना आ गया है ।



हम अब जितने भी सपने देखते हैं,
उन्हें साकार करना आ गया है ।



शिला छूते ही, नारी बन गई जो,
उसे अभिसार करना आ गया है

मुस्कानों की सेल लगी है चेहरों पर

चित्रलिखित मुस्कान सजी है चेहरों पर,
मुस्कानों की सेल लगी है चेहरों पर ।



शहरों में, चेहरों पर भाव नहीं मिलते,
भाव-हीनता ही पसरी है चेहरों पर ।



लोग दूसरों की तुक-तान नहीं सुनते,
अपना राग, अपनी डफली है चेहरों पर ।



दोस्त ठहाकों की भाषा ही भूल गए,
एक खोखली हँसी लदी है चेहरों पर ।



लोगों ने जो भाव छिपाए थे मन में,
उन सब भावों की चुगली है चेहरों पर ।



मीठे पानी वाली नदियाँ सूख गई,
खारे पानी की नद्दी है चेहरों पर ।



एक गैर-मौखिक भाषा है बहुत मुखर,
शब्दों की भाषा गूँगी है चेहरों पर ।

सपने अनेक थे तो मिले स्वप्न-फल अनेक

सपने अनेक थे तो मिले स्वप्न-फल अनेक,
राजा अनेक, वैसे ही उनके महल अनेक।



यूँ तो समय-समुद्र में पल यानी एक बूंद,
दिन, माह, साल रचते रहे मिलके पल अनेक।



जो लोग थे जटिल, वो गए हैं जटिल के पास
मिल ही गए सरल को हमेशा सरल अनेक।



झगडे हैं नायिका को रिझाने की होड के,
नायक के आसपास ही रहते हैं खल अनेक।



बिखरे तो मिल न पाएगी सत्ता की सुन्दरी,
संयुक्त रहके करते रहे राज दल अनेक।



लगता था-इससे आगे कोई रास्ता नहीं,
कोशिश के बाद निकले अनायास हल अनेक।



लाखों में कोई एक ही चमका है सूर्य-सा
कहने को कहने वाले मिलेंगे ग़ज़ल अनेक।

आँखों की कोर का बडा हिस्सा तरल मिला

आँखों की कोर का बडा हिस्सा तरल मिला,
रोने के बाद भी, मेरी आँखों में जल मिला।



उपयोग के लिए उन्हें झुग्गी भी चाहिए,
झुग्गी के आसपास ही उनका महल मिला।



आश्वस्त हो गए थे वो सपने को देख कर,
सपने से ठीक उल्टा मगर स्वप्न-फल मिला।



इक्कीसवीं सदी में ये लगता नहीं अजीब,
नायक की भूमिका में लगातार खल मिला।



पूछा गया था प्रश्न पहेली की शक्ल म,
लेकिन, कठिन सवाल का उत्तर सरल मिला।



उसको भी कैद कर न सकी कैमरे की आँख,
जीवन में चैन का जो हमें एक पल मिला।



ऐसे भी दृश्य देखने पडते हैं आजकल,
कीचड की कालिमा में नहाता कमल मिला।

दबंगों की अनैतिकता अलग है

दबंगों की अनैतिकता अलग है,
उन्हें अन्याय की सुविधा, अलग है।



डराते ही नहीं अपराध उनको,
महल का गुप्त दरवाजा अलग है।



जिसे तुम व्यक्त कर पाए न अब तक,
वो दोनों ओर की दुविधा अलग है।



पतंगें कब लगीं आजाद पंछी,
पतंगों की तरह उडना अलग है।



जिसे महसूस करता हूँ मैं अक्सर,
तुम्हारी देह की दुनिया अलग है।



है स्वाभाविक किसी दुश्मन की चिन्ता,
निजी परछाईं से डरना अलग है।



वो चाहे छन्द हो या छन्द-हीना,
हमारे दौर की कविता अलग है।

उन्हें देखा गया खिलते कमल तक

उन्हें देखा गया खिलते कमल तक,
कोई झाँका नहीं झीलों के तल तक।



तो परसों, फिर न उसकी राह तकना,
