गुरुवार, मई 07, 2009

'भंवर में ज़िंदगी !' - सौरभ कुणाल

हम गुनगुनाते हैं आजकल
बस तेरी ही बातें
तेरी याद मे कटती है
अक्सर हमारी रातें।
क्या करूं मैं
समझ नहीं आता
आंखों से तेरा चेहरा
हटा नहीं पाता।
याद आती है रह-रह के
तेरी वो मुलाकातें
मेरे हाथों में तेरा हाथ
वो खामोश रातें।
तेरी हस्ती दिल से
मिटा नहीं पाता
अपनी आंखें ज़माने को
दिखा नहीं पाता।
चंद सांसों की मोहलत दो
तेरी यादों से दूर जाऊं
ऐ वख्त ! ले चल वहां
जहां खुद को मैं भूल जाऊं।
अब आ जा ऐ रात !
जीवन की शाम ढल चुकी
मेरी खामोश ज़िंदगी की
दीप अब बुझ चुकी।
कि खो गए हैं हम
सहमी हुई नज़र में
डूबा है मन
अनजान भंवर में।

2 टिप्पणियाँ:

Babli ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया आपकी टिपण्णी के लिए!
मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत ही सुंदर कविता लिखा है आपने!
आप मेरा ये ब्लॉग परियेगा ! मैंने मात्री दिवस पर लिखा है!
http://urmi-z-unique.blogspot.com

आदर्श राठौर ने कहा…

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