शनिवार, मार्च 13, 2010

सरूरे-शब का नहीं, सुबह का ख़ुमार हूँ मैं

सरूरे-शब का नहीं, सुबह का ख़ुमार हूँ मैं।
निकल चुकी है जो गुलशन से वो बहार हूँ मैं॥

करम पै तेरे नज़र की तो ढै गया वह गरूर।
बढ़ा था नाज़ कि हद का गुनहगार हूँ मैं॥

1 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सुन्दर आभार
ढेर सारी शुभकामनायें.

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com