जो भूला आज का, लौटा न कल तक।



न जाने, कब समन्दर आ गए हैं,
हमारी अश्रु-धाराओं के जल तक।



सियासत में उन्हीं की पूछ है अब,
नहीं सीमित रहे जो एक दल तक।



यही तो टीस है मन में लता के,
हुई पुष्पित, मगर, पहुँची न फल तक।


हजारों कलयुगी शंकर हैं ऐसे-
पचाना जानते हैं जो गरल तक।



जो बारम्बार विश्लेषण करेगा,
पहुँच ही जाएगा वो ठोस हल तक।

हमारे स्वप्न भी हम को जगाते हैं

हमारे भय पे पाबंदी लगाते हैं
अंधेरे में भी जुगनू मुस्कुराते हैं



बहुत कम लोग कर पाते हैं ये साहस
चतुर चेहरों को आईना दिखाते हैं



जो उड़ना चाहते हैं उड़ नहीं पाते
वो जी भर कर पतंगों को उड़ाते हैं



नहीं माना निकष हमने उन्हें अब तक
मगर वो रोज़ हमको आज़माते हैं



उन्हें भी नाच कर दिखलाना पड़ता है
जो दुनिया भर के लोगों को नचाते हैं



बहुत से पट कभी खुलते नहीं देखे
यूँ उनको लोग अक्सर खटखटाते हैं



हमें वो नींद में सोने नहीं देते
हमारे स्वप्न भी हम को जगाते हैं

सब की आँखों में नीर छोड़ गए

सब की आँखों में नीर छोड़ गए
जाने वाले शरीर छोड़ गए



राह भी याद रख नहीं पाई
क्या कहाँ राहगीर छोड़ गए



लग रहे हैं सही निशाने पर
वो जो व्यंगों के तीर छोड़ गए



हीर का शील भंग होते ही
रांझे अस्मत पे चीर छोड़ गए



एक रुपया दिया था दाता ने
सौ दुआएं फ़क़ीर छोड़ गए



उस पे क़बज़ा है काले नागों का
दान जो दान-वीर छोड़ गए



हम विरासत न रख सके क़ायम
जो विरासत कबीर छोड़ गए

घर छिन गए तो सड़कों पे बेघर बदल गए

घर छिन गए तो सड़कों पे बेघर बदल गए
आँसू, नयन— कुटी से निकल कर बदल गए



अब तो स्वयं—वधू के चयन का रिवाज़ है
कलयुग शुरू हुआ तो स्वयंवर बदल गए



मिलता नहीं जो प्रेम से, वो छीनते हैं लोग
सिद्धान्त वादी प्रश्नों के उत्तर बदल गए



धरती पे लग रहे थे कि कितने कठोर हैं
झीलों को छेड़ते हुए कंकर बदल गए



होने लगे हैं दिन में ही रातों के धत करम
कुछ इसलिए भि आज निशाचर बदल गए



इक्कीसवीं सदी के सपेरे हैं आधुनिक
नागिन को वश में करने के मंतर बदल गए



बाज़ारवाद आया तो बिकने की होड़ में
अनमोल वस्तुओं के भी तेवर बदल गए.

अँधेरे की सुरंगों से निकल कर

अँधेरे की सुरंगों से निकल कर
गए सब रोशनी की ओर चलकर



खड़े थे व्यस्त अपनी बतकही में
तो खींचा ध्यान बच्चे ने मचलकर



जिन्हें जनता ने खारिज कर दिया था
सदन में आ गए कपड़े बदलकर



अधर से हो गई मुस्कान ग़ायब
दिखाना चाहते हैं फूल—फलकर



लगा पानी के छींटे से ही अंकुश
निरंकुश दूध हो बैठा, उबलकर



कली के प्यार में मर—मिटने वाले
कली को फेंक देते हैं मसलकर



घुसे जो लोग काजल—कोठरी में
उन्हें चलना पड़ा बेहद सँभलकर

बहुत कम लोग घर को फूँक कर घर से निकलते हैं

वो हिम्मत करके पहले अपने अन्दर से निकलते हैं
बहुत कम लोग , घर को फूँक कर घर से निकलते हैं

अधिकतर प्रश्न पहले, बाद में मिलते रहे उत्तर
कई प्रति-प्रश्न ऐसे हैं जो उत्तर से निकलते हैं

परों के बल पे पंछी नापते हैं आसमानों को
हमेशा पंछियों के हौसले ‘पर’ से निकलते हैं

पहाड़ों पर व्यस्था कौन-सी है खाद-पानी की
पहाड़ों से जो उग आते हैं,ऊसर से निकलते हैं

अलग होती उन लोगों की बोली और बानी भी
हमेशा सबसे आगे वो जो ’अवसर’ से निकलते हैं

किया हमने भी पहले यत्न से उनके बराबर क़द
हम अब हँसते हुए उनके बराबर से निकलते हैं

जो मोती हैं, वो धरती में कहीं पाए नहीं जाते
हमेशा कीमती मोती समन्दर से निकलते हैं

महान लोगों ने उसको महान कर डाला

महान लोगों ने उसको महान कर डाला
ज़मीन था जो उसे आसमान कर डाला

निशा के साथ जो घटना घटी थी थाने में
उषा को उसने बहुत सावधान कर डाला

उसे ज़ुबान मिली थी वो बोलता भी था
सुअवसरों ने उसे बेज़ुबान कर डाला

वह अपने आप को सब से अलग समझता था
अकाल ने उसे सबके समान कर डाला

वो गर्म शाल जो उपहार में मिली थी उसे
उसे भी उसने भिखारिन को दान कर डाला

तीर ने जब कमान से देखा

दृश्य उड़ते विमान से देखा
बाढ़ को इत्मीनान से देखा

उसने सत्ता के अश्व पर चढ़
कर
जो भी देखा वो शान से देखा

मेरी आँखें चली गईं जबसे
मैंने दुनिया को कान से देखा

फ़ाइलों ने विकास का चेहरा
आँकड़ों की ज़ुबान से देखा

मैंने दिन भर की उसकी मेहनत को
रात भर की थकान से देखा

सेठ साहब ने झोंपड़ी का कद
अपने ऊँचे मकान से देखा

तीर होना तभी हुआ सार्थक
तीर ने जब कमान से देखा

कितने सपनों को आँजकर आया

कितने सपनों को आँजकर आया
गाँव जब भी महानगर आया

मेरे सिर पर जो हाथ उसने रखा
तो अनायास कण्ठ भर आया

वो निकष पर निकल गया पीपल
शुद्ध सोने-सा जो नज़र आया

उड़ते पंछी को रोकना चाहा
तो मेरे हाथ एक पर आया

सच्चे जोहरीच्का हाथ लगते ही
रूप पुखराज का निखर आया

मैने मुड़कर उधर नहीं देखा
जिस झरोखे से उसका स्वर आया

जो कभी दूर ले गया था मुझे
रास्ता वो ही मेरे घर आया

हंस का इम्तिहान बाकी है

हंस का इम्तिहान बाकी है
एक ऊँची उड़ान बाकी है

मेरे पैरों तले धरा न सही
शीश पर आसमान बाकी है

सूखे पनघट के घाट पर अब तक
रस्सियों का निशान बाकी है

गाँव में खण्डहर की सूरत में
उस हवेली की शान बाकी है

उसका रुँधने लगा गला लेकिन
आँसुओं की ज़ुबान बाकी है

आँकड़ों के सिवा, गरीबों पर
झुग्गियों का बयान बाकी है

यात्रा खत्म हो गई लेकिन
यात्रा की थकान बाकी है

आदमी से बड़े जंगली जानवर

जंगलों से चले जंगली जानवर
शहर में आ बसे जंगली जानवर

आदमी के मुखौटे लगाए हुए
हर कदम पर मिले जंगली जानवर

आप भी तीसरी आँख से देखकर
खुद ही पहचानिए जंगली जानवर

एक औरत अकेली मिली जिस जगह
मर्द होने लगे जंगली जानवर

आप पर भी झपटने ही वाला है वो
देखिए...देखिए..जंगली जानवर!

बन्द कमरे के एकान्त में प्रेमिका
आपको क्या कहे-जंगली जानवर!

आजकल जंगलों में भी मिलते नहीं
आदमी से बड़े जंगली जानवर

बंदिशों की सज़ा से डरता है

बंदिशों की सज़ा से डरता है
आदमी दासता से डरता है

जो दीये की शिखा से जल बैठा
वो दीये की शिखा से डरता है

वक्त केवल पिरामिडों जैसी
सदियों लम्बी कला से डरता है

आगे खतरा हो जिससे शोषण का
रूप उसकी कृपा से डरता है

जिसकी सूरत कभी नहीं देखी
आदमी उस खुदा से डरता है

हो जहाँ वास्तव में जन-सत्ता
उसका शासक प्रजा से डरता है

रोग डरता नहीं दवाओं से
रोग केवल दुआ से डरता है

हम बीस-तीस सालों में कितने बदल गए

हम बीस-तीस सालों में कितने बदल गए
अब तो हमारे बीच के रिश्ते बदल गए

अपराधियों ने लोगों के चेहरे चुरा लिए
चेहरे चुरा लिए तो मुखौटे बदल गए

बच्चे हमारी बातों पए हँसते हैं आजकल
उनकी किशोर आँखों के सपने बदल गए

इस राजनीति में भी बहुत दाँव-पेंच हैं
अब राजनीति के भी करिश्मे बदल गए

फ़ैशन भी क्या अजीब है कुछ सोचती नहीं
तन तो वही पुराना है कपड़े बदल गए

इन्सान से तो पहले ही विश्वास उठ गया
विश्वास किसका कीजिए, कुत्ते बदल गए

पन्द्रह ही बरस दूर है इक्कीसवीं सदी
इस बीसवीं सदी के भी चश्मे बदल गए

क्या कहे अखबार वालों से व्यथा औरत

क्या कहे अखबार वालों से व्यथा औरत
यौन शोषण की युगों लम्बी कथा औरत

अपहरण कर ले गए रावण कभी बिल्ला
कल सिया तो आज गीता चोपड़ा औरत

आज भी मामा या सौतेले पिता के हाथ
बेच दी जाती है बूढ़े को युवा औरत

एक कवि ही था, कहा जिसने उसे ‘श्रद्धा’
आम मर्दों ने सदा ली अन्यथा औरत

कल सती हो कर जली थी आज पति के हाथ
बन गई जीवित जलाने की ‘प्रथा’ औरत

अम्ल होते रहे क्षार होते रहे

अम्ल होते रहे क्षार होते रहे
प्रतिक्रियाऒं को तैयार होते रहे

किसको फ़ुरसत है, अमराइयों में मिले
बन्द कमरों में अभिसार होते रहे

वक्त की झील में स्व्वार्थ की नाव पर
उनके सिद्धान्त भी पार होते रहे

हमने तलवार फिर भी उठाई नहीं
शुत्रु के वार पर वार होते होते रहे

वे चमत्कार को देख ही न सके
जिनके सम्मुख चमत्कार होते रहे

नहीं अब शेष स्पर्धा उड़ानों में

नहीं अब शेष स्पर्धा उड़ानों में
पतंगें उड़ रही हैं वायुयानों में

बयानों पर अधिक विश्वास मत करना
बहुत कम तथ्य होता है बयानों में

भला अब कौन अस्मत को बचाएगा
दरोगा कर रहे हैं रेप थानों में

जो हीरे हार में जड़कर चमकते हैं
कभी देखा भी है उनको खदानों में?

पलायन गाँव से भी करगए तो क्या
शहर के गुण नहीं आए किसानों में

इसे तुम लोग कैसे कैद कर लोगे
ये खुश्बू है उड़ेगी आसमानों में

हुआ था वृक्ष पहले या कि पहले बीज
बहस अब तक छिड़ी है बुद्धिमानों में

भूख जैसे सवाल, मत पूछो

भूख जैसे सवाल, मत पूछो
देश का हालचाल मत पूछो!

इस प्रजातन्त्र की व्यवस्था में
तंत्र की ढील-ढाल, मत पूछो

मूल्य इतने गिरे मनुजता के
हँस रहा था दलाल, मत पूछो

उन जहाजों का डू्ब जाना ही
थी समन्दर की चाल, मत पूछो

देश की राजनीति में यारो,
पिछले सैंतीस साल, मत पूछो

है उसकी आँखों में नफ़रत या प्यार, पढ़ लेना

है उसकी आँखों में नफ़रत या प्यार, पढ़ लेना
ये आदमी है , इसे बार-बार, पढ़ लेना

ये जिन्दगी का खतरनाक मोड़ है, प्यारे
यहाँ लिखा है कहीं होशियार,पढ़ लेना

वो रहनुमा नहीं , बहरूपिया लगा है मुझे
हैं उसके पास मुखौटे हज़ार,पढ़ लेना

जो जंगलों से शहर का शिकार करते हैं
कहीं है वे भी किसी के शिकार,पढ़ लेना

जो राजनीति जुड़ी है तुम्हारी रोटी से
उसे किताबों से आगे भी, यार, पढ़ लेना

एक पागल भीड़ के हिंसक स्वरों के बीच

एक पागल भीड़ के हिंसक स्वरों के बीच
फँस गया है काँच का घर पत्थरों के बीच

दिन दिहाड़े रेप, हत्या, रहजनी , डाके
हादसा है जिन्दगी इन मंजरों के बीच

है बहुत मशहूर बन्दर-बाँट रोटी की
आप कैसे फँस गए इन बन्दरों के बीच !

हाँ सियासत रोज ही पंछी उड़ाती है
किन्तु रख देती है टाइम-बम परों के बीच

लोग कपड़े की तरह बुनने लगे गज़लें
क्योंकि गजलें आ फँसी हैं बुनकरों के बीच

लोग जितने मिले- ‘स्वर’ बदलते हुए

लोग जितने मिले, ‘स्वर’ बदलते हुए
वक्त के साथ तेवर बदलते हुए

हर नए साल के संग पुराने हुए
लोग पिछला कैलेण्डर बदलते हुए

अपने सामान बच्चों व पत्नी सहित
हम भटकते रहे घर बदलते हुए

ऊँची -ऊँची उड़ानों के उन्माद में
रोज पंछी मिले पर बदलते हुए

आदमी फिर भी पूरा बदलता नहीं
जिन्दगी भर निरन्तर बदलते हुए

एक-से वक्त्व्य नारे एक-से

एक-से वक्त्व्य नारे एक-से
हैं लुटेरों के इशारे एक-से

भूख झुग्गी में लगे या खान में
भूख दिखलाती है तारे एक-से

आपके कुछ वोट पाने के लिए
हाथ लोगों ने पसारे एक-से

गाँव से लेकर शहर तक बेधड़क
नोट चलते हैं करारे एक-से

धर्म के हों या किसी सरकार के
किन्तु हैं कानून सारे एक-से

घर के अन्दर देखकर या घर के बाहर देखकर

घर के अन्दर देखकर या घर के बाहर देखकर
थक गया है आदमी खुद को निरंतर देखकर

न्याय-घर में भी बदल सकते हैं दर्पण के बयान
मूल अपराधी के संकेतों में पत्थर देखकर

चीखने की भी यहाँ पंछी को आज़ादी नहीं
चाकुओं के हाथ में अपने कटे पर देखकर

उसको तालाबों के किस्सों में मज़ा आता नहीं
जो अभी लौटा है अपने घर समन्दर देखकर

दोस्तों से राय लेना व्यर्थ लगता है मुझे
दोस्त मुझको राय देते हैं मेरा स्वर देखकर

खूनी हथियारों की बिक्री के नए माहौल में
हँस रहे हैं शस्त्र- विक्रेता कबूतर देखकर

दो रोटी के अलावा चार की बातें नहीं करते

दो रोटी के अलावा चार की बातें नहीं करते
करोड़ों लोग कोठी -कार की बातें नहीं करते

बरस में एक दीवाली-अमावस के अलावा हम
अमावस से कभी उजियार की बातें नहीं करते

यहाँ इस देश में कुछ आदिवासी क्षेत्र ऐसे हैं
जहाँ के नागरिक सरकार की बातें नहीं करते

जहाँ पर देह नारी या पुरुष की गैर-हाज़िर हो
शहर
के लोग ऐसे प्यार की बातें नहीं करते

जिन्हें बिकना है जीवन में हजारों बार बिकना है
वे अपने मूल्य या बाज़ार की बातें नहीं करते

हो गए हैं लक्ष्य सब ओझल विवादों में

हो गए हैं लक्ष्य सब ओझल विवादों में
आदमी उलझा रहा केवल विवादों में

लोग संसद में विगत सैंतीस वर्षों से
कर रहे हैं भुखमरी को हल विवादों में

आपने देखे नहीं दो सम्प्रदायों के
लोग हो जाते हैं जब पागल विवादों में

कोर्ट में वादी व प्रतिवादी बहस के बीच
न्याय होता है बहुत घायल विवादों में

अब वहाँ पर बाँध बँध पाना असम्भव है
फँस गया है उस नदी का जल विवादों में

हो गए हैं लक्ष्य सब ओझल विवादों में

हो गए हैं लक्ष्य सब ओझल विवादों में
आदमी उलझा रहा केवल विवादों में

लोग संसद में विगत सैंतीस वर्षों से
कर रहे हैं भुखमरी को हल विवादों में

आपने देखे नहीं दो सम्प्रदायों के
लोग हो जाते हैं जब पागल विवादों में

कोर्ट में वादी व प्रतिवादी बहस के बीच
न्याय होता है बहुत घायल विवादों में

अब वहाँ पर बाँध बँध पाना असम्भव है
फँस गया है उस नदी का जल विवादों में

यहाँ उड़ने के अवसर हैं हज़ारों

यहाँ उड़ने के अवसर हैं हज़ारों
किराए पर यहाँ पर हैं हज़ारों

ये सत्ता की सियासत का शहर है
यहाँ हर ओर अजगर हैं हज़ारों

मुकद्दार का सिकन्दर मैं नहीं हूँ
मुकद्दर के सिकन्दर हैं हज़ारों

लड़ानी हैं जिन्हें अपनी बटेरें
उन्हीं के पास तीतर हैं हज़ारों

अकेले में मैं अक्सर सोचता हूँ
बदलते क्यों मेरे स्वर हैं हज़ारों

नहीं दिखते कहीम वे तीन बन्दर
यूँ गांधी जी के बंदर हैं हज़ारों

है मेरी लेखनी कविता की गागर
मेरी गागर में सागर हैं हज़ारों

यह शहर कब रुका है सड़कों पर

यह शहर कब रुका है सड़कों पर
आदमी भागता है सड़कों पर

पूरी बेरोजगार पीढ़ी की
दौड़-प्रतियोगिता है सड़कों पर

इसलिए घर-मकान निर्जन है
क्योंकि मेला लगा है सड़कों पर

मन में डर है कहीं भी लुटने का
सहमी-सहमी हवा है सड़कों पर

सड़कें सड़कों में हो रही हैं गुम
आदमी लापता है सड़कों पर

इन्द्रधनुषी किशोर सपनों का
आईना टूटता है सड़कों पर

गूँगा आक्रोश बंद कमरों का
कूद कर आ गया है सड़कों पर

ना-नुकर में तमाम सड़कें हैं

ना-नुकर में तमाम सड़कें हैं
उस नज़र में तमाम सड़कें हैं

गाँव में तो गिनी चुनी दस थीं
इस शहर में तमाम सड़कें हैं

रोज अपराध करने वाले के
मूक डर में तमाम सड़कें हैं

वो गनहगार छूट जाएगा
न्याय-घर में तमाम सड़कें हैं

जो गरीबों की बात करता है
उसके स्वर में तमाम सड़कें हैं

शाम को मुम्बई ,सुबह दिल्ली
रात भर में तमाम सड़कें हैं

मुट्ठियों में रेत भरकर चुप रहे

मुट्ठियों में रेत भरकर चुप रहे
लोग मरु-थल से गुजरकर चुप रहे

धूप,मिट्टी,जल हवा दुश्मन हुए
बीज धरती पर बिखरकर चुप रहे

पहले डरते थे तो चिल्लाते भी थे
किछ दिनों से लोग डरकर चुप रहे

जुल्म होते देखना आदत बनी
लोग सड़कों पर ठहरकर चुप रहे

अंतत:
वे लोग बम-से फट पड़े
जो हृदय में आग धरकर चुप रहे

वो स्वयं से मिला-जुला ही नहीं

वो स्वयं से मिला-जुला ही नहीं
वो जो दर्पण को देखता ही नहीं

ये सदा उसकी कूटनीति रही
जो कहा वो कभी किया ही नहीं

मेरे जीवन से जो चला ही गया
उसको फिर मुड़के देखना ही नहीं

जो भी कहना था कह दिया तुमने
मेरे कहने को कुछ बचा ही नहीं

उसको संदेह की है वीमारी
और संदेह की दवा ही नहीं

किसी निष्कर्ष के घर तक नहीं पहुँचे

किसी निष्कर्ष के घर तक नहीं पहुँचे
भटकते प्रश्न उत्तरतक नहीं पहुँचे

पहुँच जाते तो हम भी तोड़ लेते फल
हमारे हाथ तरुवर तक नहीं पहुँचे

नदी देखी है, हमने ताल देखे हैं
नहीं, हम लोग सागर तक नहीं पहुँचे

वे कैसे सीख लें सम्मान की भाषा
कभी जो लोग आदर तक नहीं पहुँचे

हमारे शीश पर भी है गगन की छत
अभी हम लोग छप्पर तक नहीं पहुँचे

जो उलझे प्रेम के संदर्भ ग्रंथों में
कभी वे ढाई आखर तक नहीं पहुंचे

हमारा स्वप्न है दो जून की रोटी
हमारे स्वप्न अम्बर तक नहीं पहुँचे

रूढ़ियों का किला पुराना है

रूढ़ियों का किला पुराना है
जिसमें बैठा खुदा पुराना है

रूप लुटता था,रूप लुटता है
लूट का सिलसिला पुराना है

औरतों के चरित्र को लेकर
मर्द का सोचना पुराना है

मौका मिलते ही सिर उठाएगा
आदनी भेड़िया पुराना है

रेप के केस में गवाह बिना
कोर्ट का फ़ैसला पुराना है

यौन-अपराध को हवा देता
काम का देवता पुराना है

आज के युग में काल गर्ल सही
तन का पेशा बड़ा पुराना है

निश्चय के साथ घर से निकलना कठिन तो है

निश्चय के साथ घर से निकलना कठिन तो है
मुट्ठी में आग बाँध के चलना कठिन तो है

बन जाएगा यह काम बदलने से शक्ल को
लेकिन ,जनाब, शक्ल बदलना कठिन तो है

संगीत-साधना में जो बैजू न बन सका
पत्थर का उसके सुर से ,पिघलना कठिन तो है

दुनिया के लाभ के लिए, नदियों की शक्ल में
हिम-गिरि के अंग-अंग-सा गलना कठिन तो है

मरु-थल में भी जो फूले-फले हैं,उन्हें नमन
मरु-थल के बीच फूलना फलना कठिन तो है.

बर्फ की देह जल रही है कहीं

बर्फ की देह जल रही है कहीं
धीरे-धीरे पिघल रही है कहीं

यूँ तो जीवन की भिन्न मुश्किल है
किन्तु कितनी सरल रही है कहीं

आज की राजनीति की रंभा
दिल कहीं,दल बदल रही है कहीं

एक सोलह बरस की लड़की में
पूरी औरत मचल रही है कहीं

गाँव से इस शहर में आते ही
ये सड़क तेज़ चल रही है कहीं

तेरी बातों में आस्था की चमक
मेरी मुश्किल का हल रही है कहीं

छोड़ कर अम्न के कबूतर को
ये सदी हाथ मल रही है कहीं

सत्य के तन के कई टुकड़े हुए

सत्य के तन के कई टुकड़े हुए
एक दर्पन के कई टुकड़े हुए

स्वार्थ छोटे जब बड़े होने लगे
मूल आँगन के कई टुकड़े हुए

रूप यदि भूलों का का अल्बम बन गया
रूप के मन के कई टुकड़े हुए

हो गए जिस रोज़ पति-पत्नी अलग
मूक बचपन के कई टुकड़े हुए

धर्म पर इतने मतान्तर हो गए
ईश -वन्दन के कई टुकड़े हुए