मंगलवार, अप्रैल 28, 2009

कतील शिफ़ाई की बेहतरीन ग़ज़ल

अपने हाथों की लकीरों में बसाले मुझको
मैं हूं तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको
मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के मानी
ये तेरी सादादिली मार न डाले मुझको
मैं समंदर भी हूं मोती भी हूं गोतज़ान भी
कोई भी नाम मेरा लेके बुलाले मुझको
तूने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी
ख़ुदपरस्ती में कहीं तू न गवां ले मुझको
कल की बात और है मैं अब सा रहूं या न रहूं
जितना जी चाहे तेरा आज सताले मुझको

ख़ुद को मैं बांट न डालूं कहीं दामन-दामन
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको
मैं जो कांटा हूं तो चल मुझसे बचाकर दामन
मैं हूं अगर फूल तो जूड़े में सजाले मुझको
मैं खुले दर के किसी घर का हूं समां प्यार
तू दबे पांव कभी आके चुराले मुझको
तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम
तू कभी याद तो कर भूलाने वालो मुझको
वादा फिर वादा है मैं ज़हर भी पी जाऊं
शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको
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अपने होठों पे सजाना चाहता हूं
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूं
कोई आंसू तेरे दामन पर गिराकर
बूंद को मोती बनाना चाहता हूं
थक गया मैं करते-करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूं
छा रहा है सारी बस्ती में अंधेरा
रौशनी हो घर जलाना चाहता हूं
आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आए
मौत भी मैं शायराना चाहता हूं
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इक-इक पत्थर जोड़ के मैंने जो दीवार बनाई है
झांखू उस के पीछे तो स्र्स्वाई ही स्र्स्वाई है
यों लगता है सोते जागते औरों का मोहताज हूं
आंखें मेरी अपनी हैं पर उन में नींद पराई है
देख रहे हैं सब हैरत से नीले-नीले पानी को
पूछे कौन समंदर से तुझ में कितनी गहराई है
आज हुआ मालूम मुझे इस शहर के चंद सयानों से
अपनी राह बदलते रहना सबसे बड़ी दानाई है
तोड़ गए पैमान-ए-वफ़ा इस दौर में कैसे कैसे लोग
ये मत सोच ‘क़तील’ कि बस इक यार तेरा हरजाई है
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किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह
वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह
बढ़ा के प्यास मेरी उस ने हाथ छोड़ दिया
वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह
किसे ख़बर थी बढ़ेगी कुछ और तारीकी
छुपेगा वो किसी बदली में चांदनी की तरह
कभी न सोचा था हमने ‘क़तील’ उस के लिए
करेगा हम पे सितम वो भी हर किसी की तरह
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मिलकर जुदा हुए तो न सोया करेंगे हम
एक दूसरे की याद में रोया करेंगे हम
आंसू छलक छलक के सताएंगे रात भर
मोती पलक पलक में पिरोया करेंगे हम
जब दूरियों की आग दिलों को जलाएगी
जिस्मों को चांदनी में भिगोया करेंगे हम
गर दे गया दगा़ हमें तूफ़ान भी ‘क़तील’
साहिल पे कश्तियों को डूबोया करेंगे हम
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परेशां रात सारी है सितारों तुम तो सो जाओ
सुकूत-ए-मर्ग तारी है सितारों तुम तो सो जाओ
हंसों और हंसते-हंसते डूबते जाओ ख़लाओं में
हमें ये रात भारी है सितारों तुम तो सो जाओ
तुम्हें क्या आज भी कोई अगर मिलने नहीं आया
ये बाज़ी हम ने हारी है सितारों तुम तो सो जाओ
कहे जाते हो रो-रोके हमारा हाल दुनिया से
ये कैसी राज़दारी है सितारों तुम तो सो जाओ
हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा
यही क़िस्मत हमारी है सितारों तुम तो सो जाओ
हमें भी नींद आ जाएगी हम भी सो ही जाएंगे
अभी कुछ बेक़रारी है सितारों तुम तो सो जाआ
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प्यास वो दिल की बुझाने कभी आया भी नहीं
कैसा बादल है जिसका कोई साया भी नहीं
बेस्र्ख़ी इस से बड़ी और भला क्या होगी
एक मु त से हमें उस ने सताया भी नहीं
रोज़ आता है दर-ए-दिल पे वो दस्तक देने
आज तक हमने जिसे पास बुलाया भी नहीं
सुन लिया कैसे ख़ुदा जाने ज़माने भर ने
वो फ़साना जो कभी हमने सुनाया भी नहीं
तुम तो शायर हो ‘क़तील’ और वो इक आम सा शख्स़
उस ने चाहा भी तुझे और जताया भी नहीं
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सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूं मैं
लेकिन ये सोचता हूं कि अब तेरा क्या हूं मैं
बिखरा पड़ा है तेरे ही घर में तेरा वजूद
बेकार महिफ़लों में तुझे ढूंढता हूं मैं
मैं ख़ुदकशी के जुर्म का करता हूं ऐतराफ़
अपने बदन की क़ब्र में कबसे गड़ा हूं मैं
किस-किसका नाम लूं ज़बां पर कि तेरे साथ
हर रोज़ एक शख्स़ नया देखता हूं मैं
ना जाने किस अदा से लिया तूने मेरा नाम
दुनिया समझ रही है के सब कुछ तेरा हूं मैं
ले मेरे तजुर्बों से सबक ऐ मेरे रक़ीब
दो चार साल उम्र में तुझसे बड़ा हूं मैं
जागा हुआ ज़मीर वो आईना है ‘क़तील’
सोने से पहले रोज़ जिसे देखता हूं मैं
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तुम पूछो और मैं न बताऊं ऐसे तो हालात नहीं
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं
किस को ख़बर थी सांवले बादल बिन बरसे उड़ जाते हैं
सावन आया लेकिन अपनी क़िस्मत में बरसात नहीं
माना जीवन में औरत एक बार मोहब्बत करती है
लेकिन मुझको ये तो बता दे क्या तू औरत ज़ात नहीं
ख़त्म हुआ मेरा अफ़साना अब ये आंसू पोंछ भी लो
जिसमें कोई तारा चमके आज की रात वो रात नहीं
मेरे गम़गीं होने पर अहबाब हैं यों हैरान ‘क़तील’
जैसे मैं पत्थर हूं मेरे सीने में जज्बात नहीं
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तुम्हारी अन्जुमन से उठ के दीवाने कहां जाते
जो वाबस्ता हुए तुमसे वो अफ़साने कहां जाते
निकल कर दैर-ओ-काबा से अगर मिलता न मैख़ाना
तो ठुकराए हुए इन्सान ख़ुदा जाने कहां जाते
तुम्हारी बेस्र्ख़ी ने लाज रख ली बादाख़ाने की
तुम आंखों से पिला देते तो पैमाने कहां जाते
चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी
वर्ना हम ज़माने भर को समझाने कहां जाते
‘क़तील’ अपना मुक़र गम़ से बेगाना अगर होता
फिर तो अपने-पराए हमसे पहचाने कहां जाते

1 टिप्पणियाँ:

sarwat m ने कहा…

सुभाष कुनाल जी,
आप बहुत मेहनत कर रहे हैं और आपकी मेहनत का मूल्यांकन भी कोई नहीं कर रहा है. एक समस्या हो सकती है, मेरे विचार में अगर आप अपने टाइप थोड़े से बडे कर लें तो शायद पढ़ने वालों को कुछ आसानी हो जाये